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क्या आपको रेगुलर म्यूचुअल फ़ंड से डायरेक्ट में स्विच करना चाहिए?

रेगुलर से डायरेक्ट म्यूचुअल फ़ंड प्लान में जाने से पहले इन बातों पर ज़रूर विचार करें

रेगुलर से डायरेक्ट म्यूचुअल फ़ंड प्लान में जाने से पहले इन बातों पर ज़रूर विचार करें

सारांशः क्या आपने अपने म्यूचुअल फ़ंड के रेगुलर प्लान में निवेश किया हुआ है और अब डायरेक्ट प्लान में स्विच करना चाहते हैं? ऐसा करने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, यहां बताया गया है.

मेरी कुछ म्यूचुअल फ़ंड्स के रेगुलर प्लान में SIP चल रही है. चूंकि डायरेक्ट प्लान ज़्यादा रिटर्न देते हैं, तो क्या मुझे रेगुलर प्लान बंद करके उसकी जगह डायरेक्ट प्लान में निवेश शुरू कर देना चाहिए? – शैलेंद्र पाठक

रेगुलर प्लान और डायरेक्ट प्लान, ये हर म्यूचुअल फ़ंड स्कीम के दो वेरिएंट होते हैं.

डायरेक्ट प्लान के उलट, रेगुलर म्यूचुअल फ़ंड वो प्लान होता है जिसमें कोई निवेशक किसी बिचौलिए के ज़रिये म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करता है. डिस्ट्रीब्यूटर या ब्रोकर जैसे बिचौलिये म्यूचुअल फ़ंड निवेश की पूरी प्रक्रिया में मदद करते हैं, लेन-देन के समय काग़ज़ी काम संभालते हैं और एक्सपर्ट गाइडेंस भी देते हैं, साथ ही और भी कई तरह की सहायता मिलती है.

डायरेक्ट प्लान में ऐसी किसी भी तरह की मदद नहीं मिलती, क्योंकि इसमें निवेशक सीधे AMC या फ़ंड हाउस से म्यूचुअल फ़ंड ख़रीदता है. हालांकि डायरेक्ट प्लान में ख़र्च कम होता है, इसलिए ये रेगुलर प्लान के मुक़ाबले ज़्यादा रिटर्न देते हैं, लेकिन निवेशकों को इन्हें तभी चुनना चाहिए जब उन्हें अलग-अलग म्यूचुअल फ़ंड स्कीम की अच्छी समझ हो और किसी तरह की मदद की ज़रूरत न हो.

लेकिन रुकिए, बात यहीं ख़त्म नहीं होती.

अगर आप अब भी रेगुलर प्लान से डायरेक्ट प्लान में स्विच करने की सोच रहे हैं, तो तीन और अहम बातें हैं, जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है.

ये भी पढ़ेंः SIP से जुड़े सात मिथक जो नुक़सान कर सकते हैं

#1 लॉक-इन पीरियड

रेगुलर प्लान का लॉक-इन पीरियड ख़त्म होने के बाद ही आप उसे डायरेक्ट प्लान में स्विच कर सकते हैं. इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम ELSS में तीन साल का अनिवार्य लॉक-इन होता है. लॉक-इन पीरियड के दौरान, एक ही स्कीम के रेगुलर प्लान से डायरेक्ट प्लान में स्विच नहीं किया जा सकता. इसी तरह, रिटायरमेंट या बच्चों से जुड़ी स्कीम जैसी कुछ सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स में पांच साल तक का लॉक-इन हो सकता है, जिसमें स्विच या रिडेमम्शन संभव नहीं होता.

SIP के ज़रिये किए गए निवेश में भी सावधानी ज़रूरी है. हर SIP किस्त का लॉक-इन पीरियड अलग-अलग तारीख़ से गिना जाता है. उदाहरण के लिए, सितंबर 2019 में किसी ELSS फ़ंड में किया गया SIP निवेश, जिसका लॉक-इन तीन साल का है, सितंबर 2022 में लॉक-इन से बाहर होगा. यानी हर SIP किस्त को अलग-अलग तीन साल पूरे करने होते हैं. जब आप डायरेक्ट प्लान में स्विच करते हैं, तो नए निवेश पर लॉक-इन पीरियड फिर से शुरू हो जाता है.

#2 एग्ज़िट लोड

ज़्यादातर इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड स्कीम समय से पहले पैसा निकालने पर एग्ज़िट लोड लगाती हैं. एग्ज़िट लोड आम तौर पर NAV का एक तय प्रतिशत होता है, जो रिडेम्शन के समय काट लिया जाता है. आमतौर पर ये तब लगता है जब इक्विटी फ़ंड से एक साल के भीतर पैसा निकाला जाए.

अगर आपने रेगुलर प्लान में SIP के ज़रिये निवेश किया है, तो हर मासिक किस्त के लिए एग्ज़िट लोड की अवधि अलग-अलग गिनी जाती है. साथ ही, जब आप डायरेक्ट प्लान में स्विच करते हैं, तो इसे नया निवेश माना जाता है और एग्ज़िट लोड की नई अवधि उसी तारीख़ से शुरू होती है. इसलिए ये ज़रूर देख लें कि स्विच करने पर एग्ज़िट लोड न लगे.

#3 टैक्सेशन

रेगुलर प्लान से डायरेक्ट प्लान में स्विच करने पर, टैक्स के लिहाज़ से इसे पहले मौजूदा रेगुलर स्कीम से रिडेम्प्शन और फिर नई डायरेक्ट स्कीम में नया निवेश माना जाता है. इसलिए रेगुलर म्यूचुअल फ़ंड स्कीम की यूनिट बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स लगेगा.

डायरेक्ट प्लान में किए गए नए निवेश की तरह ही, कैपिटल गेन के लिए होल्डिंग पीरियड, लॉक-इन और एग्ज़िट लोड की कैलकुलेशन भी डायरेक्ट प्लान में निवेश की तारीख़ से ही शुरू होगी. अनावश्यक टैक्स बोझ से बचने के लिए इन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है.

ये भी पढ़ेंः डायरेक्‍ट vs रेग्‍युलर म्‍यूचुअल फ़ंड: क्या बेहतर है?

ये लेख पहली बार दिसंबर 30, 2025 को पब्लिश हुआ.

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