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साल के अंत में दुनिया

अनुमान बेकार होते हैं, लेकिन हालात बहुत कुछ बता देते हैं.

अनुमान बेकार होते हैं, लेकिन हालात बहुत कुछ बता देते हैं.Aditya Roy/AI-Generated Image

साल के इस समय, फ़ाइनेंशियल मीडिया आने वाले 12 महीनों के अनुमानों से भर जाता है. सेंसेक्स कहां जाएगा? कौन-से सेक्टर बेहतर परफ़ॉर्म करेंगे? रुपया क्या करेगा? मुझे इन क़वायदों से कभी ज़्यादा फ़ायदा नहीं लगा, हालांकि कई बार मुझे भी इनमें शामिल कर लिया जाता है. ये अनुमान भविष्य के बारे में कोई ख़ास समझ नहीं देते और अगर कोई इनके पुराने रिकॉर्ड देख ले, तो ये बात साफ़ हो जाएगी. मुझे ज़्यादा उपयोगी ये लगता है कि दुनिया को जैसा है वैसा देखा जाए और ये सोचा जाए कि इन हालात का आम बचत करने वालों के लिए क्या मतलब निकलता है.

तो साल के ख़त्म होने के करीब ऐसी कुछ बातें हैं, जो मेरा ध्यान खींचती हैं.

वॉरेन बफ़े की बर्कशायर हैथवे के पास लगभग 300 अरब डॉलर नक़द पड़ा है. ये ऐसा व्यक्ति नहीं है जो आइडिया की कमी या हिम्मत हारने की वजह से नक़द जमा करता हो. ये वही शख़्स है जिसने सात दशक तक सही क़ीमत पर बिज़नेस ख़रीदे हैं और जब क़ीमत सही नहीं लगी, तो धैर्य से इंतज़ार किया है. जब दुनिया का सबसे सफल निवेशक इतनी बड़ी रक़म नक़द रखे हुए है, तो इसका मतलब है कि उसे मौजूदा क़ीमतों पर अमेरिकी बाज़ार में ज़्यादा आकर्षक मौक़े नहीं दिख रहे. ये भी चर्चा है कि वो जापान की तरफ़ देख रहे हैं, जहां ग्लोबल निवेशकों की दिलचस्पी दोबारा तेज़ हुई है. हो सकता है वहां उसे वो दिख रहा हो, जो अपने घर में नहीं दिख रहा. किसी भी हाल में, उसका नक़दी का ढेर नज़रअंदाज़ करने लायक़ नहीं है.

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सोने ने अपनी मज़बूत चाल जारी रखी है. पहले मैं सोने को लेकर काफ़ी शक़ी रहा हूं, फिर धीरे-धीरे इसे पोर्टफ़ोलियो इंश्योरेंस के तौर पर मानने लगा हूं. सेंट्रल बैंक लगातार सोना जमा कर रहे हैं, क्योंकि करेंसी रिज़र्व को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने की चिंता बढ़ रही है और पश्चिमी देशों की फ़िस्कल समझदारी पर सवाल उठ रहे हैं. सोना न तो कुछ पैदा करता है और न ही कंपाउंड करता है, लेकिन ऐसी दुनिया में जहां मौद्रिक धारणाओं पर सवाल उठ रहे हों, इसमें थोड़ा-सा निवेश अब पूरी तरह ग़लत नहीं लगता. मैं आज भी इसे किसी पोर्टफ़ोलियो का बड़ा हिस्सा नहीं बनाऊंगा, लेकिन इसे पूरी तरह ख़ारिज करना भी बंद कर चुका हूं.

क्रिप्टोकरेंसी एक बार फिर गिरावट के दौर में है. अब इसका पैटर्न काफ़ी जाना-पहचाना हो गया है. क़ीमतें तेज़ी से बढ़ती हैं, लेवरेज और सट्टेबाज़ी के दम पर, काग़ज़ पर करोड़पति बन रहे हैं. फिर गिरावट आती है और आख़िर में शोर-शराबे के चलते शामिल होने वाले लोग, सब कुछ गंवा बैठते हैं. अब ये साफ़ हो चुका है कि क्रिप्टोकरेंसी का किसी असली आर्थिक गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं है. ये अपने सबसे सीधे मतलब में एक फ़ाइनेंशियल एसेट है, एक ग्राफ़ पर बनी लाइन, जिसे ताक़तवर खिलाड़ी ऊपर-नीचे करके छोटे निवेशकों से पैसा निकालते हैं. ब्लॉकचेन और डिसेंट्रलाइज़ेशन की तकनीकी बातें शुरू से ही इस बुनियादी सच्चाई से ध्यान भटकाने का ज़रिया थीं.

शायद सबसे चौंकाने वाली बात सरकारों का क़र्ज़ को लेकर व्यवहार है. पिछली सभी सरकारों की तरह, अमेरिका में नई सरकार ने फ़िस्कल ज़िम्मेदारी का दिखावा चुपचाप छोड़ दिया है. क़र्ज़ बढ़ता जा रहा है और सत्ता में बैठे किसी व्यक्ति को इसे ठीक करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती. यूरोप ने तो बजट के मामले में अमेरिका से भी आगे निकलने की कोशिश की है. यूक्रेन को फ़ंड देने के लिए 90 अरब डॉलर उधार लेने का हालिया फ़ैसला ऐसे नियमों के साथ आया है, जो किसी व्यंग्य उपन्यास जैसे लगते हैं. शून्य ब्याज और मैच्योरिटी की तारीख़ किसी समय सीमा से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि रूस युद्ध का मुआवज़ा कब देता है. जब आप बिना लागत का क़र्ज़ बनाते हैं और उसकी वापसी किसी काल्पनिक भविष्य की घटना से जोड़ देते हैं, तो आप असल में कोई फ़ाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट जारी नहीं कर रहे. आप एक दुआ जारी कर रहे हैं.

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तो इन सबका आम भारतीय निवेशक के लिए क्या मतलब है? शायद उतना नहीं, जितना लगता है. ये बड़े स्तर की ताक़तें हैं, जो देशों और दुनिया के स्तर पर काम कर रही हैं. बचत करने वाले के तौर पर आपका काम ये अनुमान लगाना नहीं है कि ये कैसे आगे बढ़ेंगी या खुद को चतुराई से हर हालात के हिसाब से ढालना है. आपका काम है प्रोडक्टिव एसेट्स का एक समझदार, डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो बनाए रखना, ख़र्च कम रखना और हर ख़बर पर प्रतिक्रिया देने की आदत से बचना.

अगर बफ़े का नक़द का ढेर हमें कुछ बताता है, तो वो ये कि धैर्य एक बड़ा गुण है. अगर सोने की तेज़ी कुछ बताती है, तो वो ये कि मौद्रिक अव्यवस्था से बचाव के लिए थोड़ा-सा इंश्योरेंस रखना ग़लत नहीं है. अगर क्रिप्टो कुछ सिखाता है, तो वो ये कि शुद्ध सट्टेबाज़ी का सच आख़िरकार सामने आ ही जाता है. और अगर सरकारों का व्यवहार कुछ बताता है, तो वो ये है कि सत्ता में बैठे लोगों से पैसों के मामले में समझदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती.

जैसा हर साल रहा है, समझदारी भरा रास्ता आज भी वही है. इक्विटी के ज़रिये अच्छे बिज़नेस का मालिक बनिए, थोड़ा इंश्योरेंस रखिए, सट्टेबाज़ी से दूर रहिए और अनुमानों को नज़रअंदाज़ कीजिए, इसमें ये अनुमान भी शामिल है.

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