मार्केट वायर

भारतीय एक्सपोर्ट का दमदार वापसी करने का इतिहास है

इंडियन IT और हेल्थकेयर कंपनियों के एक्सपोर्ट की हालिया गिरावट का लंबे अर्से में असर न हो, ऐसा भी हो सकता है

इंडियन IT और हेल्थकेयर कंपनियों के एक्सपोर्ट की हालिया गिरावट का लंबे अर्से में असर न हो, ऐसा भी हो सकता है

वैश्विक महामारी और दुनिया में चल रहे संघर्षों ने दुनिया को एक बड़े गांव की तरह देखने वालों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.

जैसे ही दुनिया में घबराहट फैली, ज़्यादातर अर्थव्यवस्थाओं ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को कम करने का फ़ैसला कर लिया. और जो पहले से ही सप्लाई चेन की मुश्किलों से जूझ रही थीं, उन कंपनियों ने सस्ते कामगारों का मोह छोड़ने का फ़ैसला कर लिया.

कम-से-कम हेडलाइन तो यही कह रही हैं. पर हमने ये पता करने का फ़ैसला किया कि डेटा क्या कह रहा है. हमारा इरादा ये पता लगाने का था कि ऐसी इंडस्ट्री, जो एक्सपोर्ट पर ज़्यादा निर्भर करती हैं उन्होंने मुश्किल दौर में कैसा प्रदर्शन किया.

एक्सपोर्ट से रेवेन्यू के मामले में, IT सेक्टर और हेल्थकेयर सेक्टर साफ़ तौर पर आगे लगते हैं. इसके लिए हमने BSE IT और हेल्थकेयर इंडेक्स का FY23 का प्रदर्शन चेक किया. और नतीजे बहुत चौंकाने वाले नहीं हैं. वैश्विक मंदी के डर के चलते, मार्केट इन सेक्टर की संभावनाओं के लेकर बहुत उत्साह में नहीं थे. FY23 में BSE IT और BSE हेल्थकेयर इंडिक्स ने क्रमशः 21.9 और 10.2 प्रतिशत का गोता लगाया.

हालांकि, अब भी हम पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे. हम ये नहीं कह रहे कि मार्केट के ये डर बेबुनियाद हैं, पर पहले जब भी ऐसा कोई संकट आया है, तो इन सेग्मेंट में प्राइस का करेक्शन, फ़ाइनेंशियल्स में असल गिरावट के पर आधारित होने के बजाय, सेंटिमेंट पर ज़्यादा आधारित था.

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मिसाल के तौर पर, 2008 के अमेरिकी हाउसिंग सेक्टर में आए संकट के दौरान दोनों इंडिक्स ने इसी तरह की प्रतिक्रिया दिखाई थी. अप्रैल 2007 से मार्च 2009 के बीच, BSE IT और BSE हेल्थकेयर ने क़रीब 51 और 20 प्रतिशत का गोता लगाया था.

मगर मार्केट कैपिटलाइज़ेशन के हिसाब से (IT और फ़ार्मा दोनों में) टॉप-पांच कंपनियों का सालाना रेवेन्यू देखिए, जिन्होंने अपने सालाना रेवेन्यू (हर साल) FY06 से FY12 के बीच कम-से-कम आधा एक्सपोर्ट से कमाया. इससे आपको पता चलेगा कि फ़ाइनेंशियल कुछ और ही कहानी कह रहे हैं.

IT सेक्टर में, जहां कुछ शॉर्ट-टर्म में गिरावट रहीं, वहीं लॉन्ग-टर्म में ग्रोथ में मज़बूती दिखी. और फ़ार्मा कंपनियों के लिए, 2008 में मैक्रो स्तर की विपरीत मुश्किल स्थितियों का असर और भी कम रहा, जिसमें ज़्यादातर कंपनियों की कमाई में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई थी.

इसके क्या मायने हैं
भारतीय IT और हेल्थकेयर सेक्टर ने पिछले वैश्विक संकट के मौक़ों पर मज़बूती दिखाई है. और इस आधार पर, ये कहना कि अमेरिका की मंदी का मतलब भारतीय IT और हेल्थकेयर सेक्टर के लिए खेल ख़त्म होने जैसा होगा, एक अतिशियोक्ति ही होगी, और इसकी वजह तथ्यों में होने के बजाए पैनिक में है.

हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि निवेशकों को आंख बंद करके अपने पैसा इन सैक्टर्स में लगाना चाहिए. निवेश करने से पहले वैश्विक स्तर पर आने वाले संकट जैसी बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है. निवेश से पहले पिछला प्रदर्शन भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. मगर ये भी सच है कि पिछला प्रदर्शन अक्सर आने वाले वाले वक़्त का सही संकेत नहीं होता.

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