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लंबे समय के होल्डिंग पीरियड से जो बातें पता चलती हैं, वह शॉर्ट-टर्म चालों से कभी पता नहीं चलतीं

लंबे समय के होल्डिंग पीरियड से जो बातें पता चलती हैं, वह शॉर्ट-टर्म चालों से कभी पता नहीं चलतींAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः बाज़ार का उतार-चढ़ाव निवेशकों की परीक्षा लेता है, लेकिन मौजूदा गिरावट ज़्यादातर सेंटीमेंट पर आधारित है. अगर डर की वजह से क़ीमतें गिर रही हैं, तो उसी घबराहट में शामिल होना ज़रूरी नहीं है. असली दौलत बनाने के लिए अच्छी कंपनियों में बने रहना ज़्यादा मायने रखता है.

पिछला हफ़्ता भी इस महीने से जारी उतार-चढ़ाव के रुझान के साथ गुज़रा. ग्लोबल अनिश्चितता, टैरिफ़ और ट्रेड पाबंदियों को लेकर नई चिंताओं के चलते बाज़ार दबाव में रहे, ख़ासकर स्मॉल-कैप और मिड-कैप सेगमेंट में. यह स्वाभाविक और समझने लायक़ है कि इन उतार-चढ़ावों ने कई निवेशकों को परेशान किया है. यह अस्थिरता ज़्यादातर व्यापक बाज़ार की गिरावट या Q3 के कमज़ोर नतीजों की वजह से रही है. हालांकि, हमारी रेकमेंडेशन की बुनियाद अब भी मज़बूत बनी हुई है. इसे कुछ रुझानों के ज़रिये समझते हैं.

सबसे पहले, आख़िर हुआ क्या?

इस साल की शुरुआत से ही ग्लोबल अनिश्चितता और ट्रेड बैरियर बढ़ने के डर ने भारतीय शेयर बाज़ार को घेर रखा है. 1 जनवरी से अब तक BSE सेंसेक्स 3.34% और निफ़्टी 50 क़रीब 6.96% नीचे हैं. NSE मिड-कैप और NSE स्मॉल-कैप इंडेक्स में गिरावट और तेज़ रही, क्रमशः 5.37% और 7.93%. हमारी रेकमेंडेशन भी गिरी हैं, न ज़्यादा, न कम.

सिर्फ़ क़ीमत गिरना, अपने-आप में घबराने की वजह नहीं है. यह आंख मूंदकर कुछ न करने का भी कारण नहीं है. सही प्रतिक्रिया यह है कि देखा जाए क्या कंपनी की कमाई की ताक़त और बिज़नेस की बुनियादी तस्वीर में कुछ मायने रखने वाला बदलाव आया है या नहीं. वही असली कसौटी है. अगर बुनियाद सलामत है और सिर्फ़ शेयर की क़ीमत गिरी है, तो अक्सर सबसे बेहतर रास्ता अनुशासन में बने रहना होता है. और अगर बुनियाद ही बदल गई है, तो समस्या वाक़ई गंभीर है.

गिरती क़ीमतों को लेकर चिंता जायज़ है, लेकिन घबराना सही नहीं. मुश्किल दौर में निवेश को पकड़े रखना ही असल में निवेश है. जब पोर्टफ़ोलियो की वैल्यू बढ़ती है, तो शेयर पकड़ना आसान लगता है, बल्कि खुशी भी होती है. लेकिन जब उल्टा होता है और वैल्यू घटती है, तो वही समय होता है जब थोड़ा पीछे हटना चाहिए और ख़ास तौर पर उस दिन पोर्टफ़ोलियो लॉग-इन करके देखने से बचना चाहिए, जब बाज़ार लाल निशान में बंद हुआ हो.

इसका मतलब यह नहीं कि असल दुनिया की सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ किया जाए. सच्चाई यह है कि इतनी अनिश्चितता के बीच डर वाजिब है. लेकिन डर के हक़ीक़त बनने से पहले ही अमल में लाना महंगा पड़ सकता है. बाज़ार में अक्सर किसी समस्या की आशंका, ख़ुद समस्या से ज़्यादा नुक़सान पहुंचा देती है. और जब डर हक़ीक़त बन भी जाए, तब भी अक्सर सबसे सही रास्ता घबराकर बेचने का नहीं, बल्कि लंबे समय का अनुशासन बनाए रखने का होता है, जैसा कि नीचे दिए गए असल उदाहरण से साफ़ होता है.

2020 में जब COVID-19 महामारी आई, तो BSE500 इंडेक्स 37% गिर गया. उस समय वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र की रेकमेंडेशन में भी ऐसी ही गिरावट आई. लेकिन हमारी एक रेकमेंडेशन पर पूरे देश में लगे लॉकडाउन का असर असामान्य रूप से ज़्यादा पड़ा.

उस दौर में, जब कंपनी कैश जला रही थी और रिज़र्व घट रहे थे, हमने कोई Sell कॉल नहीं दी. हमें भरोसा था कि हालात सामान्य होने पर, जैसा कि अक्सर होता है, यह बिज़नेस मज़बूती से उबरेगा.

COVID आए और गए अब पांच साल हो चुके हैं. इस पूरे दौर में वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र की रेकमेंडेशन ने BSE500 इंडेक्स को साफ़ तौर पर पीछे छोड़ा है. इसमें मौजूदा बाज़ार की बिकवाली भी शामिल है.

सीधे शब्दों में कहें, तो संभले हुए ढंग से चलने वाली, अच्छी क्वालिटी के बिज़नेस, भरोसेमंद मैनेजमेंट और कम क़र्ज़ वाली कंपनियों का पोर्टफ़ोलियो, उस व्यापक बाज़ार से बेहतर करता है, जिसमें कई चमकते सितारे, अनदेखे रत्न और छुपे हुए चमत्कार शामिल होते हैं. यही वैल्यू इन्वेस्टिंग की ख़ूबसूरती और सच्चाई है.

और उस पूरी तरह पिट चुकी कंपनी का क्या हुआ, जिसका हमने ज़िक्र किया था? वही, जो लॉकडाउन से पूरी तरह टूट गई थी. आज उसके Q3 नतीजे भले ही डगमगाते हों, लेकिन अगर किसी ने COVID-19 के दौर में उसे पकड़े रखा होता, तो वह निफ़्टी 500 से काफ़ी आगे निकल चुका होता.

हाल में इस ख़ास रेकमेंडेशन को लेकर आई परेशानियों के बावजूद, हम इसमें बने रहे. यही निवेश का मुश्किल हिस्सा है. बने रहना. और यह मामला दिखाता है कि जब लोग डरते हैं, तो अक्सर बुनियादी सच्चाई पर घबराहट हावी हो जाती है.

इसे आज की स्थिति से तुलना करके देखिए, जहां कई कंपनियों के कामकाज पर अभी सीधे असर नहीं पड़ा है, लेकिन उनके शेयर 15 से 20%, यहां तक कि 30% तक गिर चुके हैं. तब समझ आएगा कि हम शेयर की क़ीमत के बजाय बिज़नेस की बुनियाद पर ज़ोर क्यों देते हैं. अगर बुनियाद मज़बूत है, बिज़नेस की अर्थव्यवस्था नहीं बदली है और मैनेजमेंट ठीक से काम कर रहा है, तो कमाई वापस आएगी और उसके साथ शेयर रिटर्न भी.

इसलिए अगली बार जब किसी शेयर की क़ीमत गिरे, जो पहले से पोर्टफ़ोलियो में है, तो सबसे पहला काम यह देखना चाहिए कि क्या बुनियाद में कोई बदलाव आया है या नहीं, यानी कंपनी की कमाई की ताक़त में. तीन बातों पर ध्यान दें:

  1. क्या लंबे समय की कमाई की ताक़त में स्थायी कमज़ोरी आई है?
     
  2. क्या बैलेंस शीट का जोख़िम साफ़ तौर पर बढ़ा है?
     
  3. क्या मैनेजमेंट की साख कामकाज या जानकारी देने के तरीक़े से कमज़ोर पड़ी है?
     

अगर इनमें से किसी एक का जवाब हां है, तो काम करने की ज़रूरत है. लेकिन अगर जवाब नहीं है और सिर्फ़ शेयर की क़ीमत गिरी है, तो ज़रूरत से ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए. याद रखिए, शॉर्ट-टर्म में किसी भी कंपनी के लिए बाज़ार के रिटर्न के साथ लगातार तालमेल बैठा पाना मुश्किल होता है. आख़िरकार फ़ैसला लंबा समय ही करता है. वही मायने रखता है.

यहां हमें चार्ली मंगर की मशहूर बात याद आती है: “निवेश में असल काम सही कंपनियां ढूंढना है. उसके बाद ज़्यादा कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती, बस धैर्य रखना होता है.”

और ज़्यादातर निवेशक यहीं अटक जाते हैं. बैठे रहने वाले हिस्से में. किसी अच्छी कंपनी का फ़ायदा उठाने के लिए धैर्य चाहिए.

ख़ुशक़िस्मती से, वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र ऐसे समय में आपको ज़मीन से जोड़े रखता है. अगर हमारी रेकमेंडेशन में निवेश है, तो उन्हें रोज़-रोज़ देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हम Buy, Sell और Hold कॉल देते हैं, ताकि दबाव के दौर में भी सही फ़ैसले लिए जा सकें. मसलन, अगर उस रहस्यमयी शेयर में हमने Sell कॉल दी होती, तो कई निवेशक काफ़ी पैसा गंवा देते.

आख़िर में, हमारा वीकली सब्सक्राइबर अपडेट आपको हमारी सभी रेकमेंडेशन के प्रदर्शन की पूरी तस्वीर देता है. आख़िरकार, वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र का मक़सद अपने पाठकों से लगातार जुड़े रहना है. हमारे एनालिस्ट्स की साफ़-नज़र गाइडेंस के साथ, अच्छी कंपनियों में बने रहने का भरोसा बना रहता है.

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