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निवेश की कम लागत, बिक्री के नए नियम और डेट फंड को ज्‍यादा सुरक्षित बनाने जैसे बड़े कदम 2019 में म्‍युचुअल फंड की दुनिया में उठाए गए

निवेश की कम लागत, बिक्री के नए नियम और डेट फंड को ज्‍यादा सुरक्षित बनाने जैसे बड़े कदम 2019 में म्‍युचुअल फंड की दुनिया में उठाए गए

यह साल का ऐसा समय होता है जब किसी खास क्षेत्र में हुए बदलाव का लेखा जोखा लिखा जाता है। हालांकि मुझे यह चलन कभी पसंद नहीं आया क्‍योंकि मुझे नहीं लगता कि निवेश की दुनिया में आए बदलाव को देखने के लिए एक साल का समय पर्याप्‍त है। इसके अलावा यह भी जरूरी नहीं है कि कैलेंडर में साल बदलने से चीजें बदलें। किस निवेश ने 2019 में अच्‍छा किया और कौन सा निवेश 2020 में अच्‍छा करेगा इसके बारे में चिंता करने से निवेशकों को कुछ खास मिलना नहीं है।

हालांकि 2019 में म्‍युचुअल फंड में कई नियामकीय बदलाव हुए हैं जो कि निवेशकों के लिए बेहद अहम हैं। इससे फंड चुनने के तरीके और फंड के रिटर्न पर गहरा असरा असर होगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि म्‍युचुअल फंड में निवेश का खर्च काफी कम हो गया है। यानी म्‍युचुअल फंड निवेशकों से जो चार्ज लेते थे उसमें काफी कमी आई है। इसके अलावा म्‍युचुअल फंड द्वारा इंटीमीडियरीज को दिए गए जाने वाले कमीशन की प्रकृति में भी बदलाव आया है। इन सभी बदलावों की घोषणा सितंबर 2018 में की गई थी लेकिन ये बदलाव अमल में 1 अप्रैल, 2019 से आए हैं।

बहुत से निवेशक इसे नियामकीय पहल या सेबी की सख्‍ती के तौर पर देख रहे हैं लेकिन यह इससे कहीं ज्‍यादा प्रभावी कदम है। इसके तहत न सिर्फ आपको फंड बेचने वालों यानी फंड इंटरमीडियरीज के बिजनेस मॉडल में बड़े पैमाने पर सुधार किया गया है बल्कि म्‍युचुअल फंड के बिक्री मॉडल को भी बेहतर बनाया गया है। पहले इस बिजनेस का आधार कमीशन मॉडल हुआ करता है। इस मॉडल में म्‍युचुअल फंड आपके निवेश करने पर इंटरमीडियरी को अपफ्रंट कमीशन का भुगतान करता था। इसके बजाए अब उनको सिर्फ ट्रेल कमीशन मिलेगा। ट्रेल का मतलब है कि जब तक आपकी रकम फंड में निवेशित रहेगी तब तक एक छोटी रकम डिस्‍ट्रीब्‍यूटर को मिलती रहेगी।

अपफ्रंट कमीशन की वजह से डिस्‍ट्रीब्‍यूटर का फायदा इसी बात में था कि बस एक बार ट्रांजैक्‍शन हो जाए। और ज्‍यादा कमीशन कमाने के लिए डिस्‍ट्रीब्‍यूटर चाहते थे कि ज्‍यादा से ज्‍यादा ट्रांजैक्‍शन हो। यानी निवेशक जल्‍दी जल्‍द फंड बेच कर नए नए फंड में निवेश करता रहे। लेकिन यह बात निवेशक को रिटर्न के मोर्चे पर बहुत ज्‍यादा नुकसान पहुंचाती थी।

लेकिन अब उनकी कोशिश होगी कि वे निवेशक की रकम को कुछ अच्‍छे फंडों में लगाए जिसमें निवेशक लंबे समय तक निवेश बनाए रखे। अब डिस्‍ट्रीब्‍यूटर और निवेशक दोनों का फायदा लंबे समय तक निवेश बनाए रखने मे है। पहले ऐसा नहीं था। इसी के साथ म्‍युचुअल फंड निवेशकों से जो रकम चार्ज करते थे उसे भी घटा दिया गया है। ये दो बदलाव निवेशकों के लिए बड़े फायदे लेकर आए हैं। अब डिस्‍ट्रीब्‍यूटर निवेशक को बेहतर सलाह देंगे और वे आकर्षक रिटर्न हासिल कर सकेंगे।

इस साल म्‍युचुअल फंड में एक बड़ी चीज डेट फंड में सुधार को लेकर हुई है। पिछले एक साल से भी अधिक समय से डेट फंड गुणवत्‍ता की समस्‍या से जूझ रहे थे। आईएलएंडएफएस और इसके बाद जी एस्‍सेल ग्रुप के प्रमोटर्स के सामने आई वित्‍तीय दिक्‍कतों की वजह से अब म्‍युचुअल फंड निवेशक रिटर्न और जोखिम के बीच संबंध पर अब अधिक ध्‍यान दे रहे हैं। दुर्भाग्‍य से बहुत से निवेशक इस चेतावनी को नजरअंदाज करते थे कि म्‍युचुअल फंड बाजार के जोखिमों के आधीन है। यह उसी तरह से था जैसे सिगरेट पीने वाले स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़े जोखिम को नजरअंदाज करते थे। यह अच्‍छी बात नहीं थी।

लंबे समय से डेट फंड न के बराबर क्रेडिट रिस्‍क वाले साबित हुए हैं। भारतीय बैंकों में एनपीए की समस्‍या के विपरीत डेट फंड में एनपीए की कोई समस्‍या नहीं थी। यह निवेशकों के लिए अच्‍छा साबित हुआ लेकिन इसकी वजह से निवेशक कुछ हद तक लापरवाह हो गए थे। फंड बेचने वालों ने फंड बेचा और निवेशकों ने खरीदा। निवेशकों ने ऐसे फंड भी खरीदे जिनको खरीदने में सतर्कता बरतना जरूरी था। कुछ फंड मैनेजर्स ने भी तेजी दिखाई और सतकर्ता और डायवर्सीफिकेशन के बुनियादी सिद्धांत को नजरअंदाज किया।

एक छोटे संकट के जवाब में सेबी ने जोखिम को कम करने और जोखिम को छिपाने से रोकने के लिए कई कदम उठाए। अगर कोई फंड ऐसा जिसमें बॉण्‍ड एक्‍सपोजर से जुड़ी दिक्‍कतें तो उसकी कम कीमत की पहचान की जानी चाहिए। इसी तरह से अगर कोई बॉण्‍ड ऐसा है जिसकी मांग नहीं है तो उसे अलग पोर्टफोलियो अ साइट पॉकेट में रखा जा सकता है। इससे बॉण्‍ड की मांग कम होगी लेकिन वह बाद में अपनी वैल्‍यू रिकवर कर सकेगा।
इन सब बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि साल के अंत में अब म्‍युचुअल फंड निवेश के लिए ज्‍यादा साफ सुथरे और सुरक्षित हैं।

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