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अब ऑक्शन से होगी शेयर बाज़ार की क्लोज़िंग

लंबे समय के के निवेशकों के लिए कुछ नहीं बदला, पर इंडेक्स फ़ंड और ट्रेडरों के लिए क्लोज़िंग का तरीक़ा अब अलग है

लंबे समय के के निवेशकों के लिए कुछ नहीं बदला, पर इंडेक्स फ़ंड और ट्रेडरों के लिए क्लोज़िंग का तरीक़ा अब अलग हैUjjal Das/AI-Generated Image

सारांशः शेयर बाज़ार ने क्लोज़िंग प्राइस तय करने का तरीक़ा बदल दिया है. ज़्यादातर निवेशक इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. पर अगर आपके पास इंडेक्स फ़ंड, ETF हैं या आप F&O शेयरों में ट्रेड करते हैं, तो यह छोटा सा बदलाव आप पर कुछ ऐसे तरीक़ों से असर डाल सकता है, जो तुरंत साफ़ नज़र नहीं आते.

3 अगस्त 2026 से, F&O सेगमेंट के हर शेयर का क्लोज़िंग प्राइस अब 30 मिनट के औसत के बजाय एक ऑक्शन से आएगा. लॉन्ग-टर्म के निवेशकों को कुछ नहीं करना है. ट्रेडरों, इंडेक्स फ़ंड और आर्बिट्राज फ़ंड को एक नया तरीक़ा सीखना है.

क्या बदला है

30 साल से भी ज़्यादा समय तक, क्लोज़िंग प्राइस दोपहर 3:00 से 3:30 बजे के बीच हुए सभी सौदों का वॉल्यूम-वेटेड औसत (VWAP) होता था. दिलचस्प बात यह कि उस क़ीमत पर असल में कोई सौदा करता ही नहीं था. वो तो बस एक हिसाब था, कोई असली लेन-देन नहीं.

अब जिन क़रीब 200 शेयरों में फ़्यूचर्स और ऑप्शंस चलते हैं, उनमें दोपहर 3:15 बजे सामान्य ट्रेडिंग रुक जाती है और वो एक क्लोज़िंग ऑक्शन सेशन (बंद होने वाली नीलामी) में चले जाते हैं. ख़रीदने और बेचने के सारे ऑर्डर एक ही जगह जमा होते हैं. फिर एक्सचेंज वो एक क़ीमत खोजता है जिस पर सबसे ज़्यादा शेयर ख़रीदे-बेचे जा सकें, उसी क़ीमत पर सारे मिलते-जुलते ऑर्डर पूरे करता है और उसे ही आधिकारिक क्लोज़ घोषित कर देता है. बाक़ी शेयर अब भी पुराने तरीक़े से दोपहर 3:30 बजे बंद होते हैं, पर NSE कहता है कि यह बदलाव धीरे-धीरे लागू होगा, इसलिए मान लीजिए कि आगे वो भी यही अपनाएंगे. 

नया समय-चक्र 

ऑक्शन दोपहर 3:15 बजे से 3:35 बजे तक चलता है. पहले पांच मिनट में एक्सचेंज एक संदर्भ (रेफरेंस) क़ीमत तय करता है, यानी 3:00 से 3:15 बजे के बीच हुए सौदों का VWAP. इस दौरान स्टॉप-लॉस ऑर्डर रद्द कर दिए जाते हैं और आइसबर्ग ऑर्डर, यानी वो जो अपना ज़्यादातर आकार छिपाकर रखते हैं, उन पर रोक लग जाती है. अगले पांच मिनट में मार्केट और लिमिट, दोनों तरह के ऑर्डर लगाए, बदले या रद्द किए जा सकते हैं. 3:25 बजे के बाद सिर्फ़ लिमिट ऑर्डर चलते हैं, और यह विंडो 3:28 से 3:30 बजे के बीच किसी भी पल, जो सिस्टम ख़ुद चुनता है, अचानक बंद हो जाती है. ऐसा इसलिए, ताकि कोई आख़िरी पल में ऑर्डर लगाकर क्लोज़ को अपने हिसाब से न धकेल सके. इसके बाद ऑर्डर आपस में मिलाए जाते हैं और क़ीमत 3:35 बजे तक आ जाती है. एक बात और, कोई भी ऑर्डर संदर्भ क़ीमत से 3% से ज़्यादा दूर नहीं जा सकता.

इक्विटी डेरिवेटिव अब 3:40 बजे तक यानी दस मिनट ज़्यादा ट्रेड होते हैं, ताकि ट्रेडर उस शेयर का क्लोज़ पता चलने के बाद अपनी पोज़ीशन ठीक कर सकें.

पहले दिन क्या हुआ

पहला दिन थोड़ा बेतरतीब रहा. निफ़्टी क्लोज़ पर अचानक उछल गया, पर सेंसेक्स नहीं. ये दोनों इंडेक्स आमतौर पर साथ-साथ चलते हैं, पर उस दिन अलग-अलग बंद हुए. वजह यह कि एक अकेला ऑक्शन प्रिंट किसी इंडेक्स को उतना तेज़ हिला देती है, जितना 30 मिनट का औसत कभी नहीं हिलाता था. आर्बिट्राज़ करने वाले और मार्केट मेकर, जो आमतौर पर संंबंधित क़ीमतों को एक बराबर रखते हैं, वो पहले ऑक्शन से दूर ही रहे, बस यह देखने के लिए कि यह काम कैसे करती है. पूल में बेचने वाले कम थे, इसलिए ख़रीद के ऑर्डर ने कई बड़े शेयरों को 3% की सीमा के एकदम ऊपर तक धकेल दिया. सिस्टम तो ठीक चले; गड़बड़ बस क़ीमतों में हुई.

स्पॉट और फ़्यूचर्स के बीच का अजीब फ़ासला

इस गड़बड़ी की वजह से निफ़्टी, निफ़्टी फ़्यूचर्स से क़रीब 110 पॉइंट ऊपर बंद हुआ. आमतौर पर तो फ़्यूचर्स ही स्पॉट से थोड़ा ऊपर ट्रेड होते हैं, क्योंकि फ़्यूचर्स की क़ीमत में एक्सपायरी तक पैसे की लागत जुड़ी रहती है. स्पॉट का फ़्यूचर्स से ऊपर बंद होना तो लगभग कभी नहीं होता, और इतने बड़े फ़ासले से तो बिल्कुल नहीं.

यह बात आर्बिट्राज़ फ़ंड के लिए सबसे ज़्यादा मायने रखती है, जो एक शेयर ख़रीदते हैं और उसी का फ़्यूचर बेच देते हैं, ताकि दोनों के फ़र्क़ से कमाई कर सकें. इनकी NAV क्लोज़िंग प्राइस से अपने आप बन जाती है; फ़ंड हाउस उसकी जगह अपनी कोई अलग राय नहीं रख सकते. इसलिए बढ़ाए हुए स्पॉट क्लोज़ ने काग़ज़ पर उस फ़ासले को चौड़ा कर दिया और एक दिन के लिए आर्बिट्राज़ फ़ंड की NAV बढ़ा दी. पर वो उछाल कोई असली मुनाफ़ा नहीं था. जिन निवेशकों ने सोमवार को पैसा निकाला, उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा पैसा मिल गया. और जिन्होंने एंट्री ली, उन्होंने अपनी यूनिट के लिए ज़्यादा पैसा चुका दिया, और यह फ़ायदा क़ीमतों के सामान्य होते ही उलट जाना चाहिए. पर जो कोई निवेश में बना रहता है, उसके लिए यह सारा शोर आपस में कट जाता है: स्पॉट और फ़्यूचर्स एक्सपायरी पर आकर मिल जाते हैं और फ़ंड का पूरा रिटर्न उसे मिल जाता है.

पर एक जोख़िम अब भी बना हुआ है. निफ़्टी डेरिवेटिव हर मंगलवार को एक्सपायर होते हैं और उनका फाइनल सेटलमेंट उस शेयर के क्लोज़ के हिसाब से होता है. सोमवार वाली गड़बड़ एक ऐसे दिन आई जो एक्सपायरी का नहीं था, इसलिए नुक़सान सीमित रहा. पर अगर यही एक्सपायरी वाले दिन दोबारा हो, तो इससे ट्रेडरों के बीच असली सेटलमेंट का पैसा इधर से उधर हो जाएगा. इसलिए ध्यान रखिए कि इसकी असली परीक्षा होने से पहले एक्सचेंज इस तरीक़े को और कसते हैं या नहीं.

यह बदलाव अच्छा क्यों है

पुराने औसत वाले तरीक़े में एक बुनियादी ख़ामी थी. एक इंडेक्स फ़ंड इंडेक्स से मिलान का वादा करता है, और इंडेक्स क्लोज़िंग प्राइस पर बनता है. पर कोई भी फ़ंड उस क़ीमत पर ख़रीद ही नहीं सकता था, जो 30 मिनट के सौदों से बाद में निकाली जाती हो. वो अपनी ख़रीदारी पूरे आधे घंटे में फैलाता और उम्मीद करता कि उसका औसत उस क़ीमत के क़रीब पहुंच जाए. यही फ़र्क़ ट्रैकिंग एरर बन जाता, जिसकी क़ीमत आपको चुकानी पड़ती थी. यह ऑक्शन इसी को ठीक करता है: क्लोज़ अब एक असली सौदा है और MSCI या FTSE के रीबैलेंसिंग वाले दिन कुछ हज़ार करोड़ घुमाने वाला फ़ंड भी, ठीक क्लोज़िंग प्राइस पर सौदा कर सकता है. मुंबई अब न्यूयॉर्क, लंदन, फ़्रैंकफ़र्ट और टोक्यो की क़तार में आ खड़ा हुआ है, जो सालों से इसी तरह बंद होते आए हैं.

आपको क्या करना चाहिए

अगर आप SIP से निवेश करते हैं और सालों तक रखते हैं, तो कुछ नहीं. किसी कारोबार की क़ीमत इसलिए नहीं बदल जाती कि उसका क्लोज़िंग प्राइस औसत निकालने के बजाय एक ऑक्शन में तय हुआ.

अगर आपके पास इंडेक्स फ़ंड या ETF हैं, तो यह बदलाव आपके हक़ में काम करता है. ख़ासकर रीबैलेंसिंग वाले दिनों में, ट्रैकिंग एरर घटना चाहिए. अगले साल भर में अपने फ़ंड की बताई ट्रैकिंग डिफ़रेंस पर नज़र रखिए; यह आपको बता देगी कि आपका फ़ंड हाउस इस ऑक्शन का सही इस्तेमाल कर रहा है या नहीं.

अगर आपके पास कोई आर्बिट्राज़ फ़ंड है, तो शांत रहिए. पिछले दो दिनों की NAV वाली हलचल बस एक हिसाब-किताब का शोर है और आपका पूरा रिटर्न एक्सपायरी पर मिल जाएगा. क्लोज़िंग प्राइस के जमने तक, जो शायद कुछ ही दिनों में हो जाए, न तो एकमुश्त नया पैसा लगाइए और न ही निकालिए.

और अगर आप F&O शेयरों में इंट्राडे ट्रेड करते हैं, तो नई समय-सीमा का ध्यान रखिए. लगातार ट्रेडिंग अब 3:15 बजे ख़त्म हो जाती है और आपके स्टॉप-लॉस ऑर्डर भी उसी के साथ ख़त्म हो जाते हैं. इसलिए या तो उससे पहले अपना सौदा पूरा कर लीजिए या फिर इस ऑक्शन का इस्तेमाल करना सीख लीजिए.

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