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सारांशः प्रधानमंत्री ने भारतीयों से सोने की ख़रीद टालने की अपील की है. यह अपील एक तरह के ख़रीदार के लिए बिल्कुल सही है और दूसरे के लिए काफ़ी हद तक बेमानी. ज़्यादातर लोगों को पता नहीं कि वो किस कैटेगरी में आते हैं - और यही फ़र्क़ तय करता है कि आपको असल में क्या करना चाहिए.
10 मई 2026 को PM मोदी ने सोने की ख़रीद टालने की अपील की. उन्होंने कमज़ोर होते रुपये, अस्थिर पश्चिम एशिया और बढ़ते आयात बिल का हवाला दिया. यह अपील गंभीरता से लेने लायक़ है. लेकिन हर तरह के सोना ख़रीदने वाले के लिए जवाब एक नहीं है.
अगर आप ज्वेलरी ख़रीदने की सोच रहे थे, तो अपील पूरी तरह आप पर लागू होती है. अगर आप सोने में निवेश करने की सोच रहे थे, तो तस्वीर थोड़ी ज़्यादा जटिल है. इसी फ़र्क़ को समझाना इस लेख का मक़सद है.
अपील का असल मतलब क्या है
भारत अपना लगभग सारा सोना आयात करता है. देश में ख़ुद सोने का कोई ख़ास खनन नहीं होता. ज्वेलरी हो, सिक्के हों या बिस्कुट - सोने पर ख़र्च होने वाले हर रुपये के लिए आख़िरकार विदेशी मुद्रा चाहिए होती है. जब रुपया पहले से दबाव में हो और आयात बिल बढ़ रहा हो, तो सोने की मांग में उछाल दोनों को और बिगाड़ देता है.
तरीक़ा यह है: भारत सोने का आयात डॉलर में करता है. जब मांग बढ़ती है, तो ज़्यादा डॉलर देश से बाहर जाते हैं, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है. कमज़ोर रुपया हर अगले आयात - तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी - को महंगा बना देता है. इससे महंगाई बढ़ती है, जो आम घरों पर सबसे ज़्यादा मार पड़ती है. PM की अपील भावनात्मक कम, गणित पर ज़्यादा आधारित है.
ज्वेलरी, ETF और SGB - तीन बिल्कुल अलग चीज़ें
आयात के स्तर पर, सोना बहुमूल्य है. भारतीय ज्वेलरी बनाने वाले सोने की छड़ें आयात करते हैं और उन्हें देश में ही प्रोसेस करते हैं. गोल्ड ETF और म्यूचुअल फ़ंड के लिए भी फ़ंड हाउसेज़ यही करते हैं - जारी की गई यूनिट्स के बदले में फ़िज़िकल सोने की छड़ें ख़रीदते हैं. आयात का बोझ दोनों में लगभग बराबर है.
असल फ़र्क़ आयात बोझ में नहीं है. फ़र्क़ है लागत की कुशलता और मक़सद में.
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) इसमें सच्चा अपवाद है. सरकार एक पेपर इंस्ट्रूमेंट जारी करती है जो सोने की क़ीमत से जुड़ा होता है. कोई फ़िज़िकल सोना ख़रीदा या आयात नहीं होता. जिन्होंने शुरुआत में SGB ख़रीदे, वो आठ साल रख सकते थे और 2.5 फ़ीसदी सालाना ब्याज के साथ मैच्योरिटी पर टैक्स-फ्री मुनाफ़ा भी पा सकते थे. हालांकि, नए SGB जारी होने बंद हो गए हैं. RBI ने आख़िरी बार दो साल से भी पहले SGB की कोई नई ट्रेंच जारी की थी.
गोल्ड ETF और म्यूचुअल फ़ंड - ज्वेलरी की तरह - फ़िज़िकल सोने के आयात की ज़रूरत रखते हैं. लेकिन सोना रखने का यह तरीक़ा लागत के लिहाज़ से कहीं बेहतर है. न मेकिंग चार्ज, न सोने की वैल्यू पर GST और न बेचते वक़्त घाटा.
गहनों का आकर्षण सबसे ज़्यादा होता है और ऐसा सिर्फ़ आयात की वजह से ही नहीं है. भारतीय ज्वेलर्स सोने की छड़ें आयात कर उन्हें देश में ढालते हैं, इसलिए आयात बोझ ETF जितना ही है. लेकिन ज्वेलरी में ऊपर से 10 से 15 प्रतिशत मेकिंग चार्ज और GST भी जुड़ता है. यह लागत वापस नहीं मिलती. जो ख़रीदार ज्वेलरी को निवेश समझता है, वो ख़रीदते ही उतने मार्जिन से अपनी दौलत को ज़्यादा आंक रहा होता है. ज्वेलरी खपत है. PM की अपील सीधे इसी से जुड़ी है.
सोने का काम इंश्योरेंस है, ग्रोथ नहीं
अपील पर अमल करने या नज़रअंदाज़ करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि आपके पोर्टफ़ोलियो में सोना असल में क्या काम कर रहा है.
इन्वेस्टमेंट पोर्टफ़ोलियो में 5 से 10 प्रतिशत सोना होना चाहिए. ऐसा ग्रोथ के लिए नहीं, बल्कि बीमे के तौर पर हो. इक्विटी दशकों में वेल्थ बढ़ाती है. डेट कैपिटल की सुरक्षा करता है और ब्याज देता है. सोने का काम अलग है. यह कभी-कभी और अनियमित रूप से तब अपनी वैल्यू बचाए रखता है, जब करेंसी कमज़ोर हो और दुनिया का भरोसा डगमगाए,.
और यही वो वक़्त है जिसके लिए यह एलोकेशन बनाई गई थी.
तीन घटनाएं इस बात को साफ़ करती हैं. 2013 में अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व ने अपना बॉन्ड-ख़रीद प्रोग्राम घटाने का संकेत दिया. उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी, जिसमें रुपया भी था, तेज़ी से गिरीं. 2020 के महामारी के झटके और 2022 का ऊर्जा संकट - दोनों में यही पैटर्न दिखा. हर बार रुपया कमज़ोर हुआ और सोना रुपये में महंगा हो गया. जिस पोर्टफ़ोलियो में थोड़ा सोना था, वो उन सालों में ज़्यादा स्थिर रहा - ज़्यादा अमीर नहीं. बीमे का काम अमीर बनाना नहीं है. काम यह है कि जब बाक़ी पोर्टफ़ोलियो मुश्किल दौर से गुज़र रहा हो, तब आप कम बेचैन महसूस करें.
अभी सोना तेज़ी से चढ़ा है और ख़बरें तनावपूर्ण हैं - ऐसे में आक्रामक तरीक़े से सोना जोड़ने का लालच होता है. लेकिन बीमा इसके लिए नहीं होता.
एलोकेशन देखें, फिर फ़ैसला करें
अपने सभी गोल्ड ETF, गोल्ड म्यूचुअल फ़ंड और SGB जोड़ लें. ज्वेलरी को इसमें शामिल न करें - वो खपत है, अलग हिसाब है. इस कुल रक़म को अपनी निवेश योग्य संपत्ति के प्रतिशत के रूप में देखें.
अगर यह 5 से 10 प्रतिशत के बीच है, तो कुछ न करें. आपका एलोकेशन अपना काम कर रहा है.
अगर 5 प्रतिशत से कम है, तो पोर्टफ़ोलियो के आधार पर सोना जोड़ने की गुंजाइश है. अगर 10 प्रतिशत से ज़्यादा है, तो अपने लक्ष्य की तरफ़ वापस घटाएं. जो रक़म निकले, वो इक्विटी, डेट या कैश में लगाएं - जहां भी आपका पूरा प्लान पीछे हो. यह रीबैलेंसिंग है, मार्केट टाइमिंग नहीं. इसमें PM की अपील का कोई रोल नहीं.
प्लान के साथ बने रहें
सोने को बीमे की तरह देखें. किसी भी बीमे की तरह - इसे ज़रूरत पड़ने से पहले ख़रीदते हैं, तब नहीं जब हेडलाइन्स कहें.
PM की अपील भारतीय परिवारों से खपत के मसले पर एक वाजिब गुज़ारिश है. ज्वेलरी ख़रीदने वालों के लिए यह गंभीरता से सोचने लायक़ है. जो निवेशक पहले से 5 से 10 प्रतिशत एलोकेशन में हैं, उनके लिए यह पोर्टफ़ोलियो का ढांचा बदलने की वजह नहीं है. अगर ढांचा शुरू से दुरुस्त था, तो काम अब बस उसके क़रीब बने रहने का है.
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ये लेख पहली बार मई 18, 2026 को पब्लिश हुआ.
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