इंटरव्यू

‘ख़रीदने का सही वक़्त तब है, जब आपके पास पैसा हो’

रामदेव अग्रवाल, मोतीलाल ओसवाल फ़ाईनेंशियल सर्विसेज़ के चेयरमैन और सह-संस्थापक हैं। निवेश की बारीक़ियों और बाज़ार की मौजूदा स्थिति के अपने अनुभवों को लेकर उन्होंने हमसे बात की। यहां, उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश पेश हैं।

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स्टॉक मार्केट में रामदेव अग्रवाल का दशकों लंबा अनुभव है। उनकी जानकारियों और नज़रिए का फ़ायदा उन सभी को हो सकता है, जो स्टॉक मार्केट की अपनी समझ, और बेहतर करना चाहते हैं। हमने रामदेव अग्रवाल से जानना चाहा कि एक निवेशक के तौर पर उनकी समझ किस तरह विकसित हुई, उनके निवेश का तरीक़ा किस तरह का है, और वो लोग कौन हैं, जिनका अनुसरण रामदेव अग्रवाव ख़ुद करते हैं। इसके अलावा हमने उनसे ये भी पूछा कि उनकी नज़र में निवेश के सबसे बड़े पाठ क्या हैं और दूसरे निवेशकों को वो क्या सुझाव देंना चाहेंगे। रामदेव अग्रवाल की स्टॉक इन्वेस्टिंग की गहरी समझ देख कर हम तो मानते हैं कि आप अगर उनकी बातों पर ग़ौर करेंगे तो उनके सुझाव औऱ बातें आपके निवेश के बुनियादी सिद्धांत साबित हो सकते हैं।

कृपया हमारे पाठकों को बताएं कि अब तक की आपकी निवेश यात्रा कैसी रही है और आप अपनी दिलचस्पी इसमें कैसे बनाए रखते है?
मैंने अपनी चार्टेर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई 1983 में पूरी की। शुरू से ही मुझे पढ़ने में गहरी दिलचस्पी रही है, शुरुआत अख़बार से हुई, फिर पत्रिकाएं, और उसके बाद कहानियां पढ़ने लगा। मैंने 80 के दशक में हाई-फ़ाईनांस पर फिक्शन पढ़ना शुरू किया। मैं कई बड़ी कंपनियों का ऑडिट का काम भी किया करता था जिससे इस क्षेत्र की मेरी जानकारी बढ़ी और मुझमें अपने ख़ुद के बिज़नस को लेकर उत्साह जागा। जब मैं पास आउट हुआ तो मेरे पास अपनी कोई जमा पूंजी नहीं थी। इसलिए, मैंने दो साल तक इक्विटी रिसर्च करते हुए बिताए और यही मेरे शेयर बाज़ार में आने की सीढ़ी बन गया। मुझे लगा कि सिर्फ़ एक ही टॉपिक पर काम करने से मुझे फ़ायदा नहीं होगा, इसलिए मैंने सब-ब्रोकर के तौर पर काम करने का फ़ैसला किया। बहुत से लोग मेरे संपर्क में थे और मैं बाजार के बारे में बहुत कुछ जनता भी था। मगर क्योंकि मेरे पास धन की कमी थी, इसलिए मुझे एक ऐसा बिज़नेस मॉडल खोजना पड़ा, जहां पूंजी की ज़रूरत न हो। और ये शर्त भी थी कि इसे एक विक्रेता का बाज़ार होना चाहिए, यानि जिसमें मेरी सेवाओं की ज़रूरत हो। इसलिए, भले ही कोई मुझे जानता न हो, पर लोगों को मेरी मदद की ज़रूरत हो। उस समय, हम बाजार में में मौजूद कुछ पेशेवर चार्टेड अकाउंटेंटे में से थे। बाज़ैर में बहुत से अजीब चलन थे, इससे निपटने के लिए हम एक पेशेवर सेटअप लेकर आए। हमने लोगों के साथ अपनी रिसर्च साझा करनी शुरू की और उन्हें 24 घंटे सेवाएं देने लगे, तो इस तरह हमने अपना काम शुरू किया। हमें अपनी जड़ें जमाने में कुछ 4-5 साल लग गए।

मोतीलाल ओसवाल (मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के अध्यक्ष और एमडी) और मैं, ब्रोकरेज की एवज में स्टॉक लेते थे। इसलिए, जो ब्रोकरेज का धन हमें मिलता था, हम उससे स्टॉक ख़रीद लेते थे। असल में, हमने कॉर्पस बनाने के लिए ही ब्रोकिंग का काम किया। इस तरह हमने, 90 के दशक में 10-15 लाख रुपये का पोर्टफ़ोलियो बना लिया। इसका इस्तेमाल हमने स्टॉक-एक्सचेंज की सदस्यता पाने लिए किया। तो, 1990 में हमने फिर, शून्य से शुरुआत की। सदस्यता लेने के बाद, हर्षद मेहता बुल-रन हुआ। 19 महीनों में सूचकांक 600-700 से बढ़कर 4,200 पर पहुंच गया। मुझे लगता है कि ऐसा दुनिया में कहीं भी, किसी भी बाज़ार के इतिहास में पहली बार - दो साल से भी कम वक़्त में ऐसा हुआ। इस उछाल ने निश्चित रूप से हमें ब्रोकरेज तो दिया लेकिन सबसे बड़ा फ़ायदा ये हुआ कि मेरा पोर्टफ़ोलियो 0 से 30 करोड़ रुपये का हो गया। इसके बाद बाज़ार में 60-70 फीसदी की गिरावट आ गई और मेरा पोर्टफोलियो भी इतना ही गिर गया। इसके बाद अर्थव्यवस्था के खुलने का दौर आया। बाज़ार भी बढ़ने लगा। उस समय किताबें और मैगजीन नहीं हुआ करती थीं। अख़बार बहुत पतले होते थे। साल में एक बार रिजल्ट आता था। बैलेंस-शीट 18 महीने बाद आती थी। पेपर और फ़ाईल के आधार पर सारा बिज़नस हुआ करता था, इसलिए ख़रीद-बिक्री भी बहुत बार बेमेल होती थी। 1995 तक मेरे पोर्टफ़ोलियो में 225 शेयर थे।

फिर 1994 में NSE ट्रेडिंग शुरू हुई और वहां आप वही बेच सकते थे जो आप बेचना चाहते थे। तब मैंने बफ़ेट के बारे में सुना, उनकी रिपोर्ट पढ़ी और महसूस किया कि अब तक मैं जंगल में भटक रहा था, कुछ भी नहीं जानता - बिल्कुल दिशाहीन। हालाँकि मैं बहुत भावुक और आत्मविश्वासी था और मुझे बैलेंस शीट पढ़ने का तकनीकी ज्ञान था, लेकिन जो कुछ ग़ायब था, वही वास्तविक ज्ञान था। जब मैंने बफ़ेट की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ी, तो मैंने महसूस किया कि हमें निवेश के बारे में सिलसिलेवार सोच रखने की जरूरत है। इसके बाद मैंने उनके सारे वार्षिक पत्र और रिपोर्टें पढ़ीं। फिर उदारीकरण के बाद निवेश पर किताबें भी आना शुरु हो गईं। मैंने पीटर लिंच, बेंजामिन ग्राहम जैसे लोगों को पढ़ा। इनसे मैंने काफ़ी कुछ सीखा। उसी दौर में हमने वैल्थ-क्रिएशन की स्टडी के बारे में लिखना शुरु किया जो अब तक जारी है। वैल्थ-क्रिएसन का ये अध्ययन, शेयर बाज़ार के बारे में और ज़्यादा गहराई से जानकारी बढ़ाने की दिशा में मेरा क़दम बन गया। मैंने बफ़ेट को सुनने के लिए हर साल अमेरिका जाना शुरू कर दिया। ये सब करने के दौरान मैंने वॉल स्ट्रीट के प्रबंधकों से मिलता रहा और इसी तरह से हम लगातार सीखते रहे।
मैंने 1997 से IT कंपनियों से जुड़ना शुरू कर दिया। हमने इन्फ़ोसेस, NIIT, मास्टेक जैसी नामी कंपनियों से बहुत सारा पैसा बनाया। अब हमारे पोर्टफ़ोलियो में 80% कंपनियां IT की हो गई थीं। और फिर वो समय भी आया जब डॉटकॉम बबल फट गया।


2002-03 का वक़्त हमारी कंपनी के लिए बेहद ख़राब रहा। उस समय हम सोच में पड़ गए कि अब हमें क्या करना चाहिए। फिर हमने लोगों के धन को मैनेज करना शुरु करने का फ़ैसला किया और PMS सर्विस की शुरुआत की। मगर सबसे बुरे वक़्त में ही बेस्ट बुल रन शुरु हुआ। उस समय पूरे बाज़ार का P/B एक सा ही था, रिलायंस 7 के P/E 7 पर उपलब्ध था। 2003 जैसा बाज़ार मैंने कभी नहीं देखा। उस समय का बाज़ार, दिमाग़ हिला देने वाला बाज़ार था। हमने जो भी कमाया, हम वो लगातार बाज़ार में लगाते जा रहे थे। और एक बार फिर ग्लोबल फ़ाईनेंशियल क्राईसिस की वजह से बाज़ार एक और बार धाराशायी हो गया। और-तो-और एक बार फिर, 2020 में कोविड महामारी के कारण बाज़ार ख़राब हालात से गुज़र रहा था।

मैंने निवेश को लेकर अपना फ़लसफ़ा बनाया है:
· ख़रीदने का सही वक़्त तब है, जब आपके पास पैसा हो। जब भी आपके पास पैसा हो, बस वही स्टॉक ख़रीदते रहिये जो आपको सबसे अच्छे लगते हैं।
· बेचने का सबसे अच्छा समय वो होता है, जब भी आपको पैसों की ज़रूरत हो।
· हम बाज़ार में कभी अंदाज़ा नहीं लगाते। जब हमने बफ़ेट के बारे में सुना भी नहीं था तब भी कभी बाज़ार को टाईम नहीं किया। पहले दिन से ही हमने कभी बाज़ार को लेकर अटकलें नहीं लगाईं।
· हम बाज़ार से तेज़ी से पैसे बनाने में कभी नहीं पड़े। पोर्टफ़ोलियो के स्तर पर बाज़ार से जल्दी पैसा बनाने का कोई तरीक़ा नहीं है। ये ज़रूर हो सकता है कि वो 10x या 20x हो जाए, पर वो हमारे पोर्टफ़ोलियो का एक छोटा सा हिस्सा ही रहेगा।
· जब आपके निवेश में कोई बात बन नहीं रही हो या आपको कोई बेहतर आईडिया आ जाए तो आपको अपने स्टॉक बेच देने चाहिए। इस तरह आप अपना पोर्टफ़ोलियो को बदल सकते हैं, पर आपको बाज़ार से बाहर नहीं होना चाहिए। बाज़ार में आपकी हिस्सेदारी हमेशा रहनी चाहिए और ये बढ़ती भी रहनी चाहिए।

मौजूदा समय के हिसाब से आप बाजार के ओवरइवैलुएशन को ले कर क्या कहेंगे? क्या आप पोर्टफ़ोलियो को ध्यान में रखते हुए निवेश के कुछ हिस्से को कैश में रखने का सुझाव देंगे?
नहीं ये काम नहीं करेगा, क्योंकि जब तक आप को पता चलेगा, बाज़ार अपना काम कर चुका होगा। बाज़ार ओवरवैल्यूड हो सकता है, पर जो आप के पास है, हो सकता है वो अंडरवैल्यूड हो। ओवर या अंडर वैल्युएशन का पता लगाना बहुत ही मुश्किल काम है। अगर मैं अपनी बात करूं, तो अपने 40 साल के जीवन में, मैंने सेंसेक्स को 100 से 62,000 तक पहुंचते हुए देखा है। इस वक़्त बाज़ार के मुताबिक़ अच्छी हवा है। आप बज़ार से लड़ नहीं सकते। इसका कोई फ़ायदा नहीं होगा। आप मार्केट का अनुमान नहीं लगा सकते।

ये इंटरव्यू 2022 में लिया गया था।

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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