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क्या आप एक गुमशुदा अरबपति हैं?

दुनिया में ज़्यादा अरबपति क्यों नहीं हैं? एक अजीब सी नई क़िताब यही समझाने की कोशिश करती है पर नाक़ाम रहती है

दुनिया में ज़्यादा अरबपति क्यों नहीं हैं? एक अजीब सी नई क़िताब यही समझाने की कोशिश करती है पर नाक़ाम रहती हैIllustration: Anand Kumar

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हममें से ज़्यादातर लोग जो कुछ सालों से निवेश के बारे में पढ़ते आ रहे हैं, उन्होंने संभवतः लॉन्ग-टर्म कैपिटल मैनेजमेंट (LTCM) नाम के हेज फ़ंड के बारे में सुना होगा. ये कहानी एक चेतावनी देती है कि कैसे स्मार्ट निवेशक इतने पैसे गंवा देते हैं जो किसी को व्यक्तिगत और पेशेवर तौर पर बर्बाद कर दे. LTCM को 1994 में जॉन मेरीवेदर ने स्थापित किया था, जो सोलोमन ब्रदर्स में वाइस-चेयरमैन और बॉन्ड ट्रेडिंग के मुखिया रह चुके थे, और इसके बोर्ड मेंबर्स में मायरॉन श्कॉल्स और रॉबर्ट सी. मेर्टोन जैसे बड़े नाम शामिल थे, जिन्हें 1997 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला था. इन दोनों अर्थशास्त्रियों को ब्लैक-श्कॉल्स ऑप्शन प्राइसिंग मॉडल के लिए नोबेल दिया गया था.

शुरुआत में तो LTCM ने गज़ब की सफलता हासिल की, और इसके पहले तीन साल में फ़ीस के बाद के इसके एनुअलाइज़्ड रिटर्न 21%, 43%, और 41% रहे. हालांकि, 1998 में, चार महीने के भीतर ही इसे $4.6 बिलियन का ज़बरदस्त नुक़सान हुआ, इसकी बड़ी वजह हाई-लेवरेज वाला एशियाई और रूसी फ़ाइनेंशियल क्राइसिस था. इसी वजह से अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व को दखल देना पड़ा, जिसने क़रीब $3.6 बिलियन का बेलआउट पैकेज जुटाया ताकि एक बड़ा फ़ाइनेशियल क्राइसिस टाला जा सके.

LTCM के एक बॉन्ड ट्रेडर, विक्टर हाघानी ने एक क़िताब लिखी है, जिसका शीर्षक है 'The Missing Billionaires' यानी गुमशुदा अरबपति. क़िताब का मुख्य तर्क कुछ उकसाने वाला है. इसके मुताबिक़ पिछले सौ साल में, अगर अमीर परिवारों ने अपनी पूंजी को समझदारी के साथ ख़र्च किया होता, टैक्स भरे होते, इक्विटी में निवेश किया होता, और अपने एसेट्स को अपने उत्तराधिकारियों को ट्रांसफ़र किया होता, तो आज हम कई हज़ार अरबपति के बीच होते. ऐसे अरबपति जिनके पास सदियों पुरानी संपत्तियां होतीं. मगर, अरबपतियों की समकालीन सूची में ये उत्तराधिकारी मौजूद नहीं हैं. जहां इसकी कई वजहें हैं, वहीं हाघानी और उनके सह-लेखक जेम्स व्हाइट का दावा है कि इसका कारण एक बड़ी ग़लती है, जो हर निवेशक के लिए मायने रखती है, फिर चाहे वो निवेशक हमारे जैसा छोटा निवेशक ही क्यों न हो, और ये ग़लती है: रिस्क असेसमेंट का ग़लत अंदाज़ा लगाना. क़िताब कहती है कि इनमें से कई परिवारों ने निवेश के चुनाव में ही ग़लती की हो ऐसा नहीं है; इसके बजाए, उन्होंने अपने-अपने निवेश के स्केल या स्तर को समझने में ग़लती की.

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ये पूरी बात असल में श्री हाघानी के ख़ुद अपने पास अरबों की पूंजी न होने का माफ़ीनामा लगती है. जैसे कि वो इस क़िताब में कहते भी हैं कि उन्होंने LTCM के ढहने की वजह से अपना नौ अंकों का धन गंवा दिया, जो उनका अपना किया धरा था. अगर उन्होंने 25 साल पहले कुछ सौ मिलियन डॉलर गंवाए, तो आज के लिहाज़ से ये एक बिलियन डॉलर से ज़्यादा हुए. हालांकि मैं मानता हूं कि हर किसी को बेहतर निवेश करना चाहिए, मगर मैं इस 'स्केल समझने की ग़लती' वाली बात को लेकर संशय में हूं, जो कुल मिला कर यही कहती है कि लोग कुछ चीज़ों में ज़रा ज़्यादा ही निवेश कर देते हैं. क्या ये यही कहने का दूसरा तरीक़ा नहीं है कि लोगों को डाइवर्सिफ़ाई करना चाहिए? हां, बिल्कुल, ये ऐसी ही बात तो है!

तो इसमें बस इतनी सी ही बात है कि लोग जहां और जिसमें, जितना निवेश करते हैं उन्हें उस तरह के निवेश में डाइवर्सिफ़ाई करना चाहिए और इस तरह से वो (या कम से कम इनमें से कई लोग) धीरे-धीरे पूंजी बना पाएंगे और उसे संभाल भी सकेंगे. आपको सिर्फ़ इतना करना है कि आप किसी एक ही निवेश या एक ही तरह के निवेश में बहुत ज़्यादा एक्सपोज़र न रखें और इस तरह से, आप उस स्थिति में कभी नहीं आएंगे जिसमें आपको अपनी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा गंवाना पड़े.

असल में तो ये बात इससे आगे भी जाती है. जैसा कि मैंने इस पेज पर बहुत पहले लिखा था कि 'आप अपने निवेशों को डाइवर्सिफ़ाई करते हैं तो आपके निवेश आपको डाइवर्सिफ़ाई करते हैं, यानी आपके निवेश आपके जीवन को ही डाईवर्सिफ़ाई करने में आपकी मदद करते हैं. जब कोविड-19 की शुरुआत हुई, तब कई लोगों ने अपने करियर को थमा हुआ, और एक कमज़ोर धरातल पर पाया. आमतौर पर, लोगों को बेहतर संभावनाओं वाली किसी दूसरी इंडस्ट्री में स्विच करने में परेशानी हुई. इसकी वजह थी कि एक या दो दशक के दौरान एक ही तरह का काम करने के बाद, वो अपने काम में माहिर हो गए थे, मगर इसी वजह से उसके बंधक भी बन गए थे. मेरी नज़र में ऐसे लोग, जिनके पास अच्छी ख़ासी बचत है, वो किसी भी संकट से आसानी से निपट सकते हैं और अपने करियर को किसी बेहतर दिशा की ओर ले जा सकते हैं. वो अपने जीवन को डाइवर्सिफ़ाई कर पाते हैं. सही मायनों में, उनका निवेश उन्हें अपने जीवन में डाइवर्सिटी या विविधता लाने की क्षमता देता है.

श्री हाघानी के गुमशुदा अरबपति ऐसा नहीं कर पाए, मगर जिन लोगों के पास कम पैसा है, वो भी अच्छा कर सकते हैं, अगर वो निवेश के इस बुनियादी सिद्धांत पर टिके रहें तो.

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