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CPSE ETF: आप असल में कहां निवेश करते हैं?

सरकार समर्थित इस ETF के स्ट्रक्चर, रिस्क और रिटर्न पैटर्न को समझना ज़रूरी है

सरकार समर्थित इस ETF के स्ट्रक्चर, रिस्क और रिटर्न पैटर्न को समझना ज़रूरी हैAdobe Stock

सारांशः CPSE ETF ऊपर से काफ़ी आकर्षक दिख सकता है, क्योंकि यह कम ख़र्च में PSU कंपनियों में निवेश का मौक़ा देता है. लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है. यहां बताया गया है कि CPSE ETF कैसे निवेश करता है, इसमें क्या रिस्क हैं और इसका पिछला परफ़ॉर्मेंस कैसा रहा है.

अगर कोई व्यक्ति भारत की प्रमुख PSU कंपनियों में कम लागत पर निवेश का एक्सपोज़र चाहता है, तो CPSE ETF एक विकल्प हो सकता है. मार्च 2014 में लॉन्च होने के बाद से इस फ़ंड ने क़रीब 15.7 प्रतिशत सालाना रिटर्न दिया है (3 फ़रवरी 2026 तक), जो निफ़्टी 50 के 13.4 प्रतिशत और फ़्लेक्सी-कैप कैटेगरी के 14.5 प्रतिशत रिटर्न से बेहतर है.

अब बिना देर किए समझते हैं कि CPSE ETF कहां और कैसे निवेश करता है, इसका पिछला परफ़ॉर्मेंस क्या रहा है और क्या इसे पोर्टफ़ोलियो में जगह मिलनी चाहिए.

फ़ंड कहां निवेश करता है?

CPSE ETF का निवेश दायरा काफ़ी सीमित है. इसमें सिर्फ़ 11 कंपनियां शामिल हैं, जो तीन सेक्टरों में फैली हैं. एनर्जी और यूटिलिटीज़ का हिस्सा सबसे ज़्यादा, लगभग 62 प्रतिशत है. इसके बाद इंडस्ट्रियल्स और मटीरियल्स आते हैं.

भले ही, किसी एक स्टॉक का वेटेज फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो में 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकता, लेकिन जब सेक्टर का कंसन्ट्रेशन ज़्यादा हो, तो इससे रिस्क बहुत कम नहीं होता. इसके अलावा, यह कंसन्ट्रेशन अस्थायी नहीं है. चूंकि यह ETF सरकार के डिसइन्वेस्टमेंट को सपोर्ट करने के लिए बनाया गया है और जब तक सरकार की हिस्सेदारी घटाने की योजना के तहत नई कंपनियां शामिल नहीं होतीं, तब तक यह स्थिति बनी रहेगी.

यहीं पर कई निवेशक चौंक जाते हैं. किसी ETF में कई स्टॉक्स होने का मतलब अपने-आप डाइवर्सिफ़िकेशन नहीं होता. CPSE ETF के मामले में इसका पोर्टफ़ोलियो पूरे बाज़ार की बजाय एक फ़ोकस्ड सेक्टर एक्सपोज़र जैसा व्यवहार करता है.

CPSE ETF पैसा कैसे कमाता है?

इस फ़ंड के रिटर्न मोटे तौर पर तीन मुख्य कारणों से आते हैं.

बिज़नेस परफ़ॉर्मेंस: इसमें शामिल कई कंपनियां कमोडिटी, कैपेक्स साइकिल या रेगुलेटेड रिटर्न से जुड़ी होती हैं. इसी वजह से उनकी कमाई स्वभाव से ही साइक्लिकल होती है.

डिविडेंड: CPSE कंपनियां आमतौर पर ठीक-ठाक डिविडेंड देती रही हैं, जो सुस्त बाज़ार के दौरान रिटर्न को सपोर्ट कर सकता है. लेकिन डिविडेंड स्थायी इनकम नहीं होता. यह मुनाफ़े, कैश फ़्लो और सरकार की प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है, और ये सभी बदल सकते हैं.

वैल्यूएशन: तीसरा और सबसे ताक़तवर फैक्टर वैल्यूएशन है. PSU स्टॉक्स अक्सर कम वैल्यूएशन से शुरू होते हैं. जब सेंटिमेंट अनुकूल होता है, तो उम्मीदों में हल्का सा सुधार भी तेज़ री-रेटिंग ले आता है. ऐसे दौर में CPSE ETF के रिटर्न काफ़ी चमकदार दिखते हैं. लेकिन जब सेंटिमेंट बिगड़ता है, तो वैल्यूएशन का दबाव तेज़ और दर्द भरा हो सकता है.

इन तीनों का मेल बताता है कि CPSE ETF में रिटर्न सहज कंपाउंडिंग की बजाय झटकों में आते हैं.

अलग-अलग साइकिल में परफ़ॉर्मेंस

हालांकि CPSE ETF ने कुल मिलाकर अच्छा रिटर्न दिया है, लेकिन ऐसे दौर भी आए हैं जब फ़ंड लंबे समय तक ठहरा रहा. मसलन, जनवरी 2018 से अक्तूबर 2021 के बीच CPSE ETF ने लगभग शून्य रिटर्न दिया. और इसके सबसे ख़राब दौर में, मार्च 2019 से मार्च 2020 तक, फ़ंड क़रीब 47 प्रतिशत तक गिर गया.

यह कोई असामान्य बात नहीं है. PSU कंपनियों की साइक्लिकल नेचर को देखते हुए, लंबे फ्लैट दौर और गहरी गिरावट PSU-भारी पोर्टफ़ोलियो की संरचनात्मक ख़ासियत हैं. इसलिए जो निवेशक तेज़ रैली के बाद इसमें प्रवेश करते हैं, उन्हें अक्सर सिर्फ़ ब्रेक-ईवन तक पहुंचने में भी सालों लग जाते हैं.

तो क्या CPSE ETF को पोर्टफ़ोलियो में शामिल करना चाहिए?

CPSE ETF का परफ़ॉर्मेंस सरकार की नीतियों और PSU कंपनियों के साइक्लिकल नेचर से काफ़ी हद तक जुड़ा है. इसके अलावा, इसका कंसन्ट्रेटेड पोर्टफ़ोलियो रिस्क को और बढ़ाता है.

इसी वजह से CPSE ETF को कोर होल्डिंग की बजाय सैटेलाइट एलोकेशन के तौर पर देखना बेहतर होता है. इक्विटी एलोकेशन के भीतर इसका हिस्सा लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक सीमित रखना एक व्यावहारिक सुरक्षा का काम करता है.

एक और अहम बात है ETF की क़ीमत. तेज़ी के दौर में CPSE ETF अपने नेट एसेट वैल्यू (NAV) से प्रीमियम पर ट्रेड कर सकता है, जो भविष्य के रिटर्न को चुपचाप कम कर देता है. 2023 से अब तक औसतन ₹23.8 करोड़ का डेली ट्रेडेड वैल्यू होने से ज़्यादातर रिटेल निवेशकों के लिए लिक्विडिटी ठीक रहती है. लेकिन उतार-चढ़ाव वाले बाज़ार में बड़ी रक़म लगाने या निकालने पर क़ीमत पर असर पड़ सकता है. ट्रेड से पहले इंट्रा-डे इंडिकेटिव NAV देखना एक आसान लेकिन अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाने वाला सुरक्षा कदम है.

स्मार्ट निवेश हाल में अच्छा करने वाली चीज़ों के पीछे भागने का नाम नहीं है. यहां यह समझना ज़रूरी है कि पोर्टफ़ोलियो में क्या रखा है, वह वैसा व्यवहार क्यों करता है और बाज़ार की स्थिति चाहे जैसी हो, अनुशासन बनाए रखना क्यों अहम है. Value Research Fund Advisor के साथ, मुख्य रिटर्न से आगे देखकर सोचने, हर निवेश की स्पष्ट भूमिका तय करने और शोर भरे बाज़ार में भी संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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