
निवेश की दुनिया अक्सर असल दुनिया से अलग होती है. उदाहरण के लिए, निवेश की दुनिया में निष्क्रिय या आलसी होने से वास्तव में आपको बड़ा लाभ कमाने को मदद मिल सकता है. हालांकि, ये बात रोज़मर्रा के तर्क से उलटी लग सकती है. बुरी ख़बर का जश्न मनाना इसकी एक और मिसाल है. असल दुनिया में, कोई नकारात्मक ख़बर शायद ही जश्न का कारण बने. लेकिन फ़ाइनांस में, बुरी ख़बरों से स्टॉक की क़ीमतें गिर सकती हैं, जिससे समझदार निवेशकों के लिए निवेश करने के मौक़े बनते हैं. हाल के वर्षों में, क्वालिटी इंडेक्स के बारे में भी यही कहा जा सकता है. वास्तविक दुनिया में जहां क्वालिटी हमेशा जीतती है, वहीं निवेश में हमेशा ये सच नहीं होता. भले ही, भारत में क्वालिटी इंडेक्स में ROE (इक्विटी पर रिटर्न), डेट-टू-इक्विटी (नॉन-बैंकिंग कंपनियों के लिए फ़ाइनेंशियल लेवरेज रेशियो), प्रति शेयर आय (एक प्रॉफ़िटेबिलिटी रेशियो) और अर्निंग में ग्रोथ के अनुमान जैसे मज़बूत पैमानों के आधार पर स्टॉक चुने जाते हैं, लेकिन बीते पांच साल के आंकड़ों को देखें, तो ये हमेशा फ़ायदे वाली रणनीति नहीं हो सकती. आइए हम डेटा के ज़रिये आपको बताते हैं कि ये बात क्यों सही है? क्वालिटी इंडेक्स का चुनाव केवल तीन क्वालिटी इंडेक्स ने निम्नलिखित दो मानदंडों के आधार पर कटौती की: इंडेक्स जो कम से कम तीन साल पुराने हों इंडेक्स जो शेयरों के क्वालिटी स्कोर को अकेला पैरामीटर मानते हैं क्वालिटी इंडेक्स पर एक नज़र इंडेक्स पैरेंट इंडेक्स लॉन्च डेट बेस डेट इंडेक्स फ़ंड्स/ETFs की संख्या निफ़्टी100 क्वालिटी 30 इंडेक्स
