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सारांश: डेट फ़ंड और FD, दोनों पर अब टैक्स आपके इनकम स्लैब रेट के हिसाब से लगता है. लेकिन दोनों में एक बड़ा फ़र्क है - टैक्स कब चुकाना पड़ता है. यही फ़र्क लंबी अवधि में असर डाल सकता है.
बहुत से निवेशक मानते हैं कि डेट फ़ंड और FD पर टैक्स नियम एक जैसे होने के बाद अब दोनों में कोई अंतर नहीं बचा. वैल्यू रिसर्च के हालिया वीडियो में आशुतोष गुप्ता ने इस भ्रम को साफ़ किया.
टैक्स रेट एक जैसी, लेकिन टाइमिंग अलग
गुप्ता बताते हैं कि हां, अब डेट फ़ंड और FD दोनों पर स्लैब रेट के हिसाब से टैक्स लगता है. लेकिन असली फ़र्क़ समय का है.
FD में ब्याज हर साल आपकी इनकम में जोड़ा जाता है और उसी साल टैक्स लगता है - भले ही आपने वह पैसा निकाला न हो और वह FD में लॉक्ड ही क्यों न हो. यानी टैक्स हर साल चुकाना पड़ता है, चाहे पैसा हाथ में आया हो या नहीं.
डेट फ़ंड में स्थिति अलग है. यहां भी स्लैब रेट के आधार पर ही टैक्स लगता है, लेकिन सिर्फ़ तभी जब आप यूनिट्स बेचते हैं. जब तक फ़ंड में निवेश बना रहता है, टैक्स की देनदारी टलती रहती है.
डेफ़रल का फ़ायदा कैसे मिलता है
इस टैक्स की देनदारी टलने यानी डेफ़रल का मतलब है कि जो रक़म आप FD में हर साल टैक्स के रूप में चुका देते, वह डेट फ़ंड में निवेशित रहती है और उस पर भी रिटर्न मिलता रहता है. समय के साथ यह छोटा-सा फ़र्क़ कंपाउंडिंग के ज़रिए अच्छा-ख़ासा असर दिखा सकता है.
तो निष्कर्ष यह है कि टैक्स की दर के मामले में डेट फ़ंड और FD अब बराबर हैं, लेकिन टैक्स कब चुकाना है, इसमें डेट फ़ंड का पलड़ा भारी रहता है.
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डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है और इसे निवेश सलाह न माना जाए.
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ये लेख पहली बार सितंबर 11, 2026 को पब्लिश हुआ.





