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हमारे घरों के अदृश्य ख़रीदार

काला धन हाउसिंग मार्केट को बिगाड़ देता है और उन लोगों की पहुंच से बाहर कर देता है जिन्हें असल में घर ख़रीदने की ज़रूरत है

काला धन हाउसिंग मार्केट को बिगाड़ देता है और उन लोगों की पहुंच से बाहर कर देता है जिन्हें असल में घर ख़रीदने की ज़रूरत हैAditya Roy/AI-Generated Image

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हाल ही में एक दोस्त ने गुरुग्राम के घरों की क़ीमतों पर एक वायरल सोशल मीडिया थ्रेड शेयर किया. इसने शहरी भारत की एक गहरी परेशानी को छू लिया. थ्रेड में एक ऐसे व्यक्ति का ज़िक्र था जो एक साल में ₹20 लाख कमाता है — यानी भारत में टॉप 5% कमाई करने वालों में शामिल है — लेकिन फिर भी अपने शहर में एक आम फ़्लैट भी नहीं ख़रीद सकता. हर प्रोजेक्ट की शुरुआत ढाई करोड़ से होती है, जिनमें इन्फ़िनिटी पूल और इटालियन मार्बल जैसी चीज़ें हैं, जिन्हें वो न तो चाहता है, न उसे उनकी ज़रूरत है.

ये समस्या सिर्फ़ गुरुग्राम की नहीं है. मुंबई के उपनगरों से लेकर बेंगलुरु के बाहरी इलाक़ों तक यही कहानी बार-बार दोहराई जाती है. युवा प्रोफ़ेशनल, शादी करने वाले जोड़े, और मिडिल क्लास के बचत करने वाले लोग जहां काम करते हैं और रहना चाहते हैं, उन बाज़ारों से बाहर हो चुके है. आप वैध आमदनी को प्रॉपर्टी के दामों से जोड़कर देखिए, तो गणित बिल्कुल नहीं बैठेगा. फिर भी ये फ़्लैट बिकते हैं. तो सवाल उठता है — जब ₹20 लाख कमाने वाला नहीं ख़रीद सकता, तो आख़िर इन्हें ख़रीद कौन रहा है?

इस सवाल का जवाब सबको पता है, और काफ़ी वक़्त से पता है. एक 'दिखाई देने वाला' मार्केट है — जहां आमदनी घोषित की जाती है और दाम पारदर्शी होते हैं. और फिर एक न दिखाई देने वाला 'अदृश्य' मार्केट है — जहां छिपाया गया पैसा बेहद आसानी से पार्क किया जाता है.

भारत में रीयल एस्टेट हमेशा से काले धन की सबसे पसंदीदा जगह रही है. लेकिन हाल के वर्षों में इसकी भूमिका और भी बड़ी हो गई है. बैंकिंग का डिजिटल हो जाना, यूनिवर्सल केवाईसी, और आधार से जोड़े जाने की वजह से मोटे कैश को छिपाकर रखना लगभग नामुमकिन हो गया है. बैंक अकाउंट में डिजिटल ट्रेल यानी साक्ष्य रह जाते हैं. म्यूचुअल फ़ंड के लिए पैन ज़रूरी है. यहां तक कि एक तय सीमा से ऊपर सोना ख़रीदने पर भी रिपोर्ट करना ज़रूरी हो जाता है.

लेकिन प्रॉपर्टी का लेनदेन अब भी काफ़ी हद तक पर्दे के पीछे होता है. तमाम सुधारों के बावजूद, रीयल एस्टेट में कैश डील होना आज भी आम है — जो किसी और एसेट क्लास में मुमकिन नहीं. ये समानांतर अर्थव्यवस्था एक ख़तरनाक साइकिल बनाती है. हर कैश के लेनदेन में प्रॉपर्टी की क़ीमत को कृत्रिम रूप से बढ़ा देती है, जिससे ऐसे लोग इस मार्केट से बाहर हो जाते हैं जो ईमानदारी से आमदनी घोषित करते हैं. ₹20 लाख कमाने वाला सिर्फ़ अपने जैसे लोगों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहा होता. वो उन अमीर लोगों से टक्कर ले रहा होता है जो एक फ़्लैट को सिर्फ़ "बेनामी जमा" मानते हैं.

बात सिर्फ़ ऊंची क़ीमतों तक सीमित नहीं है. डवलपर, इस दोहरे सिस्टम को समझते हैं, और अपने प्रोजेक्ट को उसी हिसाब से डिज़ाइन करते हैं. इन्फ़िनिटी पूल, बायोमेट्रिक लिफ़्ट जैसी सुविधाएं इसलिए नहीं जोड़ी जातीं कि असल ख़रीदार उन्हें मांगते हैं — बल्कि इसलिए क्योंकि कैश से भुगतान करने वाले उन्हें 'निवेश' की तरह देखते हैं. जितना ज़्यादा लग्ज़री, उतना ज़्यादा दाम, उतना ज़्यादा कैश!

वहीं, सच्चा होमबायर — वो सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, बैंक मैनेजर या टीचर जिसकी आमदनी पूरी तरह काग़ज़ों में दर्ज है — अपने ही शहर से बाहर हो जाता है. उसे कहा जाता है कि टियर-2 सिटी देखो या लोकेशन पर समझौता करो. मतलब साफ़ है: 'अदृश्य' बायर की मनी लॉन्डरिंग की क़ीमत वो चुका रहा है.

ये सिर्फ़ पैसे की मुश्किल नहीं है — ये समाज में नैतिक असमानता की जड़ है. जो लोग ईमानदारी से टैक्स भरते हैं, जिनकी हर कमाई का ब्यौरा जांचा जा सकता है, वो ऐसे मार्केट में हारते हैं जहां कुछ लोग बिना नियमों के खेलते हैं. समाधान भी हमें वहीं से मिलेगा जहां बैंकिंग और फ़ाइनेंस सेक्टर को मिला — डिजिटलीकरण.

जैसे बैंकिंग को कैवाईसी और डिजिटल पेमेंट ने पारदर्शी बनाया, वैसे ही रीयल एस्टेट में भी हर पेमेंट, हर ट्रांसफ़र, और हर डील डिजिटल ट्रेल पर आधारित होनी चाहिए.

आसान नहीं, लेकिन ज़रूरी है. रीयल एस्टेट में बहुत ताक़तवर लॉबी हैं. बहुत से लोगों को इस अपारदर्शिता से फ़ायदा होता है. लेकिन विकल्प इससे भी बुरा है — एक ऐसा मार्केट जिसमें ईमानदार लोग घर नहीं ले सकते, और बेनामी दौलत पनाह पा रही हो. कुछ लोग कहेंगे कि इससे प्रॉपर्टी के दाम क्रैश कर जाएंगे, जिससे मौजूदा मकान मालिकों और क़र्ज देने वालों को नुक़सान होगा.

ये डर समझ में आता है, लेकिन ग़लत है. मकान का मतलब होना चाहिए — एक सुरक्षित छत और असली दौलत बनाने का ज़रिया. अगर पारदर्शिता से दाम गिरते हैं, तो वो पहले से ही चढ़े हुए थे.

सरकार ने बीते दशक में बैंकिंग, टेलीकॉम और यहां तक कि स्ट्रीट वेंडर पेमेंट को भी डिजिटल दायरे में लाने में ज़बरदस्त राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई है. अब बारी रीयल एस्टेट की है.

एक युवा, जो साल में ₹20 लाख कमाता है, उसे अपने ही शहर में घर न मिलना मार्केट की, और सिस्टम की एक बड़ी असफलता है. इसे दुरुस्त करना ज़रूरी है — पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ.

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