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सारांशः ETF और FoF दोनों ही पैसिव इनवेस्टिंग का ज़रिया हैं, लेकिन असल में दोनों के काम करने का तरीक़ा अलग है. इस आर्टिकल में हम आपको दोनों के बीच के ज़रूरी अंतर बताएंगे, जिससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि आपके लिए कौन-सा ऑप्शन बेहतर रहेगा.
ETF और FoF में क्या फ़र्क़ है? कृपया स्पष्ट करें. - दिनेश मोहन
अगर आपने पैसिव इनवेस्टिंग में हाथ आज़माया है, तो हो सकता है कि इंडेक्स फ़ंड की समझ आपको जल्दी आ गई हो. लेकिन जैसे ही बात ETF (एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड) और FoF (फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स) की आती है, चीज़ें थोड़ी उलझ जाती हैं. दोनों ही पैसिव ऑप्शन हैं, दोनों किसी इंडेक्स या एसेट में कम लागत वाला एक्सपोज़र देने का वादा करते हैं, लेकिन दोनों के काम करने का तरीक़ा बिल्कुल अलग है.
आइए, दोनों के बीच का फ़र्क़ आसान भाषा में समझते हैं.
ETF और FoF आख़िर हैं क्या?
ETF सिक्योरिटीज़ (शेयर, बॉन्ड, गोल्ड या इनका मिक्स) का एक बास्केट होता है, जो किसी इंडेक्स को ट्रैक करता है और स्टॉक एक्सचेंज पर एक आम शेयर की तरह ट्रेड होता है. दिनभर ख़रीदारों और बिकवालों की एक्टिविटी के हिसाब से इसकी क़ीमत ऊपर-नीचे होती रहती है.
दूसरी तरफ़, FoF एक म्यूचुअल फ़ंड स्कीम है, जो सीधे सिक्योरिटीज़ नहीं रखती. इसके बजाय, यह किसी दूसरे फ़ंड की यूनिट्स में इन्वेस्ट करता है, अक्सर किसी ETF में, कभी-कभी किसी इंटरनेशनल फ़ंड में या डेट और इक्विटी फ़ंड्स के मिक्स में. आप इसे किसी भी सामान्य म्यूचुअल फ़ंड की तरह ही ख़रीदते और बेचते हैं, जो इसके दिन के आख़िर के NAV (नेट एसेट वैल्यू) पर आधारित होता है.
असल में इन्वेस्ट कैसे करें?
यहीं पर असली व्यावहारिक फ़र्क़ नज़र आता है. ETF ख़रीदने के लिए आपको डीमैट और ट्रेडिंग अकाउंट चाहिए और आप इसे सिर्फ़ मौजूदा मार्केट प्राइस पर ही ख़रीद सकते हैं. इसमें SIP का कोई सही तरीक़ा नहीं है, क्योंकि ETF की ख़रीदारी एक्सचेंज पर लाइव लिक्विडिटी पर निर्भर करती है (हालांकि कुछ प्लेटफ़ॉर्म इसका एक तरीक़ा निकाल लेते हैं).
FoF में डीमैट अकाउंट की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. आप AMC, किसी ऐप या डिस्ट्रीब्यूटर के ज़रिए इन्वेस्ट कर सकते हैं और किसी भी दूसरे म्यूचुअल फ़ंड की तरह SIP शुरू कर सकते हैं या लमसम (एकमुश्त) निवेश कर सकते हैं. जो इन्वेस्टर ट्रेडिंग अकाउंट के झंझट के बिना अनुशासित, ऑटोमेटेड इन्वेस्टिंग चाहते हैं, उनके लिए FoF आम तौर पर आसान रास्ता है.
टैक्सेशन
टैक्सेशन के मामले में ETF और FoF काफ़ी हद तक एक जैसे हैं.
इक्विटी ETF और FoF पर टैक्स इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड की तरह ही लगता है, यानी लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर 12.5 प्रतिशत और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन पर 20 प्रतिशत टैक्स लगता है. डेट ETF (और FoF) पर भी टैक्स का तरीक़ा डेट फ़ंड जैसा ही है, यानी कैपिटल गेन पर इन्वेस्टर के टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है.
दूसरी तरफ़, गोल्ड, सिल्वर और इंटरनेशनल ETF (या FoF) पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 12.5 प्रतिशत है, जबकि शॉर्ट-टर्म गेन पर लागू टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है.
कॉस्ट और लिक्विडिटी
आम तौर पर ETF का एक्सपेंस रेशियो कम होता है, क्योंकि इसमें संबंधित फ़ंड खरीदने के लिए फ़ंड मैनेजमेंट की कोई अलग लेयर नहीं होती. लेकिन असल दुनिया में लिक्विडिटी एक समस्या बन सकती है, क्योंकि कुछ ETF में ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत कम होता है, जिससे बिड-आस्क स्प्रेड (ख़रीद और बिक्री की क़ीमत का अंतर) चौड़ा हो जाता है.
FoF का एक्सपेंस रेशियो थोड़ा ज़्यादा होता है (यह संबंधित फ़ंड की लागत के ऊपर अपनी एक अलग लेयर जोड़ देता है), लेकिन इसमें लिक्विडिटी की गारंटी मिलती है, क्योंकि AMC ख़ुद NAV पर रिडेम्शन प्रोसेस करता है.
तो, कौन बेहतर है?
कोई भी हर हाल में बेहतर नहीं है. यह आपकी सहूलियत, कॉस्ट को लेकर संवेदनशीलता और इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास पहले से डीमैट अकाउंट है या नहीं. अगर आप इस बारे में साफ़ और पर्सनलाइज़्ड जवाब चाहते हैं, तो Value Research Fund Advisor आपको अपने ऑप्शन समझने और यह तय करने में मदद कर सकता है कि आपके पोर्टफ़ोलियो के लिए कौन-सा बेहतर रहेगा.
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ये लेख पहली बार जुलाई 09, 2026 को पब्लिश हुआ.





