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सारांशः जुलाई में SIP फ़्लो ने एक और रिकॉर्ड बनाया. लेकिन इस आंकड़े के पीछे, पिछले एक साल में सबसे छोटे 14 लाख अकाउंट्स ग़ायब हो गए. ख़बर इसलिए बड़ी दिखी क्योंकि जो बचतकर्ता टिके रहे, उन्होंने ज़्यादा पैसा डाला. लेकिन जिन्हें जोड़ने के लिए SIP की कहानी बनाई गई थी, वही अब छोड़कर जा रहे हैं.
मुझ जैसे भारत के कई म्यूचुअल फ़ंड के समर्थकों के लिए यह एक छोटा-सा महीने वाला जश्न बन गया है. AMFI पिछले महीने के SIP आंकड़े जारी करता है, जो लगभग हमेशा एक रिकॉर्ड होता है और हम इसे इस सबूत के तौर पर पेश करते हुए कहते हैं कि आम भारतीय ने 'सेफ़' बैंक डिपॉज़िट में छुपने या मार्केट में लालच के पीछे भागने के बजाय धीरे-धीरे बचत करना सीख लिया है. इस जुलाई में भी कुछ अलग नहीं हुआ. SIP के ज़रिए ₹31,961 करोड़ आए, यह लगातार पांचवां महीना है जब यह आंकड़ा ₹30,000 करोड़ से ऊपर रहा और लगातार 65वां महीना है जब इक्विटी फ़्लो पॉज़िटिव रहा है. यह आंकड़े बचत की आदत की गहरी जड़ों के पक्के सबूत लगने चाहिए, लेकिन थोड़ा गहराई से देखने पर कुछ चिंताएं सामने आती हैं.
दिक़्क़त यह है कि इस अहम आंकड़े के नीचे, सबसे छोटे बचतकर्ता शायद ग़ायब हो रहे हैं. पिछले फ़ाइनेंशियल ईयर में, ₹500 से ₹1,000 के बीच निवेश करने वाले अकाउंट्स में क़रीब 14 लाख की गिरावट आई है, जो कई सालों में पहली बार हुआ है, जबकि इससे नीचे वाला बैंड, यानी ₹500 से कम के अल्ट्रा-स्मॉल फ़ोलियो, वहीं के वहीं रहे और इससे ऊपर के हर बैंड में बढ़ोतरी हुई. कुल मिलाकर आंकड़ा अच्छा दिखता है क्योंकि बड़े अकाउंट्स इतने बढ़ गए कि नए रिकॉर्ड बन गए और सबसे छोटे अकाउंट्स की गिरावट छुप गई. यानी SIP का बूम और छोटे बचतकर्ता का ग़ायब होना, दोनों एक ही समय पर, एक ही डेटा में हो रहे हैं और हेडलाइन एक को दूसरे के भीतर छुपा देती है.
यह बात रुककर सोचने लायक़ है, क्योंकि इससे रिकॉर्ड का मतलब ही बदल जाता है. SIP की कहानी को एक रोशनदान की तरह सोचिए, जो पहली बार बचत करने वाले किसी व्यक्ति को कुछ सौ रुपए महीने के साथ इसके पतले सिरे से भीतर लाता है और सालों में उसे बड़े और स्थिर निवेश की तरफ़ ले जाता है. अब जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बताते हैं कि यह रोशनदान उन लोगों के लिए तो ठीक काम कर रहा है जो पहले से इसके भीतर हैं, लेकिन नए लोगों को भीतर आने देना बंद कर दिया है. यह अपने मौजूदा बचतकर्ताओं को रखता है और बढ़ाता है, लेकिन जिनके लिए इसे बनाया गया था, उन्हें वापस लौटा देता है. यह सेलिब्रेट करने के लिए एक अजीब तरह की कामयाबी है.
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मुझे पता है कि इसकी एक आम वजह बताई जाती है और वह आंशिक रूप से सही भी है, कुछ बचतकर्ता छोड़कर नहीं गए बल्कि उनकी इनकम और म्यूचुअल फ़ंड पर उनका भरोसा बढ़ने के साथ वे बड़ी रक़म की तरफ़ बढ़ गए. यह सोचना अच्छा लगता है और यह कुछ हलचल की वजह ज़रूर बता देता है, लेकिन यह ज़्यादातर हिस्से की वजह नहीं बता पाता. अगर 14 लाख बचतकर्ता एक पायदान ऊपर चढ़े होते, तो इससे ऊपर वाला बैंड लगभग 4 प्रतिशत बढ़ जाता. असल में यह सिर्फ़ आधे प्रतिशत के आसपास बढ़ा. हर बैंड में आए नए निवेशकों को जोड़ लेने पर भी यह अंतर पूरा नहीं भरता.
इससे एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आती है जिसे फ़ंड इंडस्ट्री में कोई खुलकर नहीं कहेगा. ₹500 से ₹1,000 वाली छोटी SIP शुरू से ही कमज़ोर थी, शुरू करना आसान था लेकिन उसके पीछे भरोसा कम था. इसे शायद हाल के रिटर्न देखकर शुरू किया गया होगा और निवेशक को बिना किसी गाइडेंस के छोड़ दिया गया, क्योंकि इतने छोटे अकाउंट को कोई हाथ पकड़कर आगे बढ़ाने का ख़र्च नहीं उठा सकता. इसलिए वोलैटिलिटी या ठहराव का पहला संकेत मिलते ही ऐसे फ़ोलियो ग़ायब हो जाते हैं.
असली दिक़्क़त यही है. किसी ऐसे अकाउंट के शुरुआती दौर में मार्केट का बहुत मतलब नहीं होता. आप जो पैसा हर महीने जोड़ते हैं, वह उससे कहीं ज़्यादा होता है जो आपको रिटर्न से मिल सकता है और निवेश अभी इतना छोटा होता है कि कंपाउंडिंग का असर दिखे ही नहीं. कुछ हज़ार रुपए के कॉर्पस के साथ, SIP रोक देना किसी भी मार्केट गिरावट से कहीं ज़्यादा नुक़सान पहुंचाता है. जब ये बचतकर्ता थोड़ी वोलैटिलिटी से घबराकर रुक जाते हैं, तो वे अपने भविष्य को उन पुराने निवेशकों से भी ज़्यादा नुक़सान पहुंचाते हैं जिनके अकाउंट में पहले से ही अच्छा मुनाफ़ा जमा है.
इसी डेटा में एक कड़वी विडंबना भी छुपी है. साल भर में, औसत मंथली SIP फ़्लो लगभग एक चौथाई बढ़ा, ₹13,052 करोड़ से ₹16,413 करोड़ तक और यह तब हुआ जब सबसे छोटे बचतकर्ता साथ छोड़ रहे थे. यह कुल आंकड़ा इसलिए बढ़ा क्योंकि जो लोग टिके रहे, उन्होंने ज़्यादा पैसा डाला और यही वजह है कि औसत तब भी बढ़ता है जब जिन बचतकर्ताओं के लिए इसे सेलिब्रेट किया जाना था, वे चुपचाप जा रहे होते हैं.
इसका हल क्या है? यह सवाल उन्हीं तय लोगों के सामने रखिए, तो जवाब भी वही घिसे-पिटे मिलेंगे: ज़्यादा डिस्क्लोज़र, एक और लिटरेसी ड्राइव, सेल्स के सख़्त नियम. असली दिक़्क़त यह है कि जिस चेन ने यह प्लान बेचा, उसमें किसी के पास भी किसी छोटे फ़ोलियो को ख़राब मार्केट में ज़िंदा रखने का कोई फ़ायदा नहीं है. जब तक छोटे अकाउंट्स के टिके रहने को किसी के लिए फ़ायदेमंद नहीं बनाया जाता, तब तक छोटा SIP सिर्फ़ इनक्लूज़न के नारे लगाने के काम आएगा, इससे ज़्यादा कुछ नहीं.
अगले महीने डेटा फिर आएगा. यह लगभग तय है कि यह भी एक रिकॉर्ड होगा और हम इसे उसी तरह सेलिब्रेट करेंगे जैसे हमेशा करते हैं. हम कुल आंकड़े का जश्न मनाएंगे और उसके भीतर छुपी असुविधाजनक बातों को नज़रअंदाज़ कर देंगे.
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