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इंडेक्स फ़ंड कैसे चुनें?

Index Fund निवेशकों को काफ़ी लुभा रहे हैं. निवेश से पहले इनके बारे में सब कुछ समझने के लिए पढ़ें.

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इंडेक्स फ़ंड एक ऐसा निवेश है जो मार्केट इंडेक्स को ट्रैक करता है. पिछले कुछ समय से किसी इंडेक्स की नकल करने वाले पैसिव फ़ंड्स निवेशकों के रडार पर रहे हैं. आजकल ये आकर्षक विकल्प बन गए हैं, ख़ासकर लार्ज-कैप के लिए, क्योंकि एक्टिव तौर से मैनेज किए जाने वाले फ़ंड, बेंचमार्क से बेहतर रिटर्न देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

हालांकि किसी के पास इंडेक्स ट्रैक करने के लिए इंडेक्स फ़ंड या एक्सचेंज ट्रेडेड फ़ंड (ETF) में निवेश करने का विकल्प होता है, लेकिन इंडेक्स फ़ंड के ज़रिए निवेश करना ज़्यादा आसान हो सकता है. ETF में निवेश करने के लिए आपके पास एक डीमैट और एक ट्रेडिंग अकाउंट होना चाहिए. ये किसी भी दूसरे इक्विटी शेयर की तरह स्टॉक एक्सचेंज पर क़ारोबार करते हैं.

वहीं दूसरी ओर, कोई भी शख्स इंडेक्स फ़ंड में ठीक उसी तरह निवेश कर सकता है, जैसे म्यूचुअल फ़ंड में निवेश किया जाता है. SIP के ज़रिए हर महीने ऑटोमैटिक तरीक़े से निवेश करना संभव है. और डीमैट या ट्रेडिंग अकाउंट होना भी ज़रूरी नहीं है. इंडेक्स फ़ंड चुनते समय दो बातों का ख़ास ध्यान रखना चाहिए.

एक्सपेंस रेशियो - जितना कम, उतना बेहतर: इंडेक्स फ़ंड को मैनेज करने में फ़ंड मैनेजर का कोई ख़ास रोल नहीं होता, और वो इंडेक्स की कंपोज़िशन को दोहराता है. यही वजह है कि पैसिव तरीक़े से मैनेज किए जाने वाले फ़ंड्स का एक्सपेंस रेशियो (ख़र्च का अनुपात) आमतौर पर एक्टिव तरीक़े से मैनेज किए जाने वाले फ़ंड्स की तुलना में कम होता है. क्योंकि एक ही इंडेक्स को ट्रैक करने वाले सभी इंडेक्स फ़ंड्स का पोर्टफ़ोलियो एक जैसा ही होगा, इसलिए उनकी लागत या ख़र्च से निवेशक के मुनाफ़े में अंतर आ जाता है. लागत का सीधा असर फ़ंड से मिलने वाले रिटर्न पर पड़ता है. एक ही इंडेक्स को ट्रैक करने वाले किसी फ़ंड की दूसरे इंडेक्स फ़ंड की तुलना में कम एक्सपेंस रेशियो (ख़र्च) होने की वजह से ज़्यादा रिटर्न (फ़ायदा) मिलने की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए आपको सबसे कम एक्सपेंस रेशियो वाला इंडेक्स फ़ंड तलाशना चाहिए.

ट्रैकिंग एरर - जितना कम, उतना बेहतर: ट्रैकिंग एरर तब होता है जब फ़ंड इंडेक्स की गतिविधियों से मेल नहीं खाते. मान लीजिए, एक ओपन-एंड फ़ंड निफ़्टी को ट्रैक करता है, और ये 90 पॉइंट तक बढ़ जाता है, जबकि निफ़्टी ख़ुद 1 फ़ीसदी ही ऊपर गया है. इस अंतर का नतीजा होगा, ट्रैकिंग एरर. दूसरे शब्दों में, ये माप है कि फ़ंड कितने बेहतर तरीक़े से इंडेक्स की परफ़ॉर्मेंस को ट्रैक करता है या दोहराता है. चूंकि इंडेक्स फ़ंड का काम ही इंडेक्स को ट्रैक करना है, इसलिए इनके बीच अंतर जितना कम होगा उतना बेहतर होगा.

ETF का चुनाव करने के लिए ऊपर बताई गई बातों के अलावा ये चेक करना ज़रूरी है कि लिक्विडिटी, नेट एसेट वैल्यू (NAV) और एक्सचेंज पर ट्रैडिंग की क़ीमत के बीच का क्या अंतर है. चूंकि, ETF स्टॉक एक्सचेंज पर ट्रेड करता है, इसलिए ये जिस क़ीमत पर उपलब्ध है, वो फ़ंड के नेट एसेट वैल्यू (NAV) से कम (छूट पर) या ज़्यादा (प्रीमियम पर) हो सकती है. निवेशक को इसे लेकर जागरुक रहना चाहिए. जब तक आप बड़ी रक़म इन्वेस्ट करने का प्लान नहीं करते, तब तक फ़ंड हाउस से सीधे ETF यूनिट ख़रीदना मुमकिन नहीं होता है.

दूसरा पॉइंट है लिक्विडिटी, यानी ETF स्टॉक एक्सचेंज पर कितनी बार ट्रेड करता है. कम ट्रेडिंग वैल्यू वाला ETF, आपके निवेश को बेचने के समय एक रुकावट खड़ी कर सकता है.

ये भी पढ़ें: सही ETF कैसे चुनें?

ये लेख पहली बार मार्च 05, 2024 को पब्लिश हुआ.

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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