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नुक़सान की अहमियत

जब कभी मुनाफ़ा न कमाने वाली कंपनियां आपके पैसे को अपनी तरफ़ लुभाएं

जब कभी मुनाफ़ा न कमाने वाली कंपनियां आपके पैसे को अपनी तरफ़ लुभाएंAditya Roy/AI-Generated Image

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भारतीय शेयर बाज़ार एक बार फिर उन IPOs की नई लहर के लिए तैयार हो रहे हैं जिन्हें आजकल ‘डिजिटल IPOs’ कहा जा रहा है. इनके नाम के साथ नए शब्द जुड़ते रहते हैं - प्लेटफ़ॉर्म, AI, टेक्नोलॉजी-सक्षम वगैरह. लेकिन मेरी परिभाषा इससे कहीं सरल और सटीक है: ऐसी कंपनियां जो कभी मुनाफ़ा नहीं कमा पाई हैं - और शायद कभी कमाएंगी भी नहीं.

घाटे में चल रही इन डिजिटल कंपनियों से जो असली नुक़सान होता है, वो केवल ज़्यादा क़ीमत पर IPO लेकर निवेशकों के पैसे गंवाने तक सीमित नहीं है. ये उस बुनियादी सिद्धांत पर चोट करता है जिस पर मार्केट पर आधारित इकोनॉमीज़ टिकी होती हैं.

सोचिए - मार्केट इकोनॉमी एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था की तुलना में ज़्यादा वेल्थ और ग्रोथ क्यों पैदा करती है? कारण है असफलता (failure). एक मार्केट इकोनॉमी की सबसे बड़ी ताक़त ये है कि सिर्फ़ अच्छी कंपनियां ही सफल नहीं होतीं, बल्कि बुरी कंपनियां असफल होकर बाहर हो जाती हैं. जो बिज़नेस मुनाफ़ा नहीं कमा सकते, उन्हें जल्दी बंद होना पड़ता है, जिससे संसाधन (resources) मुक्त होकर बेहतर कंपनियों में प्रवाहित होते हैं.

लेकिन आज का पूरा टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम बिल्कुल उलटे ढंग से काम कर रहा है. पूंजी लगातार उन बिज़नेस में जाती है जो टिकाऊ नहीं हैं - महीनों या सालों तक नहीं, बल्कि दशकों तक नहीं. इसका असर कर्मचारियों, प्रतिस्पर्धियों और ग्राहकों - तीनों पर पड़ता है. भारत समेत दुनिया भर में, पारंपरिक टैक्सी सर्विसेज़ को ऐसी कंपनियों ने बाधित किया है जो आज तक मुनाफ़ा नहीं कमा पाई हैं. नतीजा ये हुआ कि इन कंपनियों ने किराए बढ़ा दिए, पारंपरिक टैक्सी सर्विसेज़ तबाह कर दीं और चालक व ग्राहक दोनों का नुक़सान हुआ. हाल के दौर में, क्विक ग्रॉसरी डिलीवरी कंपनियां पारंपरिक किराना दुकानों को प्रभावित कर रही हैं. इसके अंजाम का अभी से अनुमान लगाया जा सकता है.

असल में, ये नया टेक सेक्टर भारत के पुराने पब्लिक सेक्टर जैसा दिखने लगा है - जहां पैसा लगातार आता रहता है, चाहे मुनाफ़ा हो या नहीं, और आखिरकार वो आर्थिक संकट में बदल जाता है. पहले तक तो विदेशी वेंचर कैपिटल और निवेशकों के पैसे से ये सिलसिला चलता था, जो जोखिम समझते थे. लेकिन अब जब ये धोखा भारतीय इक्विटी मार्केट में शिफ्ट हो गया है, तो नए पीड़ित वर्ग के रूप में इसके साथ भारतीय खुदरा निवेशक (retail investors) जुड़ गए हैं.

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इन खुदरा निवेशकों को लुभाने के लिए जो मार्केटिंग मशीनरी तैनात की गई है, वो बेहद तेज़ है. एक ताज़ा उदाहरण लीजिए: एक जानी-मानी रिटेल कंपनी जल्द ही अत्यधिक ऊंचे वैल्यूएशन पर IPO लाने की तैयारी में है. हाल ही में एक प्रतिष्ठित निवेशक ने इसी IPO के अनुमानित ऊपरी दायरे में कुछ शेयर खरीदे. ये निवेश राशि भले ही बहुत छोटी हो, लेकिन उसका नाम देखकर हज़ारों करोड़ रुपये के खुदरा निवेशक ये सोचकर आकर्षित होंगे कि जहां बड़ा नाम है, वहां सुरक्षा भी है. लेकिन ये भ्रम है. बड़ी विडंबना ये है कि तकनीक की दुनिया में, गूगल या अमेज़न जैसी कुछ ही कंपनियां हैं जो सच्ची सफलता और मुनाफ़ा कमा पाती हैं. इनसे कहीं ज़्यादा बड़ी संख्या उन कंपनियों की है जिन्होंने कभी पैसा नहीं कमाया और शायद कभी कमाएंगी भी नहीं. इनमें से कई भारत में भी हैं.

खुदरा निवेशकों के लिए समाधान बहुत सीधा है: दूरी बनाए रखें. ऐसे IPOs का मकसद आपकी जेब से पैसा निकालकर प्रमोटर्स और शुरुआती निवेशकों की जेब में डालना है. सारी जानकारी का फ़ायदा सेलर्स के पास होता है - कब पब्लिक होना है, किस कीमत पर, यह सब वे तय करते हैं.

ज़रा सोचिए - प्रमोटर्स और पुराने निवेशक अपने बिज़नेस की हर ताकत, कमजोरी और जोखिम को जानते हैं. वे तभी बेचते हैं जब उनके लिए सबसे मुफ़ीद वक्त होता है - यानी जब वैल्यूएशन ऊंचे हों और बाज़ार में जोश चरम पर हो. वॉरेन बफ़े ने कहा भी है: IPO एक नेगोशिएटेड ट्रांज़ैक्शन है, और शायद ही कभी ये आपके लिए अनुकूल समय पर होता है. आप केवल उस सजे-संवरे प्रॉस्पेक्टस पर निर्भर रहते हैं जो वे आपको दिखाते हैं.

हमेशा बेहतर विकल्प सेकेंडरी मार्केट में मौजूद होते हैं - ऐसी कंपनियां जिनके बिज़नेस मॉडल खुद को साबित कर चुके हैं, जो वाकई मुनाफ़ा कमा रही हैं और जिनका वैल्यूएशन तर्कसंगत है. अगर संस्थागत निवेशक या वेंचर कैपिटलिस्ट्स घाटे में चल रहे बिज़नेस पर दांव लगाना चाहते हैं, तो उन्हें लगाने दें. हम बाक़ी निवेशकों को केवल उन्हीं कंपनियों में निवेश करना चाहिए जो असल में पैसा कमाती हैं.

खराब कंपनियों को असफल होना चाहिए - और जल्दी होना चाहिए. आधुनिक वित्तीय जगत की विडंबना ये है कि अब वही इस प्रक्रिया को रोकने में लगा है.

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