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थोड़ी जुगाली गोबर पर

बचत और निवेश करने वालों के लिए बुल (bull) हमेशा अच्छी ख़बर नहीं होते

बचत और निवेश करने वालों के लिए बुल (bull) हमेशा अच्छी ख़बर नहीं होतेAnand Kumar

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6:25

"बुलशिट (bullshit) बंद करने के लिए जितनी एनर्जी चाहिए, वो उसे बनाने के लिए ज़रूरी एनर्जी से कई गुना ज़्यादा होती है."

ये ब्रैंडोलिनी का बुलशिट एसिमिट्री प्रिंसीपल (Bullshit Asymmetry Principle) है. ये हमारे डिजिटल युग की एक बड़ी चुनौती दिखाता है. इतालवी प्रोग्रामर अल्बर्टो ब्रैंडोलिनी का 2013 में गढ़ा ये सिद्धांत कहता है कि बुलशिट (गोबर या कोई बेकार की बात) ख़त्म करने करने के लिए बड़ी ज़बरदस्त कोशिश करने की ज़रूरत होती है, जबकि इसे बनाना और फैलाना कोई मुश्किल काम नहीं है.

ब्रैंडोलिनी ने डैनियल काह्नमैन की क़िताब "थिंकिंग, फ़ास्ट एंड स्लो" पढ़ने और इतालवी टीवी पर एक गरमागरम राजनीतिक बहस देखने के बाद इस सिद्धांत को गढ़ा था. भारत में कई टीवी बहसें देखने के बाद, मैं सिन्योर ब्रैंडोलिनी से पूरी तरह सहमत हूं. टीवी पर राजनीतिक बहसों में बकवास (या बुलशिट) खुलकर सामने आती है. हालांकि, आज मेरा विषय ये नहीं है.

टीवी के अलावा, सोशल मीडिया और इसके 'फ़िनफ़्लुएंसरों' की सेना के आ जाने से ये सिद्धांत पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक हो गया है. ये लोग अक्सर बिना ज़्यादा जवाबदेही के पर्सनल फ़ाइनांस की ग़लत सलाह देते हैं, जिससे कई लोग इन सलाहों पर ख़राब फ़ाइनेंशियल फ़ैसले लेते हैं. निवेश की इस समस्या को एक ऐसी इंडस्ट्री और भी बढ़ा देती है जो लोगों को धोखे में डालने के लिए हमेशा सक्रिय रहती है. ये मुद्दा इतना बड़ा हो गया है कि सेबी ने इसके ख़िलाफ़ गंभीर कार्रवाई शुरू कर दी है.

हालांकि, ये समस्या आपके या मेरे जैसे आम निवेशकों की तुलना में रेग्युलेटर के चश्मे से बहुत अलग रंग में दिखाई देती है. रेग्युलेटर की नज़र से देखें, तो उसका ध्यान ये तय करने पर होता है कि फ़ाइनेंस की सलाह देने वाला कोई भी व्यक्ति सही तरीक़े से रेग्युलेटेड हो. फिर भी, हम जैसे निवेशकों के लिए, केवल रेग्युलेशन ही सुरक्षा की गारंटी नहीं होता. हम सभी ने रेग्युलेटेड बिचौलियों से बेकार की और उनका अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाली सलाह झेली है. चाहे ये सलाह किसी यू-ट्यूब फ़िनफ़्लुएंसर से आई हो या किसी बैंक के 'रिलेशनशिप' मैनेजर से, निवेशक को होने वाला नुक़सान तो एक जैसा ही होता है.

इसलिए, ये मत सोचिए कि केवल अनरेग्युलेटेड या अनियमित स्रोत से ही ख़राब सलाह मिलती है. इसके बजाय, स्रोत की परवाह किए बिना हमें ख़राब सलाह पहचान और उसे नज़अंदाज़ करने का अपना ख़ुद का तरीक़ा विकसित करना चाहिए. ख़राब फ़ाइनेंशियल गाइडेंस को पहचानना और उसे नज़रअंदाज़ करना सीख जाएंगे, तो हम ख़ुद को एक कारगर हुनर से लैस कर लेंगे - ठीक उसी तरह जैसे किसी को मछली देने के बजाए उसे मछली पकड़ने का हुनर सिखा दिया जाए. एक बार सही सलाह परखने का हुनर आ गया तो फिर चाहे किसी प्रभावशाली व्यक्ति से ऑनलाइन सलाह मिले या किसी सर्टिफ़ाइड प्रोफ़ेशनल फ़ाइनेंशियल एडवाइज़र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

अब यहां पर सारा फ़ोकस इन्वेस्टर एजुकेशन पर आ जाता है, जो फ़ाइनेंशियल लिट्रेसी या वित्तीय साक्षरता की बात है. बात साफ़ है कि अगर लोगों में निवेश की समझ और ठगे जाने से बचने की इच्छा ही नहीं है तो बचाव होना भी संभव नहीं है. इसलिए, ज़्यादातर लोगों को बुनियादी वित्तीय साक्षरता की ज़रूरत होती है, जिसे आम भाषा में कहते हैं कि पैसे का क्या किया जाए. जिसमें ये समझना शामिल होता है कि निवेश की दुनिया कैसे काम करती है, अलग-अलग तरह के निवेश क्या होते हैं, उनके फ़ायदे क्या हैं और किसी की फ़ाइनेंशियल प्लानिंग में उन्हें कैसे शामिल किया जाए. जहां इस तरह की बुनियादी समझ ज़रूरी है, वहीं ये भी कहना होगा कि ज़्यादातर लोगों की गंभीर ग़लतियां यहां नहीं होतीं.

उनका असली नुक़सान तो तब होता है जब ख़राब फ़ाइनेंशियल प्रोडक्ट को बढ़िया बता कर उन्हें बेचा जाता है, और निवेशक धोखाधड़ी को पकड़ नहीं पाते. अगर आप बचत और निवेश कर रहे हैं, तो आपका सामना ऐसी स्कीमों से होगा ही होगा—और ये कोई अपवाद नहीं बल्कि तयशुदा बात है. देर-सबेर, हर किसी को नुक़सान कराने वाली फ़ाइनेंशियल स्कीमों से दो-चार होने का अनुभव होता ही है. तो, वित्तीय साक्षरता का अहम पहलू सिर्फ़ यही नहीं है कि पैसे का क्या किया जाए, बल्कि ये भी है कि पैसे के साथ क्या नहीं किया जाए. बदक़िस्मती से, ज़्यादातर लोगों को इस तरह की शिक्षा शायद ही कभी मिल पाती है और अक्सर लोग अपने कड़वे अनुभवों से ही सीखते हैं.

तब मामला और भी जटिल हो जाता है, जब शातिर तरीक़े से तैयार किए गए ये नुक़सान करने वाले फ़ाइनेंशियल प्रोडक्ट्स बड़े पैमाने पर फैले होते हैं, तब कभी-कभी समझदार निवेशक भी गच्चा खा जाते हैं. कड़वा सच तो ये है कि इस समस्या का कोई राम-बाण इलाज नहीं है. कुछ ख़राब प्रोडक्ट आसानी से पहचाने जा सकते हैं, तो कुछ को समझना मुश्किल होता है और कइयों को तो काफ़ी ज़्यादा अनुभव के बिना, और हर नई चीज़ को लेकर शक़ की नज़र से देखने की आदत के बिना पकड़ना लगभग असंभव होता है.

लेकिन फिर भी, सख़्त रेग्युलेटरी कार्रवाई ज़रूरी है. उसका उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली सज़ा के उपायों और उनके डर के बिना, फ़ाइनेंस पर बुरा असर करने वाला ये बेक़ाबू प्रचार-प्रसार चलता रहेगा. आजकल जो ख़राब फ़ाइनेंशियल एडवाइज़ चल रही है उसका अंदाज़ा लगाने के लिए, अपने ब्राउज़र की इनकॉग्नीटो विंडों (incognito window) में यू-ट्यूब खोलें और 'ख़रीदने के लिए बेस्ट स्टॉक' जैसी कोई आसान सर्च करें. अनुभवी निवेशकों के लिए ये मनोरंजक हो सकता है, लेकिन नए लोगों के लिए, ये ख़तरनाक तरीक़े से भ्रामक हो सकता है.

ये भी पढ़िए: डिजिटल फ़ाइनेंशियल घोटालों की महामारी

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