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बैलेंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड: रेग्‍युलर इनकम के लिए ये फ़ंड सही हैं?

आमतौर पर, जब मार्केट पर दबाव होता है, तो ये फ़ंड ज़्यादा रक़म इक्विटी में लगाते हैं और डेट में इनका निवेश कम रहता है

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नरेश गुप्‍ता सुपर सीनियर सिटीजन हैं और दिल्‍ली में रहते हैं. उनको कोई पेंशन नहीं मिलती. हाल ही में उन्‍होंने अपने ख़र्च के लिए फ़िक्‍स्ड डिपॉज़िट से पैसे निकाले हैं. हालांकि उनको नियमित इनकम की ज़रूरत है, और उन्‍होंने सवाल पूछा है कि क्या इसके लिए उनको बैलेंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड में निवेश करना चाहिए?

क्‍या हैं बैलेंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड?

  • बैलेंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड को डायनमिक एसेट ऐलोकेशन फ़ंड भी कहते हैं. ये हाइब्रिड फ़ंड हैं, जो इक्विटी और डेट इंस्‍ट्रूमेंट दोनों में निवेश करते हैं. आमतौर पर, जब मार्केट दबाव में होता है, तो ये फ़ंड ज़्यादा रक़म इक्विटी में लगाते हैं और डेट में इनका निवेश कम रहता है. और जब मार्केट में हालात बेहतर होते हैं, तो ये अपना ज़्यादा पैसा डेट में निवेश करते हैं और इक्विटी में कम लगाते हैं.
  • फ़ंड हाउस दावा करते हैं कि इस डायनमिक ऐलोकेशन से इनको, मार्केट के उतार-चढ़ाव के दौरान तेज़ी का फ़ायदा उठाने में, और गिरावट को कम करने में मदद मिलती है.
  • हालांकि, बैलेंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड रिस्‍क रिवार्ड प्रोफ़ाइल के लिहाज़ से एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं. कुछ फ़ंड काफ़ी कंजरवेटिव हैं, यानी कम रिस्‍क वाले हैं वहीं दूसरे फ़ंड ज़्यादा रिस्‍क लेने वाले हैं.

नरेश गुप्‍ता के लिए इसके मायने क्या हैं?

  • ये फ़ंड, रिस्‍क प्रोफ़ाइल के लिहाज़ से एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं. ऐसे में नरेश गुप्‍ता को सही बैलैंस्‍ड-एडवांटेज फ़ंड चुनते हुए सतर्क रहना चाहिए.
  • रेग्‍युलर इनकम पोर्टफ़ोलियो के लिए नरेश गुप्‍ता ऐसा बैलेंस्‍ड-एडवांटेज फ़ंड चुन सकते हैं जहां इक्विटी ऐलोकेशन 40-50% की रेंज में हो. और उन्हें किसी एसेट पर बड़ा दांव भी नहीं लगाना चाहिए.
  • मिसाल के तौर पर, अगर बैलेंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड इक्विटी को लेकर आक्रामक हो जाता है, और मार्केट में तेज़ गिरावट आती है, तो रेग्‍युलर इनकम हासिल करने में मुश्किल हो सकती है. इसी तरह से इक्विटी में बहुत कम, यानी 15-20% निवेश करने वाला बैलैंस्‍ड एडवांटेज फ़ंड रेग्‍युलर इनकम की ज़रूरत पूरी करने लायक़ रिटर्न शायद ही दे पाए.

ये भी पढ़िए- रिटायरमेंट के लिए चाहिए कितनी रकम?

धनक ऐसे म्‍यूचुअल फ़ंड्स पर भरोसा नहीं करता, जो मार्केट को टाइम करते हैं यानी मार्केट का अंदाज़ा लगा कर, मौक़े के फ़ायदा उठाने में जुटे रहते हैं. हमारा मानना है कि आपकी रिस्‍क लेने की क्षमता के आधार पर स्‍टैटिक इक्विटी - डेट ऐलोकेशन, (जैसे-75:25, 50:50, 25:75) लंबे समय में काफ़ी अच्‍छा काम करता है. ये मार्केट किस तरफ़ जाएगा, इसका अंदाज़ा लगा कर पहले क़दम उठाने की गुंजाइश को ख़त्‍म कर देता है. डायनेमिक एसेट ऐलोकेशन वाले फ़ंड के मामले में भी हम ऐसे फ़ंड को ज़्यादा पसंद करेंगे जो किसी भी एसेट पर आक्रामक हो कर दांव न लगाए. जब फ़ंड आक्रामक नहीं होते हैं, ज़्यादा चांस नहीं लेते हैं, तो फ़ंड के रिटर्न का अंदाज़ा लगाना आसान हो जाता है.

एक विकल्‍प और है

नरेश गुप्‍ता नीचे दिए गए एक और विकल्प पर अमल कर सकते हैं?

  • किसी भी समय कम-से-कम एक तिहाई पैसा इक्विटी में निवेश करें. महंगाई को मात देने लायक़ रिटर्न के लिए अच्‍छे फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड या लार्ज कैप-फ़ंड में निवेश करना बेहतर रहेगा.
  • बाक़ी दो-तिहाई रक़म फ़िक्‍स्ड इनकम एवेन्‍यू में निवेश करें, जैसे - सरकार की गारंटी रिटर्न वाले स्‍कीमें, जैसे - सीनियर सिटिज़न सेविंग्‍स स्‍क़ीम (SCSS). इसके अलावा इमरजेंसी के लिए कुछ पैसा अच्‍छी क्वालिटी वाले शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड में ऐलोकेट करें.
  • हर साल पोर्टफ़ोलियो री-बैलेंस करें, और सालाना कुल कॉर्पस का 5-6% से ज़्यादा पैसा न निकालें.

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ये लेख पहली बार मई 01, 2023 को पब्लिश हुआ.

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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