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इंटरनेशनल डिपार्चर पर रोक!

उम्मीद है आरबीआई और सेबी इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट के नए निवेश पर लगी रोक हटा लेगी

उम्मीद है आरबीआई और सेबी इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट के नए निवेश पर लगी रोक हटा लेगी

मैं काफ़ी समय से मानता रहा हूं कि ऐसे फ़ंड्स जो सभी निवेशकों के काम के हैं, उनमें से इंटरनेशनल फ़ंड्स ही सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ किए जाते हैं। हाल ही में जब इन फ़ंड्स के नए निवेश पर रोक लग गई तो, मैं सोच में पड़ गया कि शायद अब इन फ़ंड्स के लिए ये बात सही नहीं रह गई है। इसके बावजूद कि पहले भी इनमें निवेश का अच्छा-ख़ासा ट्रेंड रहा है, और होना भी चाहिए, आजकल निवेशकों की दिलचस्पी इन फ़ंड्स में पहले से काफ़ी ज़्यादा हो गई है। हालांकि सबके साथ ऐसा नहीं है, पर इंटरनेशनल इन्वेस्टिंग के बारे में जानने वाले लोग इसमें काफ़ी एक्टिव हैं।

जहां तक इंटरनेशनल इन्वेस्टिंग पर लगी रोक का सवाल है, तो इसका कारण निवेश की वो लिमिट है, जिसके भीतर ही भारत के सारे इंटरनेशनल फ़ंड्स विदेश में निवेश कर सकते हैं। विदेश में निवेश की मौजूदा सीमा, 7 बिलियन यूएस डॉलर है और सभी भारतीय फ़ंड्स द्वारा निवेश की गई कुल रक़म, इसके काफ़ी क़रीब पहुंच गई है। इसी का नतीजा है कि फ़रवरी की शुरुआत में म्यूचुअल फ़ंड्स की रेग्युलेटरी संस्था, असोसिएशन ऑफ़ म्यूचुअल फ़ंड्स इन इंडिया (AMFI) ने सभी फ़ंड हाऊस के नए निवेश रोक लगा दी है। अब ख़बर है कि रिज़र्व बैंक और सेबी निवेश की इस सीमा को शायद, 25 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं।

मुझे कहना ही होगा कि ये लिमिट काफ़ी हद तक 1970 के दौर का एहसास कराती है। मैं समझता हूं, असल में भारत में कैपिटल का फ़्री फ़्लो नहीं है, पर लाखों भारतीय म्यूचुअल फ़ंड निवेशक कुल 7 बिलियन डॉलर का निवेश भी भारत के बाहर नहीं कर सकते? अगर इस आंकड़े को उसी स्तर पर देखें, जिस स्तर का निवेश भारत की सरहद के पार से होता है तब आपको लगेगा कि ये रक़म बहुत छोटी है। इसके अलावा, ये आउटफ़्लो कोई आउटफ़्लो भी नहीं है। दूसरे जितने भी तरीक़ों से धन देश से बाहर जाता है, उनमें से म्यूचुअल फ़ंड निवेश सबसे ज़्यादा सुरक्षित तरीक़ों में से है, और इसमें निवेश के रिटर्न की गारंटी भी है। यही नहीं, ये भी क़रीब-क़रीब पक्का है कि ये रिटर्न फ़ायदेमंद ही रहेंगे! म्यूचुअल फ़ंड निवेश अंत में रिडीम होते ही हैं, और तक़रीबन हर केस में, उससे ऊंची वैल्यू पर रिडीम किए जाते हैं जिसपर निवेश किया जाता है। तो इंटरनेशनल इन्वेस्टिंग, एक आउट-फ़्लो के बजाए, सही मायनों में निवेश है क्योंकि-ये मुनाफ़े के साथ वापस आता है।

पर ये पॉलिसी स्तर का मसला है। एक निवेशक के स्तर पर, उसके म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो में विदेशी निवेश डाईवर्सिफ़िकेशन का महत्वपूर्ण ज़रिया हैं। अपना कुछ निवेश इन फ़ंड्स में रखना, हर इक्विटी निवेशक के लिए एक रुटीन बात है। इन्टरनेशनल डाईवर्सिफ़िकेशन का फ़ायदा तब और भी बढ़ जाता है जब रुपए के अवमूल्यन से एक्सेचेंज रेट का फ़ायदा भी लगातार मिलता है और विदेशी फ़ंड्स का ये फ़ायदा सबकी समझ में आता है।

और हां, म्यूचुअल फ़ंड की ज़्यादातर कैटेगरी की तरह, इनका चुनाव करना भी ज़रा मुश्किल है। जहां भारतीय कंपनियों के इंटरनेशनल फ़ंड काफ़ी ज़्यादा हैं-क़रीब 65-वहीं इनमें से कुछ ही डाईवर्सिफ़ाईड फ़ंड हैं, जो बड़े बिज़नस में निवेश करते हैं। इनमें आधे से ज़्यादा तो एग्ज़ॉटिक फ़ंड्स हैं जिनकी कोई-न-कोई रीजनल या इंड्स्ट्री की थीम है। एक औसत भारतीय निवेशक जिसे अपने निवेश का कुछ ही हिस्सा ग्लोबल डाईवर्सिफ़िकेशन में लगाना है, उसके लिए ऐसे फ़ंड ज़्यादा मायने नहीं रखते। इससे कहीं बेहतर होगा, अगर ग्लोबल स्तर के डाईवर्सिफ़िकेशन वाला या यूएस का कोई ऐसा फ़ंड तलाशा जाए, जो दुनिया की बड़ी इंडस्ट्रियों और बिज़नस में निवेश करता हो। इससे भी ज़्यादा बड़ी बात है कि यूएस के कम ख़र्च और कम रिसर्च वाले पैसिव फ़ंड कहीं ज़्यादा सही होंगे। अगर आप वैल्यू रिसर्च ऑनलाईन के ‘इक्विटी: इंटरनेशनल फ़ंड्स’ के सेक्शन पर जाते हैं, तो आपको सारे डेटा के साथ इंटरनेशनल फ़ंड्स की लिस्ट मिल जाएगी। इसकी शुरुआत आप यूएस के कई तरह के फ़ंड के रिटर्न और थीम देखने से कर सकते हैं जिनमें बड़े इंडैक्स हैं, जैसे - S&P500, NASDAQ 100 और FANG+ जैसे कॉन्सेप्ट।

आप चाहे कुछ भी चुनें, या किसी एकदम नए फ़ंड का वर्कलोड शामिल कर दें, निवेशक, इंटरनेशनल फ़ंड्स को नज़रअंदाज़ नहीं करेंगे और निवेशकों को इन्टरनेशनल फ़ंड्स को नज़रअंदाज़ करना भी नहीं चाहिए। एक दशक से भी पहले का एक वक़्त था, जब भारतीय मार्केट इंटरनेशनल मार्केट से हमेशा बेहतर होते थे, तब आप इन्टरनेशनल इन्वेस्टिंग के ख़िलाफ़ तर्क दे सकते थे। अब, वो वक़्त गुज़र चुका है। आरबीआई और दूसरे रेग्युलेटरों को अपने हिस्से का काम करना चाहिए और बजाए इस तरह की रोक लगाने के, विदेश में निवेश की इस सीमा को ख़ुद ही बढ़ा देना चाहिए, क्योंकि ऐसी रोक, निवेशकों को डराने का ही काम करती हैं।

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