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बड़ा-ही-बेहतर है इस झांसे में न आएं

जब तक कोई फ़ंड निवेश के सभी पैमानों पर खरा उतरे, तब तक किसी छोटी AMC के फ़ंड में निवेश करने में कोई हर्ज़ नहीं

जब तक कोई फ़ंड निवेश के सभी पैमानों पर खरा उतरे, तब तक किसी छोटी AMC के फ़ंड में निवेश करने में कोई हर्ज़ नहींAI-generated image

वैल्यू रिसर्च में, ये लंबे समय से एक मौलिक, और दृढ़ता से माना जाने वाला सिद्धांत रहा है कि म्यूचुअल फ़ंड की पैरेंटेज मायने नहीं रखती है. इसे जाति, धर्म, लिंग या जातीयता के आधार पर गैर-भेदभावपूर्ण होने का निवेश संस्करण कह सकते हैं. जब तक कोई फ़ंड निवेश के लायक़ होने के हमारे मानदंडों को पूरा करता है, तब तक हम इस बात की परवाह नहीं करते कि ये दुनिया के सबसे बड़े फ़ंड हाउस से आता है या किसी छोटी भारतीय AMC से, जो इस काम में सबसे कम उम्र की है.

इंसानों के बीच भेदभाव के उलट, जो बुनियादी तौर पर ग़लत है, छोटी और वंचित AMC को लेकर हमारा गैर-भेदभावपूर्ण रवैया पूरी तरह से व्यावहारिक अनुभव से प्रेरित है. जब तक ये दूसरे सभी निवेश के मानदंडों को पूरा करता है, तब तक छोटी AMC के फ़ंड में निवेश का कोई नुक़सान नहीं है. हमारी स्टार रेटिंग में, हमें रेटिंग और AMC के साइज़ के बीच कोई संबंध नहीं दिखता है. औसत रेटिंग और प्रबंधन के तहत AMC परिसंपत्तियों के बीच का संबंध गणितीय रूप से महत्वहीन 0.03 है. इसलिए, हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि छोटी AMC के फ़ंड का बड़ी या पुरानी AMC के फ़ंड से बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना कम नहीं है.

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हालांकि, ये कोई सार्वभौमिक दृष्टिकोण नहीं है. अधिकांश निवेश सलाहकार और विश्लेषक छोटे फ़ंड हाउसों की अनदेखी करते हैं. मैंने बहुत से विश्लेषण और सलाहों के दस्तावेज़, समाचार पत्र और यहां तक ​​कि मीडिया रिपोर्ट देखी हैं जो साफ़-साफ़ ये बात कहती हैं. वे बस शुरुआत ये कहकर करते हैं कि वे केवल X करोड़ से ऊपर के फ़ंड या केवल टॉप पांच AMC या केवल उन AMC पर विचार करते हैं जो X करोड़ से ज़्यादा का प्रबंधन करते हैं. इसके पीछे का तर्क क्या है इस बात को वो कभी नहीं समझाते. निवेशक ऐसे बयानों को पढ़ते हैं और छोटी AMC के खिलाफ़ अपने मन में पूर्वाग्रह बनाते हैं. अब, फ़ंड्स के रेग्युलेटर, सेबी ने भी इस मामले में दखल दिया है और व्यावहारिक रूप से घोषित किया है कि छोटी AMC 'नॉन-सीरियस' हैं.

इनमें से कुछ भी सच नहीं है. रेग्युलेटर के विचारों को छोड़कर, बाक़ी सभी विचार दो वजहों से पक्षपाती हैं. एक तो सभी वस्तुओं और सेवाओं के लिए बड़े प्रोवाइडरों के पक्ष में हमारा स्वाभाविक पूर्वाग्रह है, जैसे 'उबर लोकल टैक्सी से बेहतर/सुरक्षित होनी चाहिए' या 'मैकडॉनल्ड्स का खाना लोकल रेस्तरां से बेहतर होना चाहिए' वगैरह. लोगों को लगता है कि बड़ी कंपनियां बेहतर हैं. असल में कुछ व्यवसायों में ऐसा सच हो सकता है, लेकिन म्यूचुअल फ़ंड्स में इसका कोई आधार नहीं है. ये एक बारीक़ी से रेग्युलेट की जाने वाली इंडस्ट्री है, और सभी AMCs को अपने बिज़नस में तर्कसंगत होने, वैधता और पारदर्शिता के एक जैसे मानकों का पालन करना होता है. कुछ दूसरे उद्योगों के विपरीत, ये सिर्फ़ सिद्धांत ही नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों में अनुभव के आधार पर साबित हो चुका है.

इस बड़ा-बेहतर-है वाले पूर्वाग्रह का दूसरा कारण व्यावसायिक है. एडवाइज़र और डिस्ट्रीब्यूटर केवल बड़े फ़ंड हाउस से ज़्यादा पैसा कमाते हैं. और जब आप फ़ंड बेच रहे होते हैं, तो छोटे AMC के अच्छे फ़ंड के खिलाफ़ साइज़ का तर्क एक अच्छा हथियार होता है. चूंकि छोटे फ़ंड हाउस के पास बहुत सारे अच्छे फ़ंड हैं, इसलिए बड़े फ़ंड हाउस के सेल्समैन विकल्पों को कम करने के लिए साइज़ के तर्क का इस्तेमाल कर सकते हैं. साथ ही, पूरी संख्या में, बड़े फ़ंड हाउस के पास ज़्यादा अच्छे फ़ंड होते हैं, क्योंकि उनके पास शुरू से ज़्यादा फ़ंड होते हैं. इससे ये भ्रम हो सकता है कि बड़ी AMC बेहतर हैं. ये वैल्यू रिसर्च रेटिंग के मामले में भी सच है.

अंत में, निवेशक हार जाते हैं क्योंकि वे छोटे फ़ंड हाउस के अच्छे फ़ंड पर विचार न करके विकल्पों का दायरा छोटा कर देते हैं.

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