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पूरी बात बस इतनी ही है

इंडैक्स पर ध्यान देना बंद करें--आपके स्टॉक के लिए इसका कोई मायने नहीं है

इंडैक्स पर ध्यान देना बंद करें--आपके स्टॉक के लिए इसका कोई मायने नहीं है

इंटरनेट पर सही जवाब पाने का सबसे अच्छा तरीक़ा सवाल पूछना नहीं, बल्कि ग़लत जवाब पोस्ट करना है, क्योंकि लोग ऑनलाईन दूसरों की आलोचना में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं बजाए उनकी मदद करने के।" ये बात मैंने ट्विटर पर पढ़ी और इसे-कम से कम कुछ लोग-कनिंघम का सिद्धांत कहते हैं। मैं नहीं जानता कि कनिंघम कौन हैं या कौन थे, और मैंने इसका पता लगाने की कोई कोशिश भी ज़रूरी नहीं समझी, कि उन्होंने ये सिद्धांत क्यों रचा क्योंकि यक़ीनन ये सही है।

मैंने फ़ैसला किया है कि जब भी किसी सवाल का जवाब मेरे पास नहीं होगा, तो उसे तलाशने के लिए मैं कनिंघम के सिद्धांत का इस्तेमाल करूंगा। मैं किसी सवाल का ग़लत जवाब सोचूंगा और कॉलम लिखूंगा। तब, शायद, बहुत से लोग मुझे सही जवाब ख़ुद ही बता देंगे। तो क्या ये पेज कनिंघम के सिद्धांत का इस्तेमाल करने की कोशिश है? ये तो आपको तय करना होगा। अगर मैंने ही आपको बता दिया तो इसका असर ख़त्म हो जाएगा, क्यों?

पिछले कुछ सप्ताह से, नए-नवेले इक्विटी निवेशकों की क्लास-जो अब काफ़ी बड़ी हो गई है-एक मुश्किल वक़्त से गुज़र रही है। मार्केट ने उनकी कड़ी रैगिंग करने का फ़ैसला कर लिया है। मगर फ़्रेशर होने के नाते-यानि, ऐसे लोग जो इस क्लास में पिछले दो साल के दौरान भर्ती हुए हैं-उन्हें काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है। और हां, उन्होंने ऐसी कहानियां सुन रखी थीं कि कभी-न-कभी ये होने जा रहा है, मगर कहानियों की बात कुछ और ही होती है और ख़ुद किसी अनुभव से गुज़रना बिलकुल ही अलग बात है।

निवेश की असल दुनिया जब नए निवेशकों को निवेश के सख़्त पाठ पढ़ाती है, तो उसमें स्टॉक्स के इंडैक्स बेमानी हो जाते हैं। इससे पहले कि आप निवेशक बनें, आपका क़रीब-क़रीब सारा ज्ञान, यहां-वहां से मिली हेडलाइन्स के जोड़-तोड़ से बना होता है। और ये सब इंडैक्स से अभिभूत होता है। हेडलाइन की पसंद के विषय हैं - सेंसेक्स और निफ़्टी जैसे लार्ज-कैप इंडैक्स। यही वजह है कि जो निवेश नहीं करते, वो ये मान लेते हैं कि ये नंबर बेहद अहम हैं और एक निवेशक का अच्छा और बुरा दिन इन्हीं नंबरों पर निर्भर करता है, यानि सेंसेक्स और निफ़्टी के नीचे गिरने या ऊपर उठने पर।

मगर फिर वो निवेश की शुरुआत करते हैं और पाते हैं, कि कहानी कुछ और ही है। सिवा उन थोड़े से लोगों के जो इंडैक्स आधारित पैसिव फ़ंड या डेरेवेटिव के ज़रिए निवेश करते हैं। सच तो ये है कि निवेशक के लिए एक ही बात महत्वपूर्ण है, और वो है आपके स्टॉक। अब पिछले हफ़्ते की 14 फ़रवरी को जो कुछ हुआ उसे ही लें। सेंसेक्स 3 प्रतिशत यानि 1,748 प्वाईंट्स क्रैश कर गया, एक ही दिन में होने वाली ये बड़ी गिरावट थी। फिर अगले ही दिन, 15 तारीख़ को, ये रिकवर कर के क़रीब-क़रीब फिर से उसी प्वाइंट पर वापस आ गया जहां से नीचे गया था। मगर इस ख़बर की हेडलाइन में कहानी बस यहीं ख़त्म हो चुकी थी। एक दिन में 1,748 प्वाईंट्स गिरा, अगले दिन 1,737 प्वाइंट वापस उठा।

मगर, हरेक स्टॉक की कहानी पर नज़र डालेंगे तो ये बहुत अलग नज़र आएगी। आप भारत के सबसे बड़े 200 स्टॉक्स देखिए, तो पाएंगे कि उनमें से क़रीब 140 वापस उसी स्तर पर नहीं पहुंच पाए। उनमें से आधे तो एक प्रतिशत से ज़्यादा नीचे ही रह गए, जब इस तथाकथित एक दिन के क्रैश की 'रिकवरी' हुई। और इस सैंपल के एक चौथाई स्टॉक तो तीन प्रतिशत के नीचे ही रहे, जब ये एक दिन की रिकवरी ख़त्म हुई। अजीब ये है कि निवेश की क्लास के ये फ़्रैशर, इंडैक्स के ऊपर जाने में तब भी इत्मिनान महसूस करते हैं जब उनके अपने स्टॉक नीचे की ओर जा रहे होते हैं। मैंने सुना है कि वो मान

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