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₹25 लाख से ज़्यादा जमा हो गए? PRIM, PMS या SIF में जाने से पहले यह सवाल पूछिए

SEBI के नए PRIM रूट के बाद बड़े निवेशकों के सामने तीन विकल्प हैं. पर तीनों अलग काम करते हैं, और सही चुनाव प्रोडक्ट से नहीं, आपकी ज़रूरत से शुरू होता है.

SEBI के नए PRIM रूट के बाद बड़े निवेशकों के सामने तीन विकल्प हैं. पर तीनों अलग काम करते हैं, और सही चुनाव प्रोडक्ट से नहीं, आपकी ज़रूरत से शुरू होता है.Abhijeet Pandey/AI Generated Image

सारांशः निवेश की रक़म बढ़ने के साथ विकल्प भी बढ़ जाते हैं. SEBI के नए PRIM रूट के बाद अब ₹25 लाख से कोई पोर्टफ़ोलियो मैनेजर आपके लिए म्यूचुअल फ़ंड का पोर्टफ़ोलियो चला सकता है. पर PRIM, PMS और SIF, तीनों अलग-अलग काम करते हैं. इनमें से किसी को चुनने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि आपके मौजूदा पोर्टफ़ोलियो में कमी क्या है, और उसे दूर करने के लिए कितनी फ़ीस चुकाना सही है.

आपने कई साल निवेश करके एक अच्छी रक़म जोड़ ली है. अब कोई सलाह देता है कि म्यूचुअल फ़ंड से आगे बढ़िए, अपना पैसा किसी एक्सपर्ट से संभलवाइए. कोई SIF की ख़ास स्ट्रैटेजी गिनाता है, कोई PMS की यह ख़ूबी बताता है कि उसमें निवेश आपके अपने नाम पर रहता है. और अब एक नया नाम भी आ गया है, PRIM.

इतने विकल्पों के बीच सबसे काम का सवाल यह है: मेरे निवेश में ऐसी कौन सी ज़रूरत है, जो अभी पूरी नहीं हो रही?

इसका जवाब जाने बिना कोई नया प्रोडक्ट चुनना अंधेरे में तीर चलाने जैसा है. हो सकता है आपको बस सही फ़ंड चुनने में मदद चाहिए. हो सकता है आपको किसी ख़ास स्ट्रैटेजी की ज़रूरत हो. और यह भी हो सकता है कि आपका मौजूदा म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो ही आपके गोल के लिए काफ़ी हो.

PRIM है क्या, और यह नया क्यों है

PRIM का पूरा नाम Portfolio Managers Route for Investing in Mutual Fund units है. SEBI के बोर्ड ने इसे 24 सितंबर 2026 को मंज़ूरी दी है, नए SEBI (पोर्टफ़ोलियो मैनेजर्स) रेगुलेशंस, 2026 के तहत, जो 2020 के पुराने नियमों की जगह लेंगे.

इसमें आप अपने लिए फ़ंड चुनने और उनका पोर्टफ़ोलियो संभालने का काम एक रजिस्टर्ड पोर्टफ़ोलियो मैनेजर को सौंपते हैं. वो तय करता है कि किस फ़ंड में कितना पैसा जाएगा, और ज़रूरत पड़ने पर उसे बदलता है. इसके लिए कम से कम ₹25 लाख चाहिए, जो आम PMS के ₹50 लाख का आधा है.

यानी PRIM ख़ुद कोई नया फ़ंड नहीं है. यह PMS के अंदर एक सेवा है, जिसमें मैनेजर आपके लिए भारतीय फ़ंड हाउस के डायरेक्ट प्लान, ETF, इंडेक्स फ़ंड और SIF चुनकर एक पोर्टफ़ोलियो बनाता है.

इसमें दो बातें ग़ौर करने लायक़ हैं. पहली, यहां सिर्फ़ डायरेक्ट प्लान इस्तेमाल होंगे, जिनमें डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन नहीं होता. यानी मैनेजर की कमाई फ़ंड के ख़र्च में छिपी नहीं रहेगी, वो आपसे खुलकर फ़ीस लेगा. और दूसरी, हितों के टकराव को रोकने के लिए यह शर्त रखी गई है कि मैनेजर अपने ही ग्रुप या उससे जुड़े फ़ंड हाउस की स्कीमों में 25% से ज़्यादा पैसा नहीं लगा सकता.

ध्यान रखिए, यह अभी बोर्ड की मंज़ूरी है. PRIM कब से शुरू होगा और इसकी पूरी शर्तें क्या होंगी, यह SEBI की आख़िरी अधिसूचना से ही पक्का होगा.

3 विकल्प और उनके काम

इन तीनों को समझने का सबसे सीधा तरीक़ा यह देखना है कि इनमें मैनेजर आपके लिए असल में करता क्या है.

विकल्प मैनेजर क्या करता है कम से कम निवेश
SIF कई निवेशकों का पैसा मिलाकर एक तय स्ट्रैटेजी से चलाता है, जिसमें लॉन्ग-शॉर्ट जैसे तरीक़े भी हो सकते हैं ₹10 लाख
PMS आपके नाम पर रखे शेयर और दूसरे निवेश का पोर्टफ़ोलियो संभालता है ₹50 लाख
PRIM आपके लिए म्यूचुअल फ़ंड, ETF, इंडेक्स फ़ंड और SIF चुनकर पोर्टफ़ोलियो चलाता है ₹25 लाख

SIF की ₹10 लाख की शर्त हर स्कीम पर अलग नहीं, बल्कि एक फ़ंड हाउस की सभी SIF स्ट्रैटेजी में आपके PAN से लगे कुल पैसे पर लागू होती है. उसी फ़ंड हाउस के आम म्यूचुअल फ़ंड में लगा पैसा इसमें नहीं गिना जाता. और एक्रेडिटेड इन्वेस्टर को इस शर्त से छूट है.

इससे PRIM के बारे में एक काम की बात निकलती है. अगर मैनेजर आपके PRIM पोर्टफ़ोलियो में SIF भी रखना चाहे, तो उसे हर फ़ंड हाउस के SIF में कम से कम ₹10 लाख लगाने होंगे. यानी ₹25 लाख के PRIM पोर्टफ़ोलियो में ज़्यादा से ज़्यादा एक या दो फ़ंड हाउस के SIF ही आ पाएंगे.

हर विकल्प में मैनेजर से अलग सवाल पूछिए

  • PRIM में मैनेजर से पूछिए कि उसने कौन सा फ़ंड क्यों चुना, कहीं अलग-अलग फ़ंड में वही शेयर बार-बार तो नहीं आ रहे, और किन हालात में वो पोर्टफ़ोलियो बदलेगा. और यह भी पूछिए कि उसमें कितना पैसा उसके अपने ग्रुप के फ़ंड हाउस की स्कीमों में है. इन जवाबों से पता चलेगा कि आप जो फ़ीस दे रहे हैं, उसके बदले असल में कितनी मदद मिल रही है.
  • PMS में सवाल अलग होंगे. यहां निवेश आपके नाम पर रहता है, पर सिर्फ़ अलग खाता होने से पोर्टफ़ोलियो आपकी पसंद का नहीं बन जाता. पूछिए कि क्या मैनेजर किसी शेयर या सेक्टर से दूर रहने की आपकी शर्त मानेगा. और यह भी समझ लीजिए कि आप कौन सी PMS ले रहे हैं. डिस्क्रेशनरी PMS में तय समझौते के भीतर निवेश के फ़ैसले मैनेजर लेता है, जबकि नॉन-डिस्क्रेशनरी PMS में उन फ़ैसलों में आपकी भी भूमिका रहती है.
  • SIF में असली सवाल उसकी स्ट्रैटेजी का है. SIF तभी देखिए, जब आपको उसकी किसी ख़ास स्ट्रैटेजी की सच में ज़रूरत हो. जैसे कुछ स्ट्रैटेजी डेरिवेटिव के ज़रिए शेयर का प्राइस गिरने पर भी कमाने की कोशिश करती हैं, जिसे शॉर्ट पोज़िशन कहते हैं. पर अगर बाज़ार अंदाज़े के उलट गया, तो इसी पोज़िशन से नुक़सान भी होगा. PRIM में आप फ़ंड चुनने की सेवा परख रहे हैं, PMS में पोर्टफ़ोलियो संभालने का तरीक़ा, और SIF में उसकी स्ट्रैटेजी.

फ़ीस का छोटा प्रतिशत, रुपयों में बड़ी रक़म

  • PRIM में मैनेजर की तय फ़ीस आपके AUM के 1% से ज़्यादा नहीं हो सकती. इसके ऊपर प्रदर्शन के हिसाब से फ़ीस लेने की छूट भी है. और जिन फ़ंड में पैसा लगेगा, उनका अपना ख़र्च अलग है, जो उनकी NAV में पहले से जुड़ा रहता है. इसलिए 1% को कुल ख़र्च मानकर हिसाब मत लगाइए.

इसे रुपयों में देखिए. ₹25 लाख के PRIM पोर्टफ़ोलियो पर 1% की तय फ़ीस का मतलब है साल के ₹25,000. और यह फ़ंड के अपने ख़र्च और किसी प्रदर्शन वाली फ़ीस के अलावा है.

  • PMS में भी यही हिसाब लगाइए. मान लीजिए ₹50 लाख के औसत पोर्टफ़ोलियो पर सालाना तय फ़ीस 1% है, तो यह ₹50,000 हुई. यह सिर्फ़ समझाने के लिए है, हर PMS की फ़ीस यही नहीं होती. इसके अलावा PMS में ऑपरेटिंग ख़र्च की सालाना लिमिट एवरेज डेली AUM का 0.5% है, जिसमें ब्रोकरेज शामिल नहीं है. नए फ़ैसले के मुताबिक़ क़ानूनी टैक्स और चार्ज भी इस लिमिट से बाहर रखे जाएंगे.

इसलिए किसी भी मैनेजर से अपनी रक़म पर पूरा हिसाब मांगिए. सामान्य साल में कितनी फ़ीस लगेगी, अच्छे रिटर्न वाले साल में कितनी, और नुक़सान वाले साल में कितनी? प्रदर्शन वाली फ़ीस कब से लगेगी? और पैसा निकालने या पोर्टफ़ोलियो बदलने पर कौन से ख़र्च होंगे? अलग-अलग हालात का हिसाब हाथ में हो, तो तुलना अपने आप आसान हो जाती है.

नए नियमों से PMS के हाथ खुले, पर जोख़िम भी बढ़ा

नए नियमों में PMS को कई नई छूट मिली हैं. अब वो IPO और नए डेट इश्यू में पैसा लगा सकेगी और विदेशी शेयर, बॉन्ड, REIT, फ़ंड और ETF जैसी विदेशी सिक्योरिटीज़ में भी, जिन पर FEMA और RBI के नियम लागू होंगे. एक्सचेंज पर चलने वाले डेरिवेटिव में वो ग्राहक के AUM के 1.25 गुना तक एक्सपोज़र ले सकेगी.

और डिस्क्रेशनरी PMS में ग्राहक की सहमति से AUM का 10% तक इन्वेस्टमेंट ग्रेड वाले अनलिस्टेड, नॉन-कन्वर्टिबल डेट में लगाया जा सकेगा. नॉन-कन्वर्टिबल यानी ऐसा डेट, जो आगे चलकर शेयर में नहीं बदलता. नॉन-डिस्क्रेशनरी PMS के लिए अनलिस्टेड सिक्योरिटीज़ की 25% वाली लिमिट अलग है, इसलिए दोनों को एक मत समझिए.

SIF में भी ऐसी ही एक लिमिट है. हेजिंग से अलग, यानी मौजूदा निवेश का जोख़िम घटाने के लिए ली गई पोज़िशन के अलावा, बिना हेज वाली शॉर्ट पोज़िशन नेट एसेट्स के 25% तक ही हो सकती है.

पर इन सीमाओं का मतलब यह नहीं कि आपका नुक़सान भी इतने प्रतिशत तक ही रहेगा. इसलिए जानिए कि मैनेजर असल में कितना एक्सपोज़र लेगा, उसका अंदाज़ा ग़लत निकला तो वो क्या करेगा, और जो निवेश आसानी से बिकते नहीं, उनकी क़ीमत वो कैसे तय करेगा.

लोकप्रियता नहीं, रिकॉर्ड देखिए

SIF में पैसा तेज़ी से आया है. AMFI के मुताबिक़ इस कैटेगरी का मासिक औसत AUM अक्टूबर 2025 के ₹891.16 करोड़ से बढ़कर अगस्त 2026 में ₹26,446.86 करोड़ हो गया. और इसी दौरान फ़ोलियो 10,212 से बढ़कर 1,25,539 हो गए. पर ध्यान रखिए, यह खातों की गिनती है, निवेशकों की नहीं. एक निवेशक के कई फ़ोलियो हो सकते हैं.

ये आंकड़े बढ़ती दिलचस्पी दिखाते हैं, क़ाबिलियत नहीं. कोई स्ट्रैटेजी अलग-अलग बाज़ार हालात में कैसी चली, इसका जवाब सिर्फ़ उसके प्रदर्शन से मिलेगा.

PMS की तुलना करते वक़्त हमेशा सारी फ़ीस और ख़र्च के बाद वाला रिटर्न देखिए. इसमें APMI पर मौजूद अलग-अलग स्ट्रैटेजी के आंकड़े मदद कर सकते हैं. और SIF को उसके बेंचमार्क के साथ परखिए. जितना भी रिकॉर्ड मौजूद हो, उसमें देखिए कि गिरावट कितनी आई, संभलने में कितना वक़्त लगा, और रिटर्न कितना लगातार रहा. किसी नई स्ट्रैटेजी के कुछ अच्छे महीने उसकी लंबे समय की क़ाबिलियत साबित नहीं करते.

पैसा कब वापस चाहिए, यह पहले तय कीजिए

जिस रक़म की आपको तय वक़्त पर ज़रूरत है, उसके लिए पैसा निकालने की शर्तें बहुत मायने रखती हैं.

आम PMS में एग्ज़िट लोड पहले साल में ज़्यादा से ज़्यादा 3%, दूसरे साल 2% और तीसरे साल 1% हो सकता है. 3 साल के बाद यह नहीं लगता. हालांकि समझौते और कुछ ख़ास निवेशकों के हिसाब से शर्तें अलग हो सकती हैं.

PRIM के स्ट्रक्चर को एग्ज़िट लोड के प्रावधानों से छूट दी गई है. पर उसके अंदर जिन फ़ंड में पैसा लगा है, उनका अपना एग्ज़िट लोड अलग मामला है. इसलिए पैसा निकालने से पहले दोनों स्तर के ख़र्च पूछ लीजिए.

और SIF में पैसा रोज़ भी निकल सकता है, तय अंतराल पर भी, या पहले सूचना देने के बाद भी, यह स्ट्रैटेजी पर टिका है. क्लोज़्ड-एंड और इंटरवल स्ट्रैटेजी की यूनिट एक्सचेंज पर लिस्ट होती हैं. पर वहां तुरंत ख़रीदार मिल जाए, या NAV के बराबर प्राइस मिल जाए, यह पक्का नहीं है.

आख़िर में, चुनाव अपने गोल से शुरू कीजिए

अगर आपके पास निवेश के लिए कुल ₹50 लाख हैं, तो PMS की शर्त पूरी हो जाना इसकी वजह नहीं है कि पूरी रक़म उसी में लगा दी जाए. पहले इमरजेंसी के पैसे, पास के गोल और लंबे समय के निवेश को अलग-अलग देखिए.

PRIM, PMS या SIF की जगह आपके पोर्टफ़ोलियो में तभी बनती है, जब उसका काम आपकी ज़रूरत से मेल खाता हो, और आप उसके ख़र्च और जोख़िम को अच्छी तरह समझते हों.

निवेश में अगला क़दम वही होना चाहिए, जो आपके गोल तक पहुंचना आसान बनाए. बड़ा नाम या ज़्यादा फ़ीस अपने आप इसकी गारंटी नहीं देते.

यह भी पढ़ें: PMS से कमोडिटी तक: SEBI के फ़ैसलों का आप पर क्या होगा असर?

ये लेख पहली बार सितंबर 30, 2026 को पब्लिश हुआ.

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