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FDs vs Short-Duration Funds: निवेश के लिए क्या है बेहतर?

क्या रिटर्न के मामले में ये दोनों निवेश एक जैसे हैं, जानिए यहां?

क्या रिटर्न के मामले में ये दोनों निवेश एक जैसे हैं, जानिए यहां?

फ़िक्स्ड डिपॉज़िट (FD) अपनी आकर्षक ब्याज़ दरों की वजह से तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे हैं. इसी बीच, डेट फ़ंड्स पर इंडेक्सेशन का फ़ायदा भी खत्म हो गया है. अब ये सवाल उठते हैं: क्या FDs और डेट फ़ंड्स (debt funds), ख़ासतौर पर शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड, परफ़ॉरमेंस के मामले में एक जैसे ही हो गए हैं? आपके इनमें से कौन सा निवेश के लिए बेहतर है? आइए जानते हैं.

क्या इंडेक्सेशन बेनिफ़िट ख़त्म होने से FDs को फ़ायदा हुआ है?

डेट फ़ंड्स पर इंडेक्सेशन का फ़ायदा ख़त्म होना मायूसी भरा है, ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि अब शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स और FDs के बीच टैक्स के बाद के रिटर्न का फ़र्क काफ़ी कम हो गया है. हालांकि, ये फ़ंड अब भी FDs से बेहतर रिटर्न दे रहे हैं.

हमने जानने की कोशिश की, कि क्या होता अगर इंडेक्सेशन नाम की कोई चीज़ ही नहीं होती और FDs और शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स पर एक जैसा ही टैक्स लगता. इसके लिए, हमने शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड्स के तीन साल के औसत (मीडियन) रिटर्न का एनालिसिस किया, और फिर इसकी तुलना तीन साल वाली FD (SBI) के रिटर्न से की.

हमने पाया कि पिछले 12 साल में, शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स के रेगुलर प्लान और डायरेक्ट प्लान ने FDs के इन्हीं प्लान की तुलना में क्रमशः 61% और 76% मामलों में बेहतर रिटर्न दिया.

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यील्ड-टू-मैच्योरिटी (YTM) की तुलना

यील्ड-टू-मैच्योरिटी (YTM) का मतलब है किसी बॉन्ड को मैच्योरिटी तक अपने पास रखने पर मिलने वाला रिटर्न. YTM से डेट फ़ंड पर मिलने वाले रिटर्न के बारे में भी पता चलता है.

शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स ने (अक्तूबर 2023 तक) 7.69 % कैटेगरी एवरेज YTM दिया है, जो तीन साल वाली FDs के, क़रीब 7-7.25 % रिटर्न से ज़्यादा है. एक्सपेंसेस को लेकर फ़ैक्टरिंग करने पर (एक्सपेंस रेशियो) शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स द्वारा दिया गया कैटेगरी एवरेज रिटर्न थोड़ा कम (7.35 %) हो जाता है.

फ़ंड हाउस आने वाले वक़्त में रेट में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं (माना जा रहा है कि ब्याज़ दरें, वैश्विक स्तर पर और भारत में भी, अपने चरम पर हैं), और इस वज़ह से शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स बेहतर रिटर्न दे सकते हैं. जब ब्याज़ दरें कम होती हैं, तो बॉन्ड की क़ीमतें भी बढ़ती हैं, और शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड्स ज़्यादा आकर्षक हो जाते हैं.

सोचने वाली कुछ और बातें

  • FDs में रिटर्न की गारंटी होती है, पर वे कम लिक्विड होती हैं और मैच्योरिटी से पहले पैसे निकालने पर पेनल्टी लगती है. इसके उलट, शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स से पैसे निकालने पर कोई एग्ज़िट लोड नहीं होता और लिक्विडिटी भी रहती है.
  • इंडेक्सेशन का फ़ायदा ख़त्म होने के बावजूद भी, डेट फ़ंड्स से होने वाले फ़ायदे पर तभी टैक्स लगता है जब आप फ़ंड बेचते हैं. जबकि FD से मिलने वाले ब्याज़ पर हर साल टैक्स लगता है.
  • FD में ब्याज़ दर पहले से तय होती है. लेकिन शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड्स, उतार-चढ़ाव भरी ब्याज़ दर के माहौल में अच्छा प्रदर्शन करते हैं. फ़ंड मैनेजर पोर्टफ़ोलियो को मार्केट के हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं, और भविष्य में ब्याज़ दर में कटौती की उम्मीद के चलते, लॉन्ग-टर्म बांड्स में निवेश बरक़रार रख सकते हैं. इससे ज़्यादा रिटर्न मिलने की संभावना बनी रहती है.

हमारा नज़रिया

भले ही इंडेक्सेशन का फ़ायदा ख़त्म हो गया हो, पर डेट फ़ंड अभी भी कोर फ़िक्स्ड-इनकम पोर्टफ़ोलियो के लिए एक बढ़िया विकल्प हैं. ब्याज़ दरें गिरने पर ज़्यादा रिटर्न की उम्मीद की जा सकती है.

जो लोग रिस्क नहीं लेना चाहते हैं, उनके लिए FD ही बेहतर विकल्प हैं. वहीं दूसरी ओर, जिन्हें थोड़े उतार-चढ़ाव से फ़र्क नहीं पड़ता, वे लोग छोटी अवधि के डेट फ़ंड्स में निवेश कर सकते हैं.

छोटी अवधि के डेट फ़ंड्स में सबसे बेहतर विकल्प जानने के लिए यहां क्लिक करें.

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