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सट्टेबाज़ी निवेश नहीं

गिरते हुआ बाज़ार के सबसे नीचे पहुंच जाने पर निवेश करने का लालच बहुत बड़ा होता है, मगर अक्सर मूर्खतापूर्ण साबित होता है.

गिरते हुआ बाज़ार के सबसे नीचे पहुंच जाने पर निवेश करने का लालच बहुत बड़ा होता है, मगर अक्सर मूर्खतापूर्ण साबित होता है.Anand Kumar

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इक्विटी मार्केट में, हर दिन ख़रीदने और बेचने वालों के बीच मुक़ाबला होता है, लेकिन शायद ही कभी ये लड़ाई इतनी एकतरफ़ा होती है, जितनी इस साल 4 जून को हुई, जब इंडेक्स एक साथ 9 प्रतिशत तक गिर गए. इस तरह के किसी भी दिन की तरह, बेच कर भागने की कोशिश करने वालों में भगदड़ मची हुई थी. हालांकि, कुछ लोगों ने 19वीं सदी के ब्रिटिश फ़ाइनेंसर नाथन रोथ्सचाइल्ड की कही बात पर ज़्यादा ध्यान दिया, "ख़रीदने का समय तब होता है जब सड़कों पर ख़ून बह रहा हो." या शायद उन्हें वॉरेन बफ़े का ध्यान आ गया, जिन्होंने कहा था कि निवेशकों के लिए ये समझदारी की बात है कि "जब दूसरे लालची हों तो डरें और तभी लालची बनें जब दूसरे डरे हुए हों."

जो भी हो, असल में ऐसे कई निवेशक थे जिन्होंने बाज़ारों द्वारा पेश की जा रही कम क़ीमतों पर ख़रीदारी का फ़ैसला किया. यहां तक कि कई म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों ने भी इस सौदेबाज़ी में कूदने का फ़ैसला लिया और उस दिन के कम NAV पर हाथ साफ़ करने के लिए ऑनलाइन ऐप पर अपनी ख़रीद के ऑर्डर आनन-फ़ानन में डालने की कोशिश की. हालांकि, सुनने में आया कि ऑनलाइन फ़ंड के इन्वेस्टमेंट सिस्टम में किसी तरह का झोल था जिसके चलते बहुत से निवेशकों के ऑर्डर में देर हुई. नतीजा ये हुआ कि कई निवेशकों के हाथ 4 जून के NAV के बजाय 5 जून का NAV आया. जो आमतौर पर ज़्यादातर इक्विटी फ़ंड्स के लिए क़रीब 3 प्रतिशत ज़्यादा था.

दरअसल, म्यूचुअल फ़ंड में ऑनलाइन निवेश करना एक मल्टी डाइमेंन्शन का डिजिटल बैले डांस है, जिसमें यूज़र का ऐप, बैंक, क्लियरिंग हाउस, BSE StAR सिस्टम (आमतौर पर), म्यूचुअल फ़ंड और उसका रजिस्ट्रार सभी शामिल होते हैं. लगता है, 4 जून को इस चेन के कुछ हिस्से धीमे हो गए थे और कई निवेशक उस दिन के NAV पर अपने निवेश में प्रवेश नहीं कर पाए. ये भी हो सकता है कि कुछ लोगों के साथ ऐसा हर रोज़ होता हो, लेकिन ग़ुस्सा तो ऐसे ही मौक़े पर आता है जब—एक दिन भारी गिरावट का फ़ायदा उठाना हो और उसके अगले ही दिन तेज़ रिकवरी हो जाने की उम्मीद हो.

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देखिए, सिस्टम को तो और ज़्यादा मज़बूत बनाया ही जाना चाहिए, मगर मैं ये भी कहना चाहता हूं कि म्यूचुअल फ़ंड इस तरह के तेज़ एक्शन वाली ट्रेडिंग के लिए बिल्कुल सही नहीं हैं. मुझे यक़ीन है कि हर म्यूचुअल फ़ंड निवेशक जानता है कि बाज़ार 'टाइम करने' (आगे क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाने) के बजाय लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट के लिए डिज़ाइन किए गए हैं. व्यवस्थित तरीक़े से की गई ख़रीदारी और उतार-चढ़ाव के दौरान 'ख़रीदो और रखे रहो' की रणनीति ऐतिहासिक रूप से म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के लिए ज़्यादा समझदारी भरा नज़रिया रही है. जो लोग थोड़े से अर्से में बाज़ार के उतार-चढ़ाव का फ़ायदा उठाना चाहते हैं, उनके लिए निवेश के दूसरे तरीक़े जैसे डेरिवेटिव बेहतर (या 'बद्तर') रहेंगे. हालांकि 4 जून को जिन निवेशकों पर असर पड़ा, उनके लिए सिस्टम की गड़बड़ी काफ़ी निराश करने वाली थी. लेकिन ये एक रिमाइंडर का काम करता है कि म्यूचुअल फ़ंड धीरज से पूंजी कमाने के लिए हैं, अफ़रातफ़री वाली ट्रेडिंग के लिए नहीं. दिन के अंत में, कम क़ीमत पर ख़रीदने और ऊंची क़ीमत पर बेचने की कोशिश एक आकर्षक खेल ज़रूर लगता है मगर इसमें जीतना मुश्किल होता है. ज़्यादातर म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के लिए, एक बेहतर रणनीति होगी कि वे सही एसेट एलोकेशन, नियमित निवेश और हर रोज़ बाज़ार की चाल के आधार पर ओवरट्रेडिंग के लालच से दूर रहें.

इक्विटी-आधारित म्यूचुअल फ़ंड एक ऐसी एसेट क्लास है जो बरसों और दशकों तक चलती है. इस पैमाने पर, एक दिन की चाल इतनी मायने नहीं रखती. भले ही आप ख़ुद को यक़ीन दिला लें कि नहीं, ये तो मायने रखती है. मगर सोचिए, क्या आपके पास एक दिन में इतना निवेश करने लायक़ कैश है कि आप अपने जीवन में कोई मायने रखने वाला बड़ा बदलाव ला सकें. बाज़ार के निचले या ऊपरी प्वाइंट को पकड़ने की कोशिश करना समझ में आता है, लेकिन अक्सर व्यावहारिक तौर पर ये बेकार ही साबित होता है.

अत्याधुनिक तकनीक और लाइव मार्केट डेटा पाने वाले पेशेवर ट्रेडरों के लिए भी एंट्री और एग्ज़िट का सही समय तय करना बड़ा मुश्किल होता है. रिटेल म्यूचुअल फ़ंड निवेशक के लिए, तो ये काम और भी दुरूह हो जाता है. बेहतर तो ये होगा कि निवेश का एक अनुशासित प्लान बनाएं, अपने लक्ष्यों और जोख़िम सहने की क्षमता के आधार पर अपना निवेश तय करें और बाज़ार में रोज़ाना होने वाले उतार-चढ़ावों के शोर को अनसुना करें. हो सकता है कि कम NAV पा जाना, मनोवैज्ञानिक रूप से उत्साहित करने वाला हो, लेकिन कुल मिला कर ये अर्थहीन है. जो निवेशक ऐसा कर पाते हैं, वो वास्तव में लालची होते हैं, जबकि दूसरे ऐसे लोग डरे हुए होते हैं जो क़ीमतें कम होती हैं तो ख़रीदते हैं लेकिन उतार-चढ़ाव के दौरान निवेश में बने रहते हैं. शायद जोश में आकर की जाने वाली ट्रेडिंग को रोकने वाली सिस्टम की गड़बड़ी कुछ लोगों के लिए एक वरदान साबित हुई हो.

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