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पुराने पब्लिक सेक्टर जैसा है न्‍यू टेक

अयोग्य, लंबे समय से घाटे में चलने वाली और जिन्हें लगातार फ़ंड की ज़रूरत हो, ये सारी बातें आपको क्या याद दिलाती हैं?

अयोग्य, लंबे समय से घाटे में चलने वाली और जिन्हें लगातार फ़ंड की ज़रूरत हो, ये सारी बातें आपको क्या याद दिलाती हैं?

मेरी ये रेकमेंडेशन छः साल देर से है। फिर भी, अगर आप समझना चाहें कि दुनिया भर में डिसरप्शन खड़ा करने या अचानक बड़े फेरबदल लाने वाले, न्यू डिजिटल बिज़नस में क्या चल रहा है, तो आपको एक क़िताब पढ़नी चाहिए जिसका नाम है ‘डिसरप्टेड: माय मिसएडवेंचर इन द स्टार्टअप बबल' (Disrupted: My misadventure in the startup bubble).
ये बोर करने वाली बिज़नस की आम क़िताबों जैसी नहीं, बल्कि एक मज़ेदार और दिलचस्प अनुभवों वाली क़िताब है, जो इसी तरह की एक कंपनी के भीतर की बातें बयान करती है। इसे जिस शख़्स ने लिखा है उनका नाम डैनियल लियोन है, जिन्होंने, 50 की उम्र में एक न्यूज़-नेटवर्क में पत्रकार का अपना कैरियर बदल कर, हबस्पॉट नाम की कंपनी में, कंपनी का ब्लॉग मैनेज करने का काम शुरू किया। ये बॉस्टन, यूएसए की एक इनबाउंड मार्केटिंग कंपनी थी। हबस्पॉट एक सोलह-साल-पुरानी कंपनी है, जिसका रेवेन्यू एक बिलियन डॉलर से ज़्यादा है पर इस कंपनी ने कभी मुनाफ़ा नहीं कमाया है। ये एक लिस्टिड कंपनी है, जिसने इसके फ़ाउंडर और फ़ंड करने वालों को बेहद अमीर बना दिया है।
लियोन की क़िताब का एक-तिहाई हिस्सा काफ़ी हंसाने वाला है। इसका विषय है, अतिरेक की हद तक ख़ुद में डूबे और सिलिकॉन वैली की टेक संस्कृति की सनक। हालांकि, अब हम उस मुक़ाम पर हैं जहां सिलिकॉन वैली में हर जगह हास्यास्पद स्थितियों की कोई कमी नज़र नहीं आती। ग़ौर करने वाली बात है कि लियोन ने इसी हास्यास्पद संस्कृति को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है। 2006 से लेकर 2010 तक उन्होंने एक पैरोडी ब्लॉग लिखा ‘सीक्रेट डायरी ऑफ़ स्टीव जॉब्स’ (Secret diary of Steve Jobs) और बाद में वो HBO की सीरीज़, सिलिकॉन वैली के, को-प्रड्यूसर और लेखक रहे।
हालांकि, ये डिसरप्‍शन इससे कहीं आगे जाता है। लियोन इस बात को साफ़ करते हैं कि बुनियादी तौर पर इसमें कुछ भी नया नहीं है जिसे तथाकथित ‘टेक’ कंपनियों की नस्ल अंजाम दे रही है। ये काफ़ी जानी-पहचानी धोखाधड़ी है, जिसको फ़ाउंडर और फ़ंड करने वाले, दोनों ने बड़ा हाथ मारने के लिए गढ़ा है, और इस सब में, इनमें काम करने वाले आम लोगों की ज़िंदगियां और निवेशकों के पैसे बर्बाद हो रहे हैं। कृपया नोट करें कि मैं फ़ंड करने वालों और निवेशकों के बीच फ़र्क़ कर रहा हूं-लिस्टिड कंपनियों के लिए किया गया ये फ़र्क़ काफ़ी अहम है, जैसा अभी हाल ही में हमें भारत में पता चला है।
टेक की दुनिया में, सिर्फ़ कुछ ही बिज़नस हैं जो गूगल या अमेज़न की तरह सफल हैं, पर बड़ी संख्या ऐसे बिज़नस की है जो उबर या वी-वर्क या इन जैसी दर्जनों कंपनियों जैसे हैं। इन्होंने कभी पैसा नहीं बनाया है और शायद कभी बनाएंगे भी नहीं। भारत में भी ऐसी कई कंपनियां हैं। इस तरह की कंपनियां, फ़्री मार्केट इकोनॉमी की वेल्थ और असल इकोनॉमिक ग्रोथ को गहरी चोट पहुंचा रही हैं। ये सुनने में अजीब लग सकता है, पर कृपया इसे समझने के लिए थोड़ी देर मेरे साथ बने रहें।
ऐसा क्यों है कि मार्केट इकोनॉमी ज़्यादा वेल्थ बना पाती है और इसमें ज़्यादा ग्रोथ होती है, बजाए एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था के? कारण है फ़ेलियर। असल में, मार्केट इकॉनोमी का सबसे बड़ा फ़ायदा अच्छे बिज़नस का सफल होना नहीं, ख़राब बिज़नस का फ़ेल होना है। जो बिज़नस पैसा नहीं बना सकते, वो जल्द ही बंद हो जाते हैं, जिससे अच्छे बिज़नस के लिए हर तरह के रिसोर्स फ़्री हो जाते हैं।
अब इस तथाकथित टेक सेक्टर की बात करते हैं, जिसका पूरा इकोसिस्टम बिल्कुल विपरीत दिशा में काम करता है। जो बिज़नस चलाए ही नहीं जा सकते उनमें कैपिटल आता रहता है। ऐसा होते हुए न सिर्फ़ महीने और बरस, बल्कि दशक होने को आए हैं। ये हर तरह से कर्मचारियों, प्रतिद्वंदियों और ग्राहकों, सभी के लिए विसंगति पैदा करता है। पूरी दुनिया में (जिसमें बहुत हद तक भारत भी है), पुरानी टैक्सी सर्विस को उबर, लिफ़्ट और इसी तरह की दूसरी सर्विस ने डिसरप्‍ट किया है। अब, ये कंपनियां दाम बढ़ा रही हैं, मगर फिर भी पैसा नहीं बना पा रहीं। और इस सब में उन्होंने कस्टमर और ड्राइवर और साथ ही पुरानी टैक्सी सर्विस को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। हाल ही के महीनों में, तत्काल सामान डिलिवर करने वाली सर्विस शुरू हुई है, और छोटी किराने और सब्ज़ी की दुकानों पर प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। क्या हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ये सब किधर जाएगा? बात काफ़ी साफ़ है।
असल में, ये नया टेक सेक्टर काफ़ी हद तक भारत के पुराने पब्लिक सेक्टर की तरह लगता है। बिना किसी मुनाफ़े या दक्षता के पैसा लगातार आता रहता है, और अंत में, यही आर्थिक संकट बन जाता है। कई मायनों में, इसमें कुछ तर्क तब तक था, जब तक पैसा, विदेशी वेंचर कैपिटलिस्ट और दूसरे निवेशकों का था। मगर, जब से ये धोखाधड़ी भारत के इक्विटी मार्केट में शिफ़्ट हो गई है, संभावित शिकारों की लंबी होती इस लिस्ट में एक नई क्लास जुड़ गई है और वो है-भारतीय रिटेल इनवेस्टर।

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