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रविवार की शाम थी. मैं यह देखने के लिए तीन न्यूज़ चैनलों को बारी-बारी से बदल रहा था कि क्या कोई एंकर बंगाल के नतीजे पर कुछ नया कह रहा है. आठ बजे के आसपास स्क्रीन के निचले हिस्से में एक और ख़बर आई. प्रधानमंत्री ने हैदराबाद में एक भाषण दिया था, जिसे एंकर "देशभक्ति अपील" बता रहे थे. घंटे भर में एक साफ़-सुथरी MyGov ग्राफ़िक हर घर के हर फ़ोन पर थी. सात अपीलें, सीधी भाषा में.
अगर आपने नहीं देखीं, तो वो सात अपीलें इस प्रकार हैं. घर से काम (work from home) करने को तरजीह दें. एक साल तक सोना न ख़रीदें. मेट्रो और पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करें. खाना पकाने का तेल कम करें. रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करें. विदेशी ब्रांड की बजाय स्वदेशी सामान ख़रीदें. एक साल तक विदेश यात्रा न करें. ग्राफ़िक में प्रधानमंत्री बगल की प्रोफ़ाइल में हाथ जोड़े खड़े थे. हेडलाइन थी: राष्ट्र पहले, आराम से ऊपर कर्तव्य (Nation First, Duty Above Comfort).
आज सुबह तक कई पाठकों ने मुझे लिखा. लगभग हर मेल में एक ही सवाल था. क्या उन्हें अपने गोल्ड फ़ंड बेच देने चाहिए?
यह कॉलम इसलिए लिखा गया है क्योंकि यह ग़लत सवाल है.
मेरे अपने काम से सबसे ज़्यादा जुड़ी अपील से शुरू करता हूं. मैंने दो दशक से ज़्यादा वक़्त यह लिखने में बिताया है कि सोना एक कमज़ोर लॉन्ग-टर्म निवेश है. पिछले पांच साल के सबूत देखें तो मैं ग़लत था और यह बात मैं इस कॉलम में कई बार कह चुका हूं. 10 ग्राम की क़ीमत क़रीब ₹1.53 लाख - यानी 20 साल में सोने ने इक्विटी जैसा रिटर्न दिया है. मेरा नज़रिया सही था, पर अधूरा था. वॉरेन बफ़े की दलील - कि सोना कुछ पैदा नहीं करता - सोने को एक कमोडिटी मानकर चलती थी. उसमें सोने की दूसरी अहमियत कम आंकी गई. वो एक ऐसी करेंसी है जिसे कोई सरकार फ़्रीज़ नहीं कर सकती.
तो जब भारत सरकार अब नागरिकों से एक साल तक सोना न ख़रीदने की अपील करे, तो शायद आपको लगे कि मैं ख़ामोशी से संतुष्ट हो जाऊंगा. नहीं, ऐसा नहीं होगा. यह अपील वो पुरानी बात नहीं कर रही जो मैं कहता था. मेरी बात एक भारतीय परिवार के लॉन्ग-टर्म पोर्टफ़ोलियो के बारे में थी. यह अपील किसी और चीज़ के बारे में है. यह देश के विदेशी मुद्रा भंडार और उस पर आ रहे दबाव के बारे में है.
यही असली संकेत है. लिस्ट तो बस पैकेजिंग है.
सातों अपीलें एक साथ पढ़ें. पैटर्न साफ़ है. सोना, क्रूड ऑयल, खाने का तेल, विदेशी ब्रांड के इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेश यात्रा. हर कैटेगरी भारी आयात वाली है. इनमें से किसी में भी थोड़ी कमी डॉलर बचाती है. भाषण में प्रधानमंत्री ने "रुपये के संरक्षक" (guardian of the rupee) का मुहावरा इस्तेमाल किया. यही मुहावरा इस कॉलम की असली बात है. हर निवेशक का ध्यान यहां जाना चाहिए. सात चीज़ों की लिस्ट पर नहीं, बल्कि इस तथ्य पर कि देश के सर्वोच्च नेता सार्वजनिक रूप से नागरिकों से करेंसी बचाने की गुज़ारिश कर रहे हैं.
पृष्ठभूमि कोई रहस्य नहीं है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास हालिया तनाव के बाद ब्रेंट क्रूड फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर है. विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशक 2026 के पहले चार महीनों में ही भारतीय इक्विटी से दो लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा निकाल चुके हैं, जो पूरे कैलेंडर साल 2025 की निकासी से भी ज़्यादा है. पिछले हफ़्ते रुपया डॉलर के मुक़ाबले 95.2 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा. प्रधानमंत्री की अपील कोई अलग ख़बर नहीं है. यह उन सब ख़बरों का प्रतिबिंब है जो एक ही हफ़्ते में एक साथ आ रही हैं.
तो इसका मतलब आपके लिए व्यावहारिक रूप से क्या है?
अपीलों के जवाब में, लगभग कुछ भी नहीं. भारतीय घरेलू खपत आय, क़ीमतों और आदतों से तय होती है, नैतिक अपीलों से नहीं. "वोकल फ़ॉर लोकल" से किसी बड़ी मल्टीनेशनल FMCG कंपनी के मार्केट शेयर में कोई स्पष्ट कमी नहीं आई. त्योहारी सीजन की सालाना स्वदेशी अपीलों ने शहरी खपत की टोकरी में कोई मापने योग्य बदलाव नहीं किया. मुझे उम्मीद है कि यह लिस्ट भी उसी राह पर चलेगी. भारतीय इसे सुनेंगे, तालियां बजाएंगे और परिवार की अगली शादी में सोना ख़रीदते रहेंगे.
जो चीज़ ध्यान देने लायक है, वो वह नीति है जो इस अपील के बाद आएगी. जब सरकार किसी आयात कैटेगरी को सार्वजनिक रूप से "अदेशभक्तिपूर्ण" बताने लगे, तो अगले कुछ महीनों में आमतौर पर ड्यूटी बढ़ोतरी, कस्टम रिवीज़न या PLI स्कीम के नए ऐलान होते हैं. पूछने लायक सवाल व्यावहारिक हैं. क्या सोने के आयात पर कस्टम ड्यूटी बढ़ सकती है? शायद हां. क्या सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड का नया दौर ज़्यादा आकर्षक शर्तों के साथ आएगा ताकि निजी सोना आयात की जगह ले सके? बिल्कुल संभव है. क्या इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफ़ेंस और फ़ार्मा के PLI स्कीमों को नई राजनीतिक ताक़त मिलेगी? हालात इसके लिए एकदम सही हैं.
अगर रुपया कमज़ोर बना रहे, तो अपनी तरह के ट्रेड लेकर आता है. भारतीय IT सर्विसेज़ कंपनियां और फ़ार्मा एक्सपोर्टर डॉलर में कमाती हैं और रुपये में रिपोर्ट करती हैं. उन्हें फ़ायदा होता है. आयातकों को नुकसान होता है. इसमें रिफ़ाइनर, खाने का तेल बनाने वाली कंपनियां, वो इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबलर जो अभी भी विदेश से सामान मंगाते हैं और ज्वैलरी रिटेलर शामिल हैं. दूसरे दर्जे की सोच यहां लगनी चाहिए.
लंबे समय के म्यूचुअल फ़ंड निवेशक के लिए जो सोमवार की सुबह यह कॉलम पढ़ रहा है, व्यावहारिक संदेश सबसे सीधा है. गोल्ड फ़ंड मत बेचिए क्योंकि प्रधानमंत्री ने और सोना न ख़रीदने को कहा है. IndiGo, Indian Hotels या MakeMyTrip के शेयर मत बेचिए क्योंकि विदेश यात्रा इस महीने राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय हो गई है. सबसे ज़रूरी बात - रविवार को कुछ कहा गया इसलिए सोमवार को पोर्टफ़ोलियो में कुछ "करने" की जल्दी मत दिखाइए.
लिस्ट एक बार पढ़ें. रख दें. फिर अपनी SIP, अपनी इक्विटी एलोकेशन और उस एसेट मिक्स पर वापस जाएं जो आपकी ज़िंदगी के हिसाब से सही है - किसी रविवार के न्यूज़ चैनल की स्क्रीन के हिसाब से नहीं.
अपीलें धुंधली पड़ जाएंगी. रुपये की कहानी नहीं पड़ेगी. वो एक नज़र रखने लायक है.
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