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डेट बनाम इक्विटी

हमें एक ऐसी सीधी स्ट्रैटेजी चाहिए जो हमें मार्केट की टाइमिंग का अंदाज़ा लगाने पर मजबूर न करे. और, एसेट एलोकेशन और रिबैलेंसिंग की ये आज़माई हुई तकनीक यही काम करती है.

हमें एक ऐसी सीधी स्ट्रैटेजी चाहिए जो हमें मार्केट की टाइमिंग का अंदाज़ा लगाने पर मजबूर न करे. और, एसेट एलोकेशन और रिबैलेंसिंग की ये आज़माई हुई तकनीक यही काम करती है.Aditya Roy/AI-Generated Image

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कई साल पुरानी बात है, जब सबप्राइम संकट (subprime crisis) से ठीक पहले, लोगों को शेयर बाज़ार में अचानक गिरावट का डर सता रहा था. क्रैश की आशंका मंडरा रही थी और इस पर दो तरह की सोच सामने आई.

पहली सोच यह थी कि हालात जल्द पलटेंगे और बाज़ार फिर चढ़ाई पर निकल पड़ेगा. इस सोच के निवेशक बड़ी बेचैनी से यह पता लगाने में जुटे रहते हैं कि ऐसे वक़्त में कौन-सा सेक्टर या कंपनी आगे का रास्ता दिखाएगी. दरअसल, वे अगले रियल एस्टेट जैसे मौके की तलाश में होते हैं. दूसरी सोच उन लोगों की है जो मान चुके हैं कि इक्विटी के साथ खेलने का वक़्त गुज़र गया और अब फ़िक्स्ड इनकम के साथ टिककर बैठने का समय आ गया है. जब मैंने यह देखा था, उस दौर में फ़िक्स्ड डिपॉज़िट्स का आकर्षण ख़ासा बढ़ा हुआ था. जब शेयर डांवाडोल दिख रहे थे, तब एक साल में महंगाई (inflation) के बराबर या उससे भी ज़्यादा का रिस्क-फ़्री रिटर्न बड़ा लुभावना लगता था. अचानक बैंक डिपॉज़िट्स और फ़िक्स्ड इनकम म्यूचुअल फ़ंड जैसे फ़िक्स्ड इनकम के विकल्पों में निवेश ही सही फ़ैसला लगने लगा था.

अब एक बार फिर, मौजूदा संकट और बाज़ार की उठापटक के बीच, यही सवाल चर्चा में है. हां, कुछ और इंस्ट्रूमेंट और कमोडिटीज़ भी अब इस बातचीत का हिस्सा हैं, लेकिन बुनियादी सवाल वही है. तो क्या इसका जवाब बदला है, जबकि यह सवाल क़रीब 18 साल पुराना है? यह जवाब अब वोट डालने की उम्र का हो गया है. सच कहें तो, ज़्यादा कुछ नहीं बदला.

ज़रा सोचिए. इक्विटी के चढ़ने पर उसमें भागकर घुसना और इक्विटी के गिरने पर डेट में भागकर जाना, यह तरीक़ा साफ़ तौर पर काम नहीं करता. कौन कह सकता है कि जैसे ही आपने पैसा फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में डाला, शेयर बाज़ार उछल नहीं जाएगा और वह रिटर्न तथा उससे भी ज़्यादा नहीं दे देगा? और फिर जैसे ही आप भागकर FD तुड़वाएंगे और पैसा वापस शेयरों में लगाएंगे, वे फिर गिर जाएंगे और आप उसी थकाने वाले चक्कर में फंसते जाएंगे.

साफ़ है कि ऐसे वक़्त में हमें एक सीधी स्ट्रैटेजी चाहिए जो हमें मार्केट की टाइमिंग का अंदाज़ा लगाने की ज़रूरत न पड़ने दे. और, एसेट एलोकेशन और रिबैलेंसिंग की ये आज़माई हुई टेक्निक्स यही काम करती हैं. इस पहेली का असली हल बस यही है कि अपने कुल पोर्टफ़ोलियो का एक तय हिस्सा डेट के लिए तय कर लें और चाहे शेयर बाज़ार कितनी भी शानदार उड़ान भर रहा हो, उस प्रतिशत को बनाए रखें.

हर साल एक बार देखें कि यह प्रतिशत कहीं बदल तो नहीं गया, और जो हिस्सा बढ़ गया हो, उसमें से पैसा दूसरी तरफ़ शिफ़्ट कर दें. इससे अपने आप यह सुनिश्चित होगा कि जब भी बाज़ार पलटें, तो एक अच्छा-ख़ासा मुनाफ़ा पहले ही बुक हो चुका हो.

लेकिन यह तो वह काम है जो पहले करना था, और बेशक भविष्य में भी करना होगा. उस वक़्त ज़्यादातर लोगों की परेशानी यह थी कि एसेट एलोकेशन शुरू करें या नहीं. और जवाब वही है जो किसी भी समय होता, चाहे बाज़ार की हालत कुछ भी हो. शेयर बाज़ार में सिर्फ़ वही पैसा लगाएं जिसकी आपको कम से कम तीन साल तक ज़रूरत न हो, बाक़ी सब फ़िक्स्ड इनकम  में रखें. फिर भी लोग आख़िरी वक़्त में जल्दबाजी में एसेट एलोकेशन की कोशिश करते हैं.

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