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तनाव लेना ज़रूरी है?

आपने सुना होगा म्यूचुअल फ़ंड्स 'स्ट्रेस टेस्ट' से गुज़र रहे हैं. क्या इसे लेकर आपको तनाव होना चाहिए?

आपने सुना होगा म्यूचुअल फ़ंड्स 'स्ट्रेस टेस्ट' से गुज़र रहे हैं. क्या इसे लेकर आपको तनाव होना चाहिए?Anand Kumar

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6:08

पिछले कुछ दिनों में, कई म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों ने 'स्ट्रेस टेस्ट' (stress test) के नतीजे सार्वजनिक किए. मार्केट और म्यूचुअल फ़ंड रेग्युलेटर सेबी ने उन्हें अपने स्मॉल और मिड-कैप फ़ंड्स के लिए ये नतीजे देने को कहा था. इसके चलते, बिज़नस पेपर में कुछ ऐसी हेडलाइनें बनने लगीं, "फ़ंला-फ़ंला फ़ंड के 50% पोर्टफ़ोलियो लिक्विडेशन के लिए 6 दिन की ज़रूरत". स्ट्रेस टेस्ट का नतीजा तो सार्वजनिक हुआ, मगर इसे किए जाने का तरीक़ा सार्वजनिक नहीं है. दरअसल, इसे ये बताने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि कोई फ़ंड कितने दिनों में अपने पोर्टफ़ोलियो का 25 प्रतिशत और 50 प्रतिशत बेच सकता है.

जिस किसी को भी पता है कि इक्विटी मार्केट कैसे काम करता है, वो इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे. दरअसल, अगर कोई स्ट्रेस टेस्ट कहता है कि कोई फ़ंड छह दिनों में अपना आधा पोर्टफ़ोलियो बेच सकता है, तो इसका मतलब ये नहीं कि ऐसा हो जाएगा. इसका सीधा सा मतलब है कि अगर आप कुछ बातों को मान (assume) लेते हैं, और एक एक्सेल स्प्रेडशीट बनाते हैं, तो उसके जवाब में नंबर छह आता है. इसका मतलब बस इतना ही है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं. ये कोई भविष्यवाणी नहीं है कि असल में क्या होगा.

ऐसा कहने से मेरा मतलब उन लोगों की आलोचना करना नहीं है जो इस टेस्ट को डिज़ाइन करने और लागू करने में शामिल हैं - क्योंकि कमोबेश ये तो उनका काम है. हालांकि, असली सवाल ये है कि निवेशकों को स्ट्रेस टेस्ट के नतीजों के साथ क्या करना चाहिए. जैसा कि मीडिया में आया है, "रेग्युलेटर की ओर से MFI द्वारा आयोजित इस स्ट्रेस टेस्ट का मक़सद, म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों को मार्केट के उतार-चढ़ाव से जुड़े रिस्क और उनके इक्विटी पोर्टफ़ोलियो की लिक्विडिटी पर इसके असर के बारे में शिक्षित करना है. ये जानकारी सक्षम बनाती है. निवेशकों को अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार अपने निवेश को री-बैलेंस करने और री-एलोकेट करने के बारे में समझ-बूझ कर फ़ैसला लेना चाहिए."

निवेशकों को जो असली कार्रवाई करनी चाहिए, उसके संदर्भ में इस बात का क्या मतलब है कि 'अपने निवेश को रीबैलेंस करने और री-एलोकेट करने के बारे में समझ-बूझ कर फ़ैसला लेना चाहिए'? क्या इसका मतलब ये है कि मैंने जिस फ़ंड में निवेश किया है, उसे 25 प्रतिशत बेचने में 20 दिन लगेंगे जबकि दूसरे को आठ दिन लगेंगे. तो क्या मुझे अपना पैसा पहले वाले से दूसरे में ट्रांसफ़र कर देना चाहिए? क्या होगा अगर 20 दिन वाले का ट्रैक रिकॉर्ड आठ दिन वाले से कहीं बेहतर हो? इसे लेकर निवेशक क्या करे? इसके आधार पर निवेशकों को किस तरह से 'समझ-बूझ कर फ़ैसला' लेना चाहिए? ज़्यादातर निवेशकों को इस बात का कुछ पता नहीं होगा. असल में तो स्ट्रेस टेस्ट का ये नतीजा, निवेशकों के फ़ैसलों में किसी वास्तविक योगदान के बिना, चिंता और तनाव का नया कारण जोड़ रहा है.

मैं कुछ बताऊंगा जो निवेशकों को इसे समझने में मदद कर सकता है.

सबसे पहले, स्ट्रेस टेस्ट का ये नतीजा मूल रूप से फ़ंड के साइज़ के लिए एक प्रॉक्सी है. यानी, ये बात किसी फ़ंड की स्मॉल या मिड-कैप होल्डिंग की रक़म (प्रतिशत नहीं) के बारे में है. ये रॉकेट साइंस नहीं है - ये अपने-आप ही स्पष्ट होना चाहिए कि ₹2,000 करोड़ का स्मॉल-कैप बेचने की तुलना में ₹10,000 करोड़ बेचने में बहुत ज़्यादा वक़्त लगेगा. जब मैं स्मॉल और मिड-कैप होल्डिंग और स्ट्रेस टेस्ट के नतीजों के बीच संबंध दिखाने वाला एक चार्ट तैयार करता हूं, तो मुझे एक बहुत साफ़ लाइन देखने को मिलती है. एक-दो विसंगतियां ज़रूर हैं, लेकिन ध्यान देने लायक़ कुछ भी नहीं है. इसलिए, अगर कोई निवेशक मार्गदर्शन के लिए इस एक्सपेरिमेंट के तर्क पर विचार कर रहा है, तो उसे 'बड़े फ़ंड्स से बचना' होगा. साइज़ में सबसे छोटे फ़ंड सबसे अच्छे दिखेंगे, और सबसे बड़े फ़ंड सबसे ख़राब. मुझे नहीं लगता कि फ़ंड चुनने का ये तरीक़ा समझदारी भरा होगा.

दूसरा, ये टेस्ट, अच्छे समय में छोटे शेयरों की लिक्विडिटी को देखने और मार्केट क्रैश के दौरान लिक्विडिटी क्या होगी इसका नतीजा निकालने की कोशिश कर रहा है. इसे लेकर कम-से-कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये एक समस्या है. सभी अनुभवी मार्केट एक्सपर्ट जानते हैं कि ये असल में एक उल्टे क़िस्म का इंडिकेटर (contrarian indicator) हो सकता है; यानी, जितने ज़्यादा लिक्विड स्मॉल स्टॉक होंगे, फ़ंड उतने ही ख़राब होंगे. हैरान हो गए? इसका कारण ये है कि मौजूदा समय में, प्रमोटर और दूसरे लोग, आम तौर पर अच्छी कंपनियों का दामन थाम रहे हैं. साथ ही, फ़िक्सर और ऑपरेटर, वॉल्यूम बढ़ाने और ख़राब स्टॉक में हेराफेरी करने में व्यस्त हैं. मुझे यक़ीन है आप समझ गए होंगे कि अगर मार्केट क्रैश हो गया तो क्या होगा.

वैसे भी, इस तरह के स्ट्रेस टेस्ट आजकल ग्लोबल फ़ाइनांस के सभी हिस्सों में आम हैं. जहां तक असली म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों की बात है, उनका इसे लेकर तनाव लेने और ध्यान देने का कोई फ़ायदा नहीं है.

ये भी पढ़िए: मिड-कैप और स्मॉल-कैप फ़ंड के कैसे रहे स्ट्रेस टेस्ट के नतीजे

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