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टैक्‍स सेविंग खामियों को दूर करने का समय

वित्‍त मंत्री को बजट में बचत करने वालों और निवेशकों की पुरानी शिकायतें दूर करनी चाहिए

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यह समय ऐसा समय है जब बहुत से लोग सेंटा क्लॉज को लेटर लिखकर मनचाही गिफ्ट मांगते हैं। क्रिसमस तो बीत चुका है। मैं बात कर रहा हूं केंद्रीय बजट और वित्त मंत्री से की जाने वाली मांगों की। इनमें कुछ मांगे तमाम इंडस्ट्रीज और सेक्टर्स की हैं। हालांकि अब इनमें काफी कुछ बदलाव आ गया है। अब जीएसटी रेजीम में सिर्फ नॉन टैक्सेशन इश्यू का ही समाधान बजट में किया जा सकता है। इसके बाद मीडिया है, जिसमें मेरे जैसे लोग आते हैं, जो चाहते हैं कि आबादी के एक हिस्से के लिए कुछ किया जाना चाहिए।

पिछले साल, ऐसा कुछ नहीं था। जनवरी 2021 की ओर पीछे मुड़ कर देखें तो पता चलता है कि पिछले दो दशकों से जबसे मैंने पर्सनल फाइनेंस के मसलों पर लिखना शुरू किया है, पिछला साल ही ऐसा साल जब मेरे पास लिखने के लिए मुकिश्ल से कुछ था। यह केंद्रीय बजट अपने साथ दो साल का बाधित एजेंडा लेकर चल रहा है। हालांकि, देश का बड़ा हिस्सा अब कुछ हद तक कोविड की रोकथाम में जुटा है और हम पूरी तरह से सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाए हैं।


अब बात करते हैं उन बातों की जो बजट पर्सनल फाइनेंस के स्पेस में कर सकता है या करना चाहिए। काफी समय से 80 सी टैक्स सेविंग लिमिट को बढ़ाने की मांग की जाती रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में जिस तरह की टैक्स सेविंग रकम मिडिल क्लास के लिए मायने रखती है और जो 80 सी की लिमिट बढ़ने पर उनको मिल सकती है उसमें एक तरह की डिलिंक रहा है।

यह अजीब लग रहा है ? मान लेते हैं कि 80 सी की लिमिट को 1.5 लाख रुपए से बढ़ा कर 1.75 लाख कर दिया जाता है, जो एक बड़ा बदलाव है। अगर ऐसा होता है तो उच्चतम टैक्स ब्रैकेट वालों को मंथली टैक्स बिल सिर्फ लगभग 700 रुपए कम होगा। प्रति माह 1 लाख रुपए से अधिक कमाने वालों के यह कुछ खास रकम नहीं होगी। निचले टैक्स ब्रैकेट वालों के लिए ऐसा ही है। सिवाय इसके कि इन्वेस्टमेंट टू सेविंग रेशियो खराब हो जाता है।

तो क्या 80 सी की लिमिट बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है ? नहीं ऐसा नहीं है। आप 80 सी में जो बचत करते हैं वह कुछ सालों के बाद कई गुना हो कर आपके पास वापस आ जाता है। यही नहीं, बहुत से लोगों के लिए जीवन भर की बचत की आदत अपनाने का रास्ता खोलता है। हकीकत यह है कि सेक्शन 80 सी टैक्स सेविंग लिमिट बढ़ाने से लोगों के जीवन पर सकारात्मक असर पड़ता है। इसका मौजूदा साल में टैक्स सेविंग से कोई मतलब नहीं है। ज्यादातर टैक्स-पेयर्स 80 का अधिकतम इस्तेमाल करते हैं। बहुत से लोग, यह निवेश ELSS फंड के जरिए करते हैं, जो कि लॉंग-टर्म इक्विटी इन्वेस्टर बनने का गेटवे बन गया है। टैक्स सेविंग लिमिट में 25,000 या 50,000 रुपए का इजाफा होने से एक व्यक्ति अपने जीवन में जितनी बचत कर सकता है उसमें कई गुना इजाफा होगा और इसका असर यह होगा कि बुढ़ापे में उसकी जीवन और बेहतर होगा। उदाहरण के लिए, पिछले 20 वर्षो में ELSS फंड में SIP ने 13 से 20 फीसदी तक रिटर्न दिया होता। यहां तक कि सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले फंड ने भी सालाना 13 फीसदी रिटर्न दिया होता।

इस असर को बढ़ाने के लिए टैक्स सेविंग कानून में एक बड़े सुधार की जरूरत लंबे समय से है। इसके तहत सेक्शन 80 सी को सेविंग और इन्वेस्टमेंट तक ही सीमित किया जाए। मौजूदा समय में, नॉन सेविंग खर्च जैसे एजुकेशन और टर्म इन्श्योरेंस को भी 80 सी के साथ जोड़ा गया है। इन खर्च की अलग से लिमिट होनी चाहिए।

इसके अलावा टैक्स पॉलिसी में एक और कमी है। यह कमी है लंबी अवधि की सेविंग पर कैपिटल गेन्स टैक्स, जो सेविंग और इन्वेस्टमेंट प्रभावित करता है। फरवरी 2018 से कैपिटल गेन्स पर 10 फीसदी टैक्स और सरचार्ज लिया जा रहा है। हालांकि सालाना 1 लाख रुपए तक का गेन टैक्स फ्री है। इस टैक्स में कुछ गलत नहीं है लेकिन दूसरी तरह की असेट पर लगने वाले लॉग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स के विपरीत यहां इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलता है। कैपिटल गेन्स का एक हिस्सा महंगाई खा जाती है। अगर आप डेट फंड में निवेश करते हैं महंगाई को सेट ऑफ किया जा सकता है लेकिन अगर आप इक्विटी में निवेश करते हैं तो इसे नजर अंदाज किया गया है। यह एक अजीब खामी है और इसे हटाने की जरूरत है। इसके अलावा, 1 लाख रुपए की टैक्स फ्री लिमिट को बढ़ाया जाना चाहिए। वर्षो बीत चुके हैं और 1 लाख रुपए की रियल वैल्यू काफी कम हो गई है।

निश्चित तौर पर, टैक्स सेविंग इन्वेस्टमेंट का मकसद न सिर्फ कुछ टैक्स छूट देना है बल्कि लोगों को सेविंग करने के लिए प्रोत्साहित करना है जिससे उनका भविष्य बेहतर और वे रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों को आसानी से पूरा कर सकें। छोटी- छोटी खामियां ऐसे गोल पर भारी पड़ सकती हैं और इनको दूर करने की जरूरत है।

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