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सारांशः Laurus Labs कभी सरकारी टेंडरों के भरोसे चलती थी, जहां सबसे सस्ती बोली जीतती थी. तब से कंपनी ने एक अलग तरह की दवा कंपनी बनने के लिए भारी ख़र्च किया है और बाज़ार ने इस पर ध्यान दिया है. लेकिन पिछली बार जब इसके मार्जिन इतने अच्छे दिख रहे थे, तब वो टिक नहीं पाए थे. इस बार क्या अलग है, और क्या शेयर का प्राइस पहले से ही इसका हिसाब लगा चुका है?
Laurus Labs कभी मुख्य रूप से HIV दवाओं की सप्लायर थी, जो ऐसे सरकारी टेंडरों में प्रतिस्पर्धा करती थी जहां अक्सर सबसे कम क़ीमत वाला जीतता था. आज ये ज़्यादा से ज़्यादा ग्लोबल दवा कंपनियों के लिए ऐसे कॉन्ट्रैक्ट के तहत इंग्रीडिएंट बनाने लगी है, जिनसे सालों तक बार-बार ऑर्डर मिल सकते हैं. बाज़ार ने इस बदलाव को नोटिस किया है. FY23 के आख़िर से अब तक शेयर का प्राइस 8 गुना से ज़्यादा बढ़ चुका है, क़रीब ₹280 से क़रीब ₹2,350 तक.
HIV दवाओं के भरोसे कारोबार की सीमाएं
Laurus ने 2005 में HIV दवाओं के लिए इंग्रीडिएंट बनाने से शुरुआत की. इन दवाओं को एंटीरेट्रोवायरल या ARV कहा जाता है. कंपनी एक्टिव फ़ार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) बनाती थी, यानी वो केमिकल जो दवा में असल इलाज का काम करता है, और बाद में तैयार टैबलेट भी बनाने लगी. कंपनी का कहना है कि उसके ARV प्रोडक्ट दुनिया भर में HIV से पीड़ित क़रीब एक-तिहाई लोगों तक पहुंचते हैं.
सरकारें और ग्लोबल हेल्थ प्रोग्राम ये दवाएं टेंडर के ज़रिए थोक में ख़रीदते हैं, और आमतौर पर सबसे कम बोली जीतती है. सप्लायरों के पास क़ीमत तय करने की ताक़त कम होती है, इसलिए मार्जिन कमाने के लिए उन्हें लागत कम रखनी पड़ती है. Laurus दूसरी दवाओं की ओर बढ़ना शुरू कर चुकी थी, लेकिन ARV अब भी उसका सबसे बड़ा कारोबार था. उसकी कमाई टेंडर की क़ीमतों के साथ ऊपर-नीचे होती रहती थी.
ज़्यादा दवा कंपनियां उन्हीं ऑर्डरों के पीछे भागने लगीं और क़ीमतें गिर गईं. दुनिया के सबसे बड़े टेंडर, यानी दक्षिण अफ़्रीका के टेंडर में FY24 के लिए कुछ HIV दवाओं की क़ीमतें आधी तक गिर गईं. Laurus ने अपनी क़ीमतें घटाने से पहले ही ऑर्डर गंवा दिए और उसकी टैबलेट की बिक्री तेज़ी से गिरी. उसका ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट मार्जिन FY23 के 26.5 प्रतिशत से गिरकर FY24 में 16 प्रतिशत रह गया.
Covid के एक बार के ऑर्डर ने कुछ समय तक इस नुक़सान को ढके रखा. एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत Laurus ने Covid की एक गोली के लिए इंग्रीडिएंट बनाया. दिसंबर 2022 में जब ये ऑर्डर ख़त्म हुआ, तो कमज़ोरी सामने आ गई. FY24 में मुनाफ़ा क़रीब 80 प्रतिशत गिर गया.
Laurus पहले ही अपनी दिशा चुन चुकी थी. अक्टूबर 2022 में उसने FY23 और FY24 के लिए ₹2,000 करोड़ ख़र्च करने का एलान किया, जिसमें से आधा कस्टम सिंथेसिस (CDMO) के लिए था. Covid ऑर्डर ने दिखा दिया कि ऐसे काम से कितनी कमाई हो सकती है और वो कमाई कितनी जल्दी ग़ायब भी हो सकती है.
पहले प्लांट, फिर ऑर्डर
कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफ़ैक्चरिंग में, कोई दवा ईजाद करने वाली कंपनी किसी दूसरी कंपनी को ये ज़िम्मा देती है कि वो पता लगाए कि उस दवा को बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए, और फिर उसे बनाए भी. ऐसी कंपनियों को CDMO (कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफ़ैक्चरिंग ऑर्गनाइज़ेशन) कहा जाता है.
ये काम हासिल करने में सब्र चाहिए. दवा कंपनियां कोई प्रोडक्ट सौंपने से पहले सप्लायर के प्लांट देखना चाहती हैं. एक बार दवा को मंज़ूरी मिल जाए, तो वो उसे शायद ही कहीं और ले जाती हैं, क्योंकि साइट बदलने के लिए रेगुलेटरी फ़ाइलिंग और नए सिरे से इंस्पेक्शन की ज़रूरत होती है, हालांकि बड़ी दवा कंपनियां अक्सर एक दूसरा सप्लायर भी रखती हैं. इसलिए Laurus को पहले प्लांट बनाने थे और ऑर्डर बाद में जीतने थे.
ऑर्डर धीरे-धीरे आए. शुरुआती दौर की दवाओं के लिए छोटे बैच ही चाहिए होते हैं. बड़ी मात्रा में ऑर्डर आख़िरी दौर के ट्रायल में और मंज़ूरी के बाद आते हैं, जिसमें सालों लग सकते हैं. इस बीच Laurus उन प्लांट और कर्मचारियों का ख़र्च उठाती रही, जिनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा था.
| FY23 | FY24 | FY25 | FY26 | H1 FY27 | |
|---|---|---|---|---|---|
| एसेट टर्नओवर (गुना) | 1.1 | 0.8 | 0.8 | 0.9 | 1 |
| ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट मार्जिन (%) | 26.5 | 16 | 20.4 | 26.9 | 33.2 |
| रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (%) | 23 | 6.6 | 10.2 | 18.2 | 22.5 |
| H1 FY27 यानी अप्रैल से सितंबर 2026. | |||||
कैसे CDMO बना ग्रोथ का इंजन
FY22 से सितंबर 2026 के बीच कंपनी ने नए प्लांट, लैब और इक्विपमेंट पर ₹5,000 करोड़ से ज़्यादा ख़र्च किए, ज़्यादातर API और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफ़ैक्चरिंग के लिए.
FY24 में Laurus का CDMO कारोबार हर तिमाही क़रीब ₹220-250 करोड़ कमाता था. अब ये ₹800 करोड़ से ज़्यादा कमाता है.
| FY23 | FY24 | FY25 | FY26 | H1 FY27 | |
|---|---|---|---|---|---|
| CDMO रेवेन्यू, स्मॉल मॉलिक्यूल (₹ करोड़) | 2,167 | 922 | 1,374 | 1,896 | 1,710 |
| कुल रेवेन्यू में हिस्सा (%) | 35.9 | 18.3 | 24.7 | 27.8 | 40.4 |
| सिर्फ़ स्मॉल-मॉलिक्यूल CDMO; Laurus Bio शामिल नहीं. | |||||
टेबल ये भी दिखाती है कि FY23 और आज में क्या फ़र्क़ है. FY23 में कॉन्ट्रैक्ट का काम बिक्री का क़रीब एक-तिहाई था, लेकिन इसका ज़्यादातर हिस्सा कोविड के एक ही ऑर्डर से आया था. आज ये क़रीब 40 प्रतिशत है. मैनेजमेंट का लक्ष्य है कि FY30 तक Bio समेत CDMO को बिक्री के क़रीब आधे तक ले जाया जाए.
इस रेवेन्यू का पहले से बड़ा हिस्सा अब उन दवाओं से आता है जो बाज़ार में बिक रही हैं. जून 2026 तिमाही में क़रीब 55 प्रतिशत रेवेन्यू बाज़ार में मौजूद दवाओं की सप्लाई से आया, और बाक़ी उन दवाओं से जो अभी ट्रायल में हैं. जून और सितंबर 2026, दोनों तिमाहियों में बिक्री ऊंचे स्तर पर टिकी रही, और Laurus जिन दवाओं की सप्लाई करती है, उनमें से कई और को मंज़ूरी मिलने का इंतज़ार है. लेकिन ख़ुद मैनेजमेंट मानता है कि CDMO रेवेन्यू में उतार-चढ़ाव रहता है और इसे पूरे साल के आधार पर आंकना चाहिए.
क्लाइंट्स के पास भी टिके रहने की वजहें हैं. Laurus अब किसी दवा को शुरुआती डेवलपमेंट से लेकर कमर्शियल मैन्युफ़ैक्चरिंग तक ले जा सकती है. ये नए तरीक़े भी अपनाती है, जैसे फ़्लो केमिस्ट्री, जिसमें रिएक्शन ट्यूबों से होकर लगातार चलते रहते हैं, और बायोकैटेलिसिस, जिसमें तेज़ केमिकल की जगह एंज़ाइम इस्तेमाल होते हैं. इसका क्वालिटी रिकॉर्ड भी काम आता है. Laurus बड़े रेगुलेटर के 54 इंस्पेक्शन पास कर चुकी है, जिनमें US FDA भी शामिल है. सिर्फ़ FY27 की पहली छमाही में ही क्लाइंट्स ने इसका 58 बार ऑडिट किया.
निष्कर्ष
Laurus के मार्जिन अब FY23 के पीक से भी ऊपर हैं, लेकिन असली परीक्षा ये है कि क्या ये टिके रहेंगे. पिछली बार ये एक बड़े ऑर्डर के सहारे थे और उसके ख़त्म होते ही तेज़ी से गिर गए. इस बार CDMO रेवेन्यू का आधे से ज़्यादा हिस्सा बाज़ार में बिक रही दवाओं से आता है, जिससे इसकी बुनियाद ज़्यादा मज़बूत है.
जोखिम क़ीमत में है. अर्निंग्स के क़रीब 95 गुना (P/E) पर, बाज़ार पहले से ही सालों तक मज़बूत ग्रोथ की उम्मीद लगाए बैठा है, जिससे किसी सुस्त तिमाही की गुंजाइश बहुत कम बचती है. कंपनी के अगले बड़े दांव, यानी पेप्टाइड्स और ओलिगोन्यूक्लियोटाइड्स, भी बिक्री में योगदान देने से अभी सालों दूर हैं.
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