इंटरव्यू

ITI म्यूचुअल फ़ंड के CEO ने बताया क्यों वे क्विक कॉमर्स बिज़नस के पक्ष में हैं

राजेश भाटिया ने अपने निवेश फ़िलोसॉफ़ी के बारे में विस्तार से बताया है जिसे समझना फ़ंड निवेशकों के लिए अच्छा रहेगा

ITI म्यूचुअल फ़ंड के CEO ने बताया क्यों वे क्विक कॉमर्स बिज़नस के पक्ष में हैं

कॉमर्स ग्रेजुएट राजेश भाटिया ने अपने ग्रेजुएशन के दिनों को लाइब्रेसी स्टडी सेशन और चाय ब्रेक चर्चाओं में बिताया. एक ऐसे ही ब्रेक का वक़्त था जब फ़ाइनेंशियल मार्केट्स में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी. भाटिया याद करते हैं कि उनके एक दोस्त ने "कॉलेज में मेरे द्वारा पढ़ी गई सभी फ़ाइनांस अकाउंटिंग और बिज़नस कॉन्सेप्ट को बहुत ही क्रिएटिव तरीक़े से इस्तेमाल किया. मुझे लगा कि ये बिज़नसों को देखने और बहुत सारा पैसा कमाने का एक दिलचस्प तरीक़ा है". इसने उन्हें बिज़नसों को समझने और वित्तीय बाज़ारों में क़दम रखने के रास्ते को खोल दिया.

अपने मशहूर करियर के दौरान, भाटिया ने कई भूमिकाएं निभाई हैं - पोर्टफ़ोलियो बिज़नसों के मैनेजमेंट से लेकर लॉन्ग-शॉर्ट और लॉन्ग-ओनली इक्विटी फ़ंड्स की सह-स्थापना और बाद में मालिकाना निवेश की देखरेख तक.

उनके अगुआई में, पिछले एक साल में कई ITI म्यूचुअल फ़ंड की इक्विटी स्कीमों ने शानदार परफ़ॉर्मेंस किया है. ITI स्मॉलकैप फ़ंड 33 स्मॉल-कैप स्कीमों में दूसरे पायदान पर है, जबकि ITI ELSS टैक्स सेवर और ITI मल्टीकैप फ़ंड अपनी-अपनी कैटेगरी में तीसरे पायदान पर हैं.

इस बातचीत में, भाटिया इन फ़ंड्स के बेहतर परफ़ॉर्म में योगदान देने वाले फ़ैक्टरों पर चर्चा करते हैं और लगातार रिटर्न और प्रभावी रिस्क के मैनेजमेंट सुनिश्चित करने के लिए मौजूद मज़बूत प्रक्रियाओं की ख़ाका पेश करते हैं.

इक्विटी बाज़ारों में आपका करियर तीन दशकों तक फ़ैला हुआ है. उन अनुभवों से मिले किन सबक़ ने फ़ंड के मैनेजमेंट के प्रति आपके नज़रिए को आकार दिया और आपकी वर्तमान भूमिका को प्रभावित किया?

मुझे एहसास हुआ कि मेरे फ़ाउंडेशन के साल सबसे ख़ास थे क्योंकि शुरुआती साल आपके निवेश फ़िलोसॉफ़ी को आकार देते हैं और सबसे ख़ास बात, स्वभाव को. बेशक, आप वक़्त के साथ कौशल विकसित कर सकते हैं, लेकिन आपको अच्छा स्वभाव रखने के लिए जल्दी सीखना चाहिए. मैंने अपने सफ़र बहुत क़ामयाब निजी निवेशकों के साथ शुरू किया, जो हक़ीक़त में कंपनियों पर रिसर्च करने और उनके बारे में लॉन्गटर्म नज़रिये से सोचने में यक़ीन करते थे. इसलिए, मैं ऐसे व्यक्तियों से घिरा हुआ भाग्यशाली था, जिन्होंने अपना पूरा वक़्त गहन निवेश रिसर्च करने को दिया. पहला सबक़ जो मैंने सीखा वो चक्रवृद्धि के जादू के बारे में था.

दूसरा सबक़ स्टॉक चयन कौशल विकसित करने पर था - जो रिटर्न का एक शक्तिशाली चालक है. इसमें उन कंपनियों की पहचान करना शामिल है जिनके पास लंबे वक़्त में पर्याप्त रूप से बढ़ने की क्षमता और अवसर है. इन कंपनियों में आमतौर पर अच्छे कैपिटल एलोकेश, मज़बूत मैनेजमेंट और उचित मूल्यांकन के गुण भी होते हैं. इसलिए, हमने महसूस किया कि स्टॉक चुनना चक्रवृद्धि की शक्ति में मदद करने में एक बेहद ख़ास फ़ैक्टर है. मुझे यह भी एहसास हुआ कि डर और लालच के चक्र ने अवसरों को सस्ता और महंगा बना दिया है और स्टॉक चुनने की प्रक्रिया में इसका फायदा उठाना होगा.

आखिरी सीख है कैपिटल के स्थायी नुकसान से बचना, जो चक्रवृद्धि की शक्ति को ख़त्म कर सकता है. मैं आपको एक दिलचस्प कहानी सुनाता हूं. इंटरनेट बूम के दौर में, मेरे एक दोस्त ने एक कंपनी में 2 करोड़ रुपये का निवेश किया; बाद में, इंटरनेट बुलबुले के दौरान वह निवेश 50 करोड़ रुपये तक बढ़ गया. हालांकि, जब बुलबुला फटा, तो उसके निवेश का मूल्य 1 करोड़ रुपये तक गिर गया, जिससे उसे नुकसान हुआ. इसलिए, मुझे लगता है कि कैपिटल का स्थायी नुकसान चक्रवृद्धि की शक्ति को ख़तरे में डाल सकता है. जैसा कि मैंने कहा, इक्विटी में सबसे ख़ास सबक यह है कि अगर आप लॉन्ग टर्म में चक्रवृद्धि ब्याज लेते हैं और अच्छे स्टॉक ढूंढते हैं, तो आप हकीकत में अमीर बन सकते हैं.

पिछले 30 सालों में इक्विटी मार्केट में काफ़ी बदलाव हुए हैं. पीछे मुड़कर देखें तो आपको मार्केट में क्या बदलाव नज़र आते हैं?

तीन दशक पहले सिर्फ़ बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) था. यह एक क्लोज़ सिस्टम था जिसमें कोई पारदर्शिता नहीं थी. निवेशकों को कभी पता नहीं चलता था कि आपके स्टॉकब्रोकर ने किस क़ीमत पर शेयर ख़रीदा है. उस वक़्त ब्रोकरेज फ़ीस 2 फ़ीसदी से लेकर उससे भी ज़्यादा हुआ करती थी. BSE ने अपने बोर्ड पर कॉर्पोरेट नतीजे दिखाए, जिसके लिए हमें उन्हें फ़िज़िकीली कॉपी करना पड़ता था; सूचना का कोई डिजिटलाइज़ेशन नहीं था. लेकिन आज, वित्तीय बाज़ारों का डिमोक्रेटाइज़ेशन हो गया है. टेलीविज़न स्क्रीन और वेबसाइटें किसी कंपनी के नतीजे को एकदम दिखा देती हैं. पारदर्शिता है; अब, लोग जानते हैं कि वे क्या ख़रीद रहे हैं और ब्रोकरेज फ़ीस क्या है.

बाज़ार भी संस्थागत हो गए हैं. 1980 और 1990 के दशक में शेयर ब्रोकर और कुछ निवेशक ही ऐसे लोग थे जो बाज़ार को समझते थे. शेयर बाज़ारों में सिर्फ कुछ ही समुदाय भाग लेते थे. लेकिन आज, ये एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा है; ITI म्यूचुअल फ़ंड में हम देश के कोने-कोने से पैसा लाते हैं. लोग म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए से कैपिटल में इज़ाफ़े की ताक़त का अनुभव कर रहे हैं और SIP पर दांव लगा रहे हैं. उनके निवेश में अनुशासन है, और मुझे लगता है कि पिछले 30 सालों में जो बड़ा बदलाव हुआ है, वो सब बेहतरी के लिए है.

रिटेल मनी (म्यूचुअल फ़ंड) का मैनेजमेंट हेज फ़ंड या AIF के मैनेजमेंट से किस तरह अलग है?

यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल है. म्यूचुअल फ़ंड ज़्यादा रिटेल ओरियंटिड होते हैं, और पैसा कहीं ज़्यादा स्थिर होता है. इन्स्टीट्यूशनल निवेशकों के मुक़ाबले, रिटेल निवेशकों में लॉन्ग टर्म सोचने और धन बनाने की आदत होती है. वे लगातार परफ़ॉर्मेंस चाहते हैं. कोई भी व्यक्ति एक साल में शानदार रिटर्न और अगले साल बहुत निराशाजनक परफ़ॉरमेंस नहीं चाहता. इसलिए, मैं कहूंगा कि ये रिटेल धन/म्यूचुअल फ़ंड बाज़ार की कुछ ख़ास फ़ीचर्स हैं.

एक निवेशक के तौर पर आप ख़ुद को कैसा पाते हैं? किस तरह का स्टॉक या स्थिति आपको उत्साहित करती है?

आज, भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की कगार पर है और अगले कुछ सालों में 8-10 ट्रिलियन डॉलर बनने की ओर अग्रसर है. इसलिए, मैं ऐसे बिज़नसों को प्राथमिकता देता हूं जो भारत में कई साल चलने वाली ग्रोथ की क्षमता को भुना सकें, कुशल प्रबंधकन करें, काम के निपटारे का बढ़िया कौशल रखते हों और मुनाफ़ा कमा सकें. मुझे दिलचस्पी होगी अगर मैं ऐसे बिज़नसों को ऐसी क़ीमत पर हासिल कर सकूं जो संभावित मुनाफ़ा को पूरी तरह से कवर न करे.

कब और किस तरह का स्टॉक आपके लिए आकर्षक खरीदारी बन जाता है?

इक्विटी निवेश की दुनिया में, कई निवेशक कहते हैं कि हम सिर्फ़ फ़्रैंचाइज़ी या ग्रोथ के अवसर ही ख़रीदते हैं. हालांकि, हमें ये तरीक़ा पसंद नहीं है; हम "मिस प्राइज़ सिक्योरिटीज़" ख़रीदना चाहते हैं, जो किसी भी तरह से आ सकती हैं, चाहे ग्रोथ हो या वैल्यू. कभी-कभी, यह स्थिर-विकास वाली कंपनियां हो सकती हैं; दूसरी बार, ये तेज़-ग्रोथ वाली कंपनियां या डेविडेंट यिल्डिंग वाली कंपनियां हो सकती हैं. सोच यह है कि अवसर आकर्षक होना चाहिए, और शेयरों में कम गिरावट और काफ़ी अच्छी इक्विटी अपसाइड होनी चाहिए. कुछ साल पहले, बाज़ार प्रतिभागियों का मानना ​​था कि कंज्यूमर फ़्रैंचाइज़ी में निवेश करके काफ़ी धन सृजन मुम्किन हो सकता है क्योंकि उनके पास मज़बूत खाई है. लोगों ने ऐसे शेयरों के लिए 80P/E को सही ठहराया. लेकिन बाद में जो हुआ वह ये था कि उस कैटेगरी के ज़्यादातर शेयरों ने ख़राब प्रदर्शन किया. इसलिए, यह एक व्यावसायिक जोख़िम के बजाय एक मूल्यांकन जोख़िम बन गया, और यही वजह है कि आपने एक निवेशक के तौर पर ख़राब प्रदर्शन किया.

ध्यान से देखने से, पब्लिक सेकटर के एंटरपाइजड़, जिन्हें पहले ज़्यादातर बाजार सहभागियों द्वारा नकारा जाता था, ने ख़ास इज़ाफ़े का अनुभव किया. आप पब्लिक सेक्टर के बैंकों में ग़लत मूल्य निर्धारण देख सकते हैं, जो सभी नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट(NPA) को बट्टे खाते में डालने के 10-वर्षीय चक्र से गुज़र चुके थे और कम डेट लागत और बढ़ते मार्जिन के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार थे. बाज़ार वक़्त- वक़्त पर ऐसे मौके देता हैं, और जब ऐसे गलत मूल्य निर्धारण के अवसर होते हैं, तो हम भाग लेने में बहुत खुश होते हैं।

मिडकैप, स्मॉलकैप, मल्टीकैप और ELSS जैसे कई फ़ंडों के प्रदर्शन में तेज़ सुधार देखने को मिला है. इसके पीछे ख़ास वजह क्या हैं?

2022 के आसपास, नए मैनेडमें ने कार्यभार संभाला, और हमने फ़ंड मैनेजरों का एक नया ग्रुप अपॉइन्ट किया, जो फ़ंड मैनेजमेंट प्रक्रिया में नए नज़रिया लेकर आया. वर्तमान में, छह फ़ंड मैनेजर हैं, और वे एक अनुभवी टीम हैं. ITI म्यूचुअल फ़ंड में फ़ंड मैनेजर का औसत अनुभव 20 साल से ज़्यादा होगा, इसलिए हमने नई टीम बनाई. हमने लगातार रिटर्न और अच्छे रिस्क मैनेजमेंट को सुनिश्चित करने के लिए एक मज़बूत प्रक्रिया भी बनाई. प्रक्रिया में यह तय किया गया था कि हम आक्रामक नक़दी या सेक्टर कॉल से दूर रहेंगे. इसके बजाय, हम स्टॉक चुनने पर ध्यान केंद्रित करेंगे. हमने पोर्टफ़ोलियो की गुणवत्ता और संरचना के संदर्भ में रिस्क मैनेजमेंट को परिभाषित किया; यह ज़्यादा विस्तृत है, लेकिन हमने यह तय करने के लिए जोख़िम उपाय किए हैं कि पोर्टफ़ोलियो की क्वालिटी हमेशा स्वस्थ बनी रहे. इसलिए, हमने एक बहुत ज़्यादा अनुभवी टीम रखने के अलावा मज़बूत प्रक्रियाओं और प्रभावी रिस्क मैनेजमेंट को लागू किया है. यही वजह है कि हमने अपने सभी प्रोडक्ट में काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया है.

पोर्टफोलियो कई इंडस्ट्री में अच्छी तरह से डाइवर्स हैं, चाहे वह ऑटो हो, बैंक हो, ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) हो, या पूंजीगत सामान हो. इसलिए, सेक्टरों की इतनी डाइवर्सिटी होने से निश्चित रूप से हमें मदद मिली है. हमने स्टॉक चयन पर ध्यान केंद्रित करते हुए डाइवर्सिफ़िकेशन का एक सही लेवल हासिल किया है. इसलिए, मैं तर्क दूंगा कि किसी भी एक सेक्टर ने हमारे समग्र प्रदर्शन को ख़ास तौर से प्रभावित नहीं किया है. पिछले दो सालों से पूंजीगत वस्तुओं और पब्लिक सेक्टर के एन्टरप्राइज पर थोड़ा ज़ोर दिया गया है, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने वहां वैल्यू देखी, और हमें उस लहर से बहुत फ़ायदा हुआ है.

आपके पास तीन प्रमुख फंड्स में ज़ोमैटो है; आप स्टॉक या कंपनी के बारे में इतने आश्वस्त क्यों हैं?
मैं किसी ख़ास स्टॉक पर टिप्पणी नहीं कर सकता. हालांकि, हमारे देश की हाई इंटरनेट एंट्री रेट को देखते हुए, फ़ूड डिलिवरी और क्विक कॉमर्स जैसे सेक्टर निवेश के लिए बेहतर मौक़े पेश करते हैं. हम अगले कुछ सालों में इन सेक्टरों में वृद्धि की उम्मीद करते हैं. ये अल्पाधिकार बिज़नस हैं. व्यावसायिक अर्थशास्त्र में सुधार हो रहा है; कंपनियां लाभप्रदता के अपने रास्ते के प्रति काफ़ी अनुशासित हो गई हैं और एक निश्चित स्तर पर पहुंच गई हैं। इसलिए, अगर हमें कोई ऐसी कंपनी मिलती है जो ग्राहक के लिए वैल्यू लाती है, जिसमें अच्छी तरह काम करने की क्षमताएं हैं, और निरंतर आधार पर इनोवेट है, तो ग्रोथ का एक बड़ा रास्ता है.

वर्तमान में, मिड और स्मॉल-कैप स्पेस में वैल्यू ढूंढना काफी मुश्किल काम हो सकता है. क्या ऐसे विशिष्ट सेक्टर या बिज़नस हैं जहां आप आज संभावित वैल्यू देखते हैं?

भारत वर्तमान में एक बुल मार्केट में है, और हम एक आर्थिक चक्र के शुरुआती दौर हैं. हालांकि, हाल ही में बाज़ार में तेज़ी ने मूल्यांकन को और ज़्यादा महंगा बना दिया है. लेकिन हम एक पूंजीगत व्यय-संचालित चक्र में हैं जो सात से 10 साल तक चलने वाला है. मैं बिजली सेक्टर से एक मिसाल देना चाहूंगा हम वर्तमान में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में रह रहे हैं, और अगर AI का विकास जारी रहा, तो हमें बड़ी संख्या में डेटा सेंटरों की ज़रूरत होगी. उन डेटा सेंटरों को चलाने के लिए हमें बिजली की ज़रूरत होगी. इलेक्ट्रिक वाहनों और सभी गांवों के विद्युतीकरण के लिए बिजली की ज़रूरत होती है. नतीजतन, अगले दशक में बिजली सेक्टर में पूंजीगत व्यय में तेज़ी से वृद्धि होनी चाहिए. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि भारत अकेले बिजली के बुनियादी ढांचे पर करीब आधा ट्रिलियन डॉलर ख़र्च करेगा. इसलिए, ये कई साल लंबा मौक़ा है. हां, वैल्यूएशन थोड़ा महंगा हो गया है. लेकिन अगर आप अपना टाइम होराइज़न (समय सीमा) बढ़ाते हैं, तो इनमें से बहुत से मौक़े अभी भी आपके लिए पैसे कमाने वाले हैं.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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