IPO अनालेसिस

Laser Power & Infra के IPO में पैसा लगाने से पहले, यह पढ़ लीजिए

भारत की बिजली इंफ़्रास्ट्रक्चर की कहानी को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. पर बड़ा सवाल यह है कि क्या लेज़र इस मौक़े को रिटर्न में बदल पाएगी.

भारत की बिजली इंफ़्रास्ट्रक्चर की कहानी को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. पर बड़ा सवाल यह है कि क्या लेज़र इस मौक़े को रिटर्न में बदल पाएगी.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः भारत का फैलता बिजली इंफ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर Laser Power & Infra के IPO को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल बना देता है, लेकिन ऊपरी आंकड़े कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा बताते हैं. पैसा लगाने से पहले, निवेशकों को बढ़त की कहानी से आगे देखकर यह परखना चाहिए कि क्या यह कारोबार मौक़े को टिकाऊ रिटर्न में बदल सकता है.

काग़ज़ पर Laser Power & Infra एक ऐसा कारोबार लगता है जो बहुत कुछ सही कर रहा है. मुनाफ़ा दो साल में क़रीब तीन गुना हुआ. रिटर्न रेशियो तेज़ी से चढ़े. IPO भी क़रीब 20 गुना कमाई पर मिल रहा है, एक ऐसी क़ीमत जो पहली नज़र में वाजिब लगती है. कंपनी ने भारत में अगली पीढ़ी के पावर कंडक्टर बनाने के लिए एक लाइसेंस समझौता भी किया है.

लेकिन इस ऊपरी तस्वीर के नीचे, कहानी में दरारें दिखने लगती हैं. जिस साल कंपनी ने रिकॉर्ड मुनाफ़ा दिखाया, उसी साल उसके कामकाज से ₹119 करोड़ का कैश बाहर निकल गया. यही वो चिंता है जिसे यह IPO सुलझाता नहीं और यही वो बात है जो आपको पैसा लगाने का फ़ैसला करने से पहले जाननी चाहिए.

केबल, कंडक्टर और ग्रिड पर एक दांव

Laser Power & Infra वो पावर केबल और कंडक्टर बनाती है जिनसे बिजली का ग्रिड बनता है. यह उस बिजली को बांटने वाला इंफ़्रास्ट्रक्चर भी बनाती है. कंपनी पश्चिम बंगाल में तीन मैन्युफ़ैक्चरिंग यूनिट चलाती है, जिनकी कुल क्षमता 85,000 मीट्रिक टन से ज़्यादा है. इसके प्रोडक्ट हाई-टेंशन पावर केबल से लेकर रेलवे सिग्नलिंग केबल तक फैले हैं. इसके ग्राहकों में भारतीय रेलवे और राज्यों के बिजली बोर्ड शामिल हैं, साथ ही निजी इंफ़्रास्ट्रक्चर कंपनियां और अफ़्रीका व एशिया के अंतरराष्ट्रीय ख़रीदार भी.

आमदनी दो हिस्सों से आती है. मैन्युफ़ैक्चरिंग कुल का 73% है, जो पावर केबल, कंट्रोल केबल और दूसरे कंडक्टर की बिक्री पर टिका है. बाक़ी 27% इसके कंस्ट्रक्शन हिस्से से आता है, जो पूरे-के-पूरे प्रोजेक्ट पूरे करता है, जैसे गांवों में बिजली पहुंचाना, सबस्टेशन बनाना और ज़मीन के नीचे केबल बिछाना.

अपने घर के अंदर वाली बढ़त

ज़्यादातर केबल बनाने वाली कंपनियां अपना कच्चा माल बाहर से ख़रीदती हैं. लेज़र अपना ख़ुद बनाती है. यह बेस मेटल के तार और इंसुलेशन कंपाउंड बाहर से मंगाने के बजाय अपने ही यहां बनाती है. इससे दो फ़ायदे होते हैं: यह कंपनी को कच्चे माल की क़ीमत के अचानक झटकों से बचाता है, और यह लेज़र को बड़े सरकारी कॉन्ट्रैक्ट पर सस्ती बोली लगाने देता है, जहां अक्सर पतले मार्जिन ही तय करते हैं कि कौन जीतेगा.

कंपनी ने ऐसी मंज़ूरियां कमाई हैं जिनकी जल्दी नक़ल करना मुश्किल है. यह भारतीय रेलवे के लिए ख़ास सिग्नलिंग और पावर केबल की मान्यता प्राप्त सप्लायरों में से एक है. यह प्रमाणपत्र ज़्यादातर कॉम्पिटिटरों को बाहर रखता है. इसका काम करने का रिकॉर्ड इससे भी आगे जाता है: इसने बाढ़ में डूबने वाले नदी के टापुओं तक बिजली पहुंचाई है, जहां सिर्फ़ नाव से पहुंचा जा सकता है, घने जंगलों और पहाड़ी इलाक़ों तक, जहां आम कंस्ट्रक्शन का इंतज़ाम काम नहीं करता.

लेज़र ने भारत में AECC (एल्युमिनियम एनकैप्सुलेटेड कार्बन कोर) बनाने के लिए एक अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी से हाथ मिलाया है, जो अगली पीढ़ी का एक पावर कंडक्टर है. यह आम केबल के भारी स्टील कोर की जगह एल्युमिनियम में लिपटा एक हल्का कार्बन कोर इस्तेमाल करता है, जो बिना झुके दो से तीन गुना ज़्यादा बिजली ढोता है. यह आम इंस्टॉलेशन इक्विपमेंट के साथ भी चलता है, इसलिए बिजली कंपनियों को अपने लाइन कर्मचारियों को नई ट्रेनिंग देने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

ऐसा सेक्टर, जिसे कई वजहों से बूस्ट मिल रहा है 

सौर और पवन ऊर्जा की तरफ़ भारत का बढ़ता क़दम पूरी तरह नई ट्रांसमिशन लाइनें मांगता है, ताकि दूर-दराज़ की जगहों पर बनी बिजली को मुख्य ग्रिड तक लाया जा सके. ग्रिड चलाने वाले अब नई लाइनें बनाने के बजाय पुरानी मीनारों पर लगी पुरानी केबल को ज़्यादा क्षमता वाली केबल से बदल रहे हैं. यही लेज़र का हालिया बाज़ार है.

रेलवे और मेट्रो के सिग्नलिंग सिस्टम का इलेक्ट्रिफिकेशन उसी मान्यता प्राप्त प्रोडक्ट लाइन पर टिका है. स्थानीय बिजली बांटने के नेटवर्क सुधारने की सरकारी योजनाएं कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट की एक पक्की क़तार जोड़ती हैं, न कि एक बार का उछाल. कंपनी अपने मौजूदा कंस्ट्रक्शन और प्रोजेक्ट-मैनेजमेंट के तजुर्बे का इस्तेमाल पानी की पाइपलाइन और सौर बिजलीघरों के काम की बोली लगाने में भी कर रही है.

मांग पर कोई सवाल नहीं है. सवाल यह है कि क्या Laser Power & Infra उस मांग को कैश में बदल सकती है.

Laser Power & Infra IPO का ब्यौरा

कुल IPO आकार (₹ करोड़)
742
ऑफ़र फ़ॉर सेल (₹ करोड़) 200
फ़्रेश इश्यू (₹ करोड़) 542
प्राइस बैंड (₹) 203-214
सब्सक्रिप्शन डेट 9 जुलाई - 13 जुलाई 2026
इश्यू का मक़सद कर्ज़ चुकाना या पहले चुकाना, और आम कंपनी ज़रूरतें

IPO के बाद

मार्केट कैप (₹ करोड़)
3,004
नेट वर्थ (₹ करोड़) 1,267
प्रमोटर हिस्सेदारी (%) 75.3
प्राइस/अर्निंग रेशियो (P/E) 19.8
प्राइस/बुक रेशियो (P/B) 4.1

वित्तीय इतिहास

मुख्य आंकड़े 2 साल CAGR (%) FY26 FY25 FY24
आमदनी (₹ करोड़) 15.4 2,326 2,570 1,748
EBIT (₹ करोड़) 45.2 272 219 129
PAT (₹ करोड़) 72.5 119 104 40
नेट वर्थ (₹ करोड़) - 725 575 473
कुल कर्ज़ (₹ करोड़) - 871 504 403
कामकाज से कैश - -119 60 171
EBIT यानी ब्याज और टैक्स से पहले की कमाई PAT यानी टैक्स के बाद मुनाफ़ा

मुख्य रेशियो

मुख्य रेशियो 3 साल औसत (%) FY26 FY25 FY24
ROE (%) 14.9 18.3 19.8 8.4
ROCE (%) 16.9 19.1 19.1 12.4
EBIT मार्जिन (%) - 11.7 8.5 7.4
कर्ज़-से-इक्विटी (गुना) - 1.2 0.9 0.9
ROE यानी इक्विटी पर रिटर्न ROCE यानी लगाई गई पूंजी पर रिटर्न 

ऊपरी आंकड़ों के नीचे

मुनाफ़ा और कैश एक ही चीज़ नहीं होते. FY26 में, लेज़र का अब तक का सबसे बड़ा मुनाफ़ा, कामकाज से बाहर बहते कैश के साथ आया. कामकाज से मिला शुद्ध कैश माइनस ₹119 करोड़ पर पहुंच गई, जो FY25 के पॉज़िटिव ₹60 करोड़ से एक बड़ा नकारात्मक बदलाव है.

इसकी वजह है बिना चुके बिल. एक ही साल में ट्रेड रिसीवेबल (जो पैसा ग्राहकों से आना बाक़ी है) ₹357 करोड़ बढ़ गया, और रिकवरी में लगने वाला औसत समय FY25 के 135 दिन से बढ़कर FY26 में 196 दिन हो गया. आमदनी के मुक़ाबले ट्रेड रिसीवेबल का हिस्सा FY25 के 44% से तेज़ी से बढ़कर FY26 में 59% हो गया, जो Apar Industries और Dynamic Cables जैसी कंपनियों से काफ़ी ज़्यादा है, जिनका रिसीवेबल FY26 में आमदनी के क़रीब 23 से 24% था. नतीजा यह कि काम चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत का चक्र, जो मापता है कि पैसा कारोबार में वापस आने से पहले कितने समय फंसा रहता है, 88 दिन से बिगड़कर 138 दिन हो गया. सीधे शब्दों में, आमदनी और मुनाफ़ा कंपनी के पास पैसा आने से काफ़ी पहले ही दर्ज हो रहे हैं.

यह बनावट में ही है, कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं. कॉन्ट्रैक्ट का एक बड़ा हिस्सा राज्य और केंद्र सरकार की संस्थाओं और बिजली बोर्ड से जुड़ा है, जो लंबे और अंदाज़ा न लगने वाले भुगतान चक्रों के लिए जाने जाते हैं. ग्राहकों का दायरा जोख़िम और बढ़ाता है. सबसे बड़े 10 ग्राहक FY26 की आमदनी का 72% थे, जिसमें एक अकेला ग्राहक क़रीब एक-चौथाई का हिस्सेदार था. कंस्ट्रक्शन की तरफ़, ऑर्डर बुक का क़रीब 79% सरकारी ग्राहकों के पास है.

कमाने और वसूलने के बीच की खाई पाटने के लिए, कंपनी कर्ज़ पर टिकी है. कुल कर्ज़ दो साल में दोगुने से ज़्यादा हो गया, FY24 के ₹403 करोड़ से बढ़कर FY26 में ₹871 करोड़. कर्ज़ अब कंपनी की नेट वर्थ का 1.2 गुना है. FY26 में ब्याज की लागत तेज़ी से बढ़ी, जिसने उसी मुनाफ़े की बढ़त को खाया, जिसका ऊपरी आंकड़े जश्न मनाते हैं.

मुनाफ़ा बढ़ा, पर आमदनी घट गई

FY26 में आमदनी घट गई, जबकि पूरा सेक्टर बढ़ रहा था. कंपनी कहती है कि भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने कच्चे माल की लागत बढ़ा दी, जिससे कुछ ग्राहकों ने अपने ऑर्डर टाल दिए. पर बाक़ी कंपनियों में वैसी सुस्ती नहीं दिखी. Apar Industries ने FY26 में आमदनी में 23% और Dynamic Cables, एक छोटी और मिलती-जुलती कंपनी ने 17% बढ़त दर्ज की.

FY24 और FY26 के बीच, कंपनी ने अपनी मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षमता क़रीब 38% बढ़ाई. इसी दौरान इस्तेमाल 86% से गिरकर 62% रह गया. नई क्षमता ने नई बिक्री पैदा नहीं की.

वो क्षमता गई कहां, यह ज़्यादा बड़ी चिंता है. नए निवेश का क़रीब 70% खड़गपुर की एक यूनिट में गया, जो लो-टेंशन केबल और कंडक्टर बनाती है. बाक़ी 30% धुलागढ़ की यूनिटों में गया, जहां रेलवे सिग्नलिंग लाइनें और ख़ास प्रोडक्ट बनते हैं, जिन्हें प्रॉस्पेक्टस ख़ुद ज़्यादा मार्जिन वाला बताता है. हाल का ज़्यादातर पैसा वहां नहीं गया.

वैल्यूएशन का सवाल

FY26 की कमाई के 19.8 गुना पर, एक आकर्षक और तेज़ी से बढ़ते सेक्टर की पृष्ठभूमि में यह शेयर पहली नज़र में वाजिब लगता है. पर यहां संदर्भ मायने रखता है. इसकी सबसे क़रीबी लिस्टेड कंपनियां कहीं ऊंचे पर ट्रेड करती हैं: Apar Industries कमाई के 58 गुना पर, और Dynamic Cables, ज़्यादा मिलती-जुलती छोटी कंपनी, 21 गुना पर. लेज़र दोनों से नीचे बैठा है.

अपने ही सेक्टर की हर कंपनी से कम मल्टीपल होना कोई डिस्काउंट नहीं है जिसे बस किसी को नोटिस करना बाक़ी हो. यह आमतौर पर बाज़ार का किसी ख़ास शक़ की क़ीमत लगाना होता है, और यहां वो शक़ कैश के बहीखाते में साफ़ पढ़ा जा सकता है. लेज़र की बढ़ने की क्षमता पर तो कोई शक़ नहीं, पर उस बढ़त की क्वालिटी पर है. इस साल आमदनी के हर एक अतिरिक्त रुपये को टिकाए रखने के लिए उतना ही ज़्यादा काम चलाने वाला पैसा चाहिए था, और यही बोझ उस रिटर्न को दबा देता है जो कंपनी अपने हर नए लगाए रुपये पर कमाती है.

यह IPO इसे ठीक नहीं करता. फ़्रेश इश्यू का क़रीब ₹490 करोड़ कर्ज़ चुकाने में जाता है, जिससे ब्याज की लागत घटेगी और बैलेंस शीट थोड़ी संवरेगी. पर इससे अंदर की असली अड़चन नहीं बदलती. कोई असल री-रेटिंग तभी होगी जब लेज़र एक से ज़्यादा साल तक तीन चीज़ें साबित करे: रिसीवेबल्स और डेट में बढ़ोतरी के बिना आमदनी बढ़े, फ़ैक्ट्री यूटिलाइजेशन में सुधार, और मार्जिन का मेल ज़्यादा क़ीमत वाले प्रोडक्ट की तरफ़ खिसके. जब तक ये तीनों बातें एक साथ नहीं होतीं, तब तक यह शेयर सेक्टर के बड़े वादे के बजाय, अपने काम कर दिखाने की साख पर ही ट्रेड करता रहेगा.

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