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बाज़ार ठहरने पर ICICI प्रू के फ़ंड मैनेजर वैल्यू कैसे तलाशते हैं

ICICI प्रूडेंशियल AMC के धर्मेश कक्कड़ बताते हैं कि बाज़ार की दिशा साफ़ न हो तो अनुशासन कैसे बनाए रखते हैं

ICICI प्रूडेंशियल AMC के धर्मेश कक्कड़ बताते हैं कि बाज़ार की दिशा साफ़ न हो तो अनुशासन कैसे बनाए रखते हैंAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः जब बाज़ार एक ज़्यादा शांत और अनुशासित दौर में प्रवेश करता है, तब यह लेख बताता है कि एक वैल्यू फ़ंड मैनेजर उन जगहों पर मौक़ा कैसे देखता है जहां उम्मीदें कम होती हैं, सेंटीमेंट नकारात्मक होता है और सुरक्षा का मार्जिन मौजूद होता है. साथ ही यह भी समझाता है कि वैल्यूएशन रीसेट होने के दौर में बड़े दांव लगाने से ज़्यादा ज़रूरी संयम क्यों होता है.

आज के बाज़ार न तो बहुत सस्ते हैं और न ही उत्साह से भरे हुए हैं. और यही इस दौर की असली पहचान है. पहले के ऊंचे स्तरों से वैल्यूएशन ठंडी पड़ी है, सेंटीमेंट संतुलित हुआ है और कई सेक्टरों में उम्मीदें अब एक साल पहले की तुलना में ज़्यादा ज़मीनी हो गई हैं. ऐसे माहौल में रिटर्न बाज़ार की दिशा का अनुमान लगाने से कम, और अनुशासन बनाए रखने से ज़्यादा आते हैं.

ICICI प्रूडेंशियल AMC में सीनियर फ़ंड मैनेजर MF धर्मेश कक्कड़ के लिए यह अनुशासन एब्सोल्यूट वैल्यू की बजाय रिलेटिव वैल्यू पर ध्यान देने से आता है. उनका फ़्रेमवर्क यह देखता है कि कोई स्टॉक या सेक्टर अपने ही इतिहास, रिटर्न मेट्रिक्स और कमाई के प्रोफ़ाइल के मुक़ाबले किस क़ीमत पर ट्रेड हो रहा है. वे उन हालात को तरजीह देते हैं जहां निराशा ज़्यादा हो, ग्रोथ को लेकर उम्मीदें कम हों और वैल्यूएशन में सुरक्षा का मार्जिन मिले. वहीं, जहां उम्मीदें बहुत ऊंची हों या टिकाऊ न लगें, ऐसे स्टॉक्स से वे दूरी बनाए रखते हैं.

कक्कड़, शंकरन नरेन और मासूमी झुरमरवाला के साथ मिलकर ₹60,391 करोड़ के ICICI प्रूडेंशियल वैल्यू फ़ंड को मैनेज करते हैं. यह फ़ंड वैल्यू कैटेगरी का सबसे बड़ा फ़ंड है और पिछले एक साल में इसने कैटेगरी के मुक़ाबले लगभग सात प्रतिशत ज़्यादा रिटर्न दिया है.

कहां वैल्यू काम करती है और कहां नहीं

कक्कड़ इस अप्रोच की सीमाओं को लेकर साफ़ सोच रखते हैं. उनके मुताबिक़, वैल्यू स्ट्रैटेजी तब सबसे अच्छा काम करती है जब बाज़ार में चौतरफ़ा तेज़ी हो, लीडरशिप फैली हुई हो और कई सेक्टर उसमें हिस्सा ले रहे हों. लेकिन जब तेज़ी सिर्फ़ कुछ गिने-चुने स्टॉक्स या किसी एक थीम से चलती है, तब वैल्यू स्ट्रैटेजी पीछे रह जाती है.

वे कहते हैं, “मोटे तौर पर, जो स्ट्रैटेजी हम अपनाते हैं, वह ब्रॉड-बेस्ड मार्केट रैली में अच्छा प्रदर्शन करती है. लेकिन किसी ख़ास सेक्टर या कुछ ही स्टॉक्स से चलने वाली सीमित रैली में इसका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहता.” वे 2007-08 और 2017-18 जैसे दौरों का ज़िक्र करते हैं, जब सीमित लीडरशिप की वजह से वैल्यू स्ट्रैटेजी पिछड़ गई थी.

आज वैल्यू के मौक़े कहां हैं, यह समझने के लिए यह संदर्भ अहम है.

टेक्नोलॉजी: निराशा से निकली वैल्यू

टेक्नोलॉजी ऐसा ही एक इलाक़ा रहा है, जहां छह से 12 महीने पहले सेंटीमेंट पूरी तरह नकारात्मक होते ही वैल्यू उभरकर आई. उस समय BSE IT इंडेक्स क़रीब 15 प्रतिशत गिर चुका था, ग्रोथ दो से तीन साल से धीमी बनी हुई थी और विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी कई साल के निचले स्तर पर पहुंच गई थी.

इसके बावजूद, लार्ज-कैप IT स्टॉक्स असामान्य रूप से आकर्षक डिविडेंड और फ़्री कैश फ़्लो यील्ड पर ट्रेड कर रहे थे, जो सुरक्षा का एक मार्जिन दे रहे थे. नज़दीकी समय में ग्रोथ उम्मीदें भले ही कम थीं, लेकिन डील जीतने की रफ़्तार ठीक बनी हुई थी. ऊंची निराशा और ज़्यादा मांग न करने वाले वैल्यूएशन के माहौल में, फ़ंड ने चुनिंदा लार्ज-कैप IT स्टॉक्स में एक्सपोज़र बनाया.

FMCG: कैच-अप की तैयारी

FMCG एक और ऐसा सेगमेंट है जहां लंबे समय तक कमज़ोर प्रदर्शन के बाद कक्कड़ को वैल्यू नज़र आती है. इस सेक्टर ने क़रीब पांच साल तक कमज़ोर रिटर्न दिए हैं और 2025 में इंडेक्स लगभग 2 प्रतिशत नीचे रहा है. वॉल्यूम ग्रोथ की सुस्ती, अनऑर्गनाइज़्ड प्लेयर्स से प्रतिस्पर्धा और व्यापक मैक्रो दबावों ने सेंटीमेंट को दबाए रखा.

हाल में GST में कटौती से ऑर्गनाइज़्ड और अनऑर्गनाइज़्ड प्लेयर्स के बीच लागत का अंतर कम हुआ है, और कंपनियां अब सिर्फ़ क़ीमत बढ़ाने की बजाय वॉल्यूम बढ़ाने पर दोबारा ध्यान दे रही हैं. FIIs और DIIs दोनों ही इस सेक्टर में अंडरवेट हैं और वैल्यूएशन भी वाजिब दिख रहे हैं. ऐसे में फ़ंड को यहां वैल्यूएशन कैच-अप की गुंजाइश दिखती है और उसने ओवरवेट पोज़िशन ली है.

ऑयल एंड गैस और दूसरे मौक़े

ऑयल एंड गैस में भी ख़ासकर अपस्ट्रीम कंपनियों में वैल्यू दिखती है, जहां मौजूदा कच्चे तेल की क़ीमतें सुरक्षा का मार्जिन देती हैं. ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी आकर्षक स्तरों पर ट्रेड कर रही हैं और इनमें निवेश अभी कम है.

इनके अलावा, कक्कड़ लाइफ़ इंश्योरेंस को मीडियम-टर्म मौक़े के रूप में देखते हैं, जहां GST बदलाव लॉन्ग-टर्म में अफ़ॉर्डेबिलिटी और पहुंच को बेहतर बना सकते हैं. वे कुछ चुनिंदा बड़े प्राइवेट बैंकों में भी संभावना देखते हैं, जहां मज़बूत बैलेंस शीट और सुधरती एसेट क्वालिटी, क्रेडिट ग्रोथ में साइक्लिकल रिकवरी का फ़ायदा दिला सकती है.

असल संदेश

इन सभी सेक्टरों में एक बात समान है-संयम. कक्कड़ के फ़्रेमवर्क में वैल्यू का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि जो चीज़ एब्सोल्यूट तौर पर सस्ती दिखे, उसी के पीछे भागा जाए. असली बात यह समझना है कि क़ीमतों में कौन-सी उम्मीदें पहले से जुड़ी हुई हैं.

ऐसे बाज़ार में, जो न तो बहुत उत्साही है और न ही पूरी तरह संकट में, यह फ़र्क़ बेहद मायने रखता है. स्टॉक चुनने में और प्रोसेस पर टिके रहने में अनुशासन, बड़े दिशात्मक दांव लगाने से ज़्यादा अहम हो जाता है.

वैल्यू तब सबसे अच्छा काम करती है, जब फ़ैसले मूड से नहीं, अनुशासन से लिए जाएं.

यह बात फ़ंड मैनेजरों पर भी लागू होती है और निवेशकों पर भी.

अगर आप आज के मार्केट में अपना पोर्टफ़ोलियो बना रहे हैं या उसे बेहतर कर रहे हैं, तो वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपको शोर से बाहर निकालकर असल बात पर फ़ोकस करने में मदद करता है, जो हैंः सही फ़ंड, पोर्टफ़ोलियो में उनकी सही भूमिका और सही मात्रा में निवेश.

मुद्दा अगली रैली का अनुमान लगाने का नहीं है. मुद्दा ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाने का है, जो आगे होने वाले हर घटनाक्रम के लिए तैयार हो.

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