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FOMO को अपना पैसा हाईजैक न करने दें

क्यों हॉट आइडिया के पीछे भागना नुक़सानदेह है और लगातार निवेश करना फ़ायदेमंद है

क्यों हॉट आइडिया के पीछे भागना नुक़सानदेह है और लगातार निवेश करना फ़ायदेमंद हैAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः जब आसपास का हर व्यक्ति अचानक शेयर बाज़ार का माहिर लगने लगता है, तो FOMO काफ़ी असर करता है. ये लेख बताता है कि “हॉट” आइडिया के पीछे भागने से असली रिटर्न को क्यों नुक़सान पहुंचता है और तेज़ शोर के बीच शांत कैसे रहना चाहिए.

आपको ये जानने के लिए CNBC की ज़रूरत नहीं होती कि बाज़ार अच्छा चल रहा है. बस किसी पार्टी में शामिल हो जाइए.

अचानक, वो कज़िन जो कभी मैसेज का जवाब नहीं देता था, स्टॉक टिप्स देता नज़र आता है. वो अंकल जो पहले ब्लड प्रेशर की बात करते थे, अब स्मॉल कैप्स की बात कर रहे होते हैं. आपके ऑफ़िस के व्हाट्सऐप ग्रुप में आधे जोक्स और आधे प्रॉफ़िट के स्क्रीनशॉट होते हैं. आप वहां बैठे अपनी बोरिंग SIP या उससे भी ज़्यादा बोरिंग FD के साथ सोच रहे होते हैं, “क्या मैं ही अकेला हूं, जो इतना आसान पैसा नहीं कमा रहा हूं.?”

वही डूबने जैसा एहसास आज एक नए नाम से जाना जाता है: FOMO - यानी कुछ छूट जाने का डर. असल ज़िंदगी में इसका मतलब होता है, “दूसरे लोग चालाक लग रहे हैं और मैं खुद पर शक कर रहा हूं.”

सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है: लोग मुनाफ़े की बात जोर-जोर से बताते हैं और नुक़सान बहुत धीरे. हमेशा वो स्क्रीनशॉट दिखेगा जिसमें उसका जिक्र होगा, जो उन्होंने ₹100 पर ख़रीदा और वो ₹150 का हो गया. वो स्क्रीनशॉट कम ही दिखेगा जिसमें उन्होंने ₹150 पर ख़रीदा और वो ₹80 हो गया. सोशल मीडिया पोर्टफ़ोलियो स्टेटमेंट नहीं है; ये बस अच्छा दिखने वाले पलों की झलक है.

जब हम वैल्यू रिसर्च में डेटा देखते हैं, एक साफ़ पैटर्न दिखता है: कोई कैटेगरी तभी पॉपुलर होती है जब उसमें तेज़ रैली आ चुकी होती है. पैसा परफ़ॉर्मेंस का अंदाज़ा लगाकर नहीं जाता, उसे देखकर भागता है. ये व्यवहार पूरे बाज़ार में दिखता है और हाल में इंफ़्रास्ट्रक्चर फ़ंड इसका अच्छा उदाहरण हैं.

अब मिलिए दो काल्पनिक निवेशकों: रोहन और मीरा से, जिनसे आप असल ज़िंदगी में ज़रूर मिले होंगे.

रोहन क्लासिक FOMO निवेशक है. उसे साथियों और रिश्तेदारों से किसी “स्टार” स्मॉल-कैप या सेक्टर फ़ंड की चर्चा सुनाई देती है. वो ऐप खोलता है, एक साल का बढ़िया रिटर्न देखता है, जलन और उत्साह का मिश्रण महसूस करता है और अपने सरल, डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड से पैसे हटाकर उसी “हॉट” आइडिया में डाल देता है.

मीरा बोरिंग है. उसने तीन साल पहले समझदारी दिखाते हुए, एक डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड में SIP शुरू की थी. उसने भी उसी हॉट फ़ंड के बारे में सुना है. पांच मिनट सोचती है, कंधे उचकाती है और अपने प्लान पर चलती रहती है.

अब इसी फ़्रेम को रोकिए और चार साल आगे बढ़ जाइए.

नतीजा बोरिंग है, लेकिन अहम है. रोहन को खुद पर गर्व महसूस हुआ, मीरा को लगा वो आउटडेटेड है. लेकिन मीरा का पैसा शांति से ज़्यादा बढ़ा. ये केवल कहानी नहीं है, डेटा बार-बार यही दिखाता है. जब हम “इन्वेस्टर रिटर्न” - यानी निवेशकों ने असल में क्या कमाया - और “फ़ंड रिटर्न” - यानी फ़ंड ने समय के साथ क्या दिया - की तुलना करते हैं, तो अक्सर बड़ा फ़र्क़ दिखता है. वजह साफ़ है: FOMO-आधारित टाइमिंग. लोग तेज़ रिटर्न के बाद फ़ंड में प्रवेश करते हैं और अगले मुश्किल दौर में धैर्य खो देते हैं.

FOMO का इतना असर क्यों होता है? पहली वजह, हम अलग दिखना पसंद नहीं करते. जब सब लोग किसी स्मॉल कैप, IPO या क्रिप्टो में लगे हों और आप न हों, तो लगता है ग़लती कर रहे हैं, चाहे आपकी योजना बिल्कुल ठीक हो. दूसरी वजह, दिमाग हालिया रिटर्न का पीछा करने के लिए बना है. फ़ंड टेबल में चमकता एक साल का रिटर्न जलेबी की प्लेट जैसा है: पता है ज़्यादा खाना ठीक नहीं, पर हाथ खुद बढ़ जाता है. तीसरी वजह, हम दोहराव को सच मान लेते हैं. जितनी बार कोई फ़ंड या थीम TV, यूट्यूब या व्हाट्सऐप पर सुनी जाए, उतनी ही “स्पष्ट” और “सुरक्षित” लगने लगती है.

वैल्यू रिसर्च में हमारा काम इस शोर के बीच थोड़ा बोरिंग होना है. हम लंबे समय के रोलिंग रिटर्न देखते हैं, सिर्फ़ पिछले साल के नहीं. हम देखते हैं कि फ़ंड गिरावट में कैसा रहा, सिर्फ़ तेज़ी में नहीं. हम उसकी इंडेक्स और साथियों से तुलना करते हैं और ये भी देखते हैं कि वो रिटर्न पाने के लिए कितना रिस्क लिया गया. ऐसा करने पर कई “हॉट आइडिया” उतने आकर्षक नहीं लगते.

तो अब सवाल है: FOMO भरी दुनिया में सबसे अलग हुए बिना कैसे शांत रहें?

पहले कदम के तौर पर खुद से पूछें: क्या आपका पोर्टफ़ोलियो आपके लक्ष्यों के लिए बन रहा है या दूसरों की बातचीत के लिए? बच्चे की कॉलेज फ़ीस को फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सहकर्मी ने पिछले महीने क्या ख़रीदा. रिटायरमेंट को आपके ब्रदर-इन-लॉ की 2017 की मल्टीबैगर कहानी से कोई मतलब नहीं. FOMO उनकी कहानी है; पर्सनल फ़ाइनेंस आपका अपना है.

दूसरा कदम है खुद को इंसान मानना. अगर एक्सपेरिमेंट करने की इच्छा रुकती नहीं, तो दिखावा मत करें कि आप इससे ऊपर हैं. बस इसे एक दायरे में रखें. तय करें कि आपके इक्विटी एलोकेशन का छोटा हिस्सा - मान लें 5 से 10 प्रतिशत - आपका “मैड मनी” हिस्सा है. ये पैसा आप थीम, सेक्टर, IPO या उस फ़ंड में निवेश कर सकते हैं जिसका ज़िक्र कज़िन बंद नहीं करता. बाकी 90-95 प्रतिशत पैसा शांत, सोचे-समझे प्लान में बने रहना चाहिए जो आपके लक्ष्यों और रिस्क लेने की क्षमता से मेल खाए. ऐसे में, आपके एक्सपेरिमेंट ग़लत भी हों - और कई होंगे - तो आपके भविष्य की सुरक्षा पर असर नहीं पड़ेगा.

तीसरा कदम है दूर की सोचना. एक साल के रिटर्न पर उलझने की जगह 7-10 साल के पूरे साइकल्स को देखिए.

सेक्टोरल फ़ंड कुछ समय के लिए चमके, फ़्लेक्सी-कैप टिके रहे

फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड ने लंबे समय में हल्की गिरावट के साथ टिकाऊ रिटर्न दिया है

कैटेगरी 1 साल का औसत रिटर्न  5 साल में औसत रिटर्न  7 साल में औसत रिटर्न  1 साल का न्यूनतम रिटर्न 
सेक्टोरल-बैंकिंग 13.1 10.5 11.2 -46
सेक्टोरल-इंफ़्रास्ट्रक्चर 16.9 12 10.1 -38.2
थीमैटिक-एनर्जी 17.4 13.7 12.2 -35.8
फ़्लेक्सी-कैप 14.4 13.4 12.9 -30.3
कैटेगरी में औसत फ़ंड. डेटा 2015 से 2025 तक 1,5 और 7-साल के रोलिंग बेसिस पर आधारित है.

जब हम वैल्यू रिसर्च में इस तरह फ़ंड देखते हैं, तो शांत और स्थिर फ़ंड ज़्यादा आकर्षक दिखते हैं. इसलिए नहीं कि वे हर टेबल में टॉप होते हैं, बल्कि इसलिए कि वे निवेशक को निवेशित बनाए रखते हैं.

अगली बार जब किसी पार्टी में एक फ़ंड या स्टॉक के बारे में सुनें, तो ये सरल नियम याद रखें: अगर एक साथ पांच लोग उसकी बात कर रहे हैं, तो संभव है कि आपको उसके बारे में देर से पता चला हो. इसका मतलब ये नहीं कि वो निवेश तुरंत ख़राब है. बस आपको ध्यान रखना है कि कि आपका फ़ैसला आपकी योजना के हिसाब से होना चाहिए, FOMO से नहीं.

बाज़ार की हर पार्टी में आप शामिल नहीं हो सकते. एक-दो छोटी पार्टियों में शामिल होना भी ठीक है. लेकिन असल वेल्थ लंबे, थोड़ा बोरिंग, भरोसेमंद रिश्ते में बनती है - न कि हर नए, चकाचौंध भरे रोमांच में.

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