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बाज़ार का समझ से परे होना

अनिश्चितता को स्वीकार करना आपकी सबसे अच्छी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटजी हो सकती है

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येल यूनिवर्सिटी के एक लेक्चर में, मशहूर फिज़िसिस्ट राममूर्ति शंकर ने छात्रों से एक बेहद ईमानदार बात कही - "कोई भी क्वांटम मैकेनिक्स को नहीं समझता." ये रिचर्ड फ़ेनमैन की बात दोहरा रहे थे, जो ख़ुद इस फ़ील्ड के बड़े नाम थे. फिर शंकर ने जोड़ा - "इस वक़्त मैं अकेला हूं जिसे क्वांटम मकैनिक्स समझ नहीं आती, लेकिन एक हफ़्ते में तुम सब भी मेरी तरह हो जाओगे - और फिर जाकर अपने-अपने शहरों में अज्ञानता फैलाना." इस बात को आप यहां सुन सकते हैं.

एक शानदार फ़िज़िसिस्ट की इस बात में गहरी समझ छिपी है - और निवेश की दुनिया पर भी ये बात उतनी ही लागू होती है. क्योंकि जैसे क्वांटम दुनिया उलझी और बेमेल है, वैसी ही चालबाज़, उथल-पुथल भरी और तर्क से परे हैं फ़ाइनेंशियल मार्केट.

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फ़ाइनेंस के न्यूज़ चैनलों पर स्क्रॉल करें, और आपको अनगिनत एक्सपर्ट मिलेंगे जो - बाज़ार की हर हरकत की व्याख्या बड़ी ही निश्चितता से करते दिखेंगे. चाहे बॉर्डर पर तनाव हो या चुनावी नतीजे - हर बात की बाज़ार में "पहले से उम्मीद थी" वाली व्याख्या झट से मिल जाती है. लेकिन थोड़ी देर बाद वही एक्सपर्ट कुछ नया डेटा आने पर अपनी ही बात पलटते नज़र आते हैं.

क्या हो अगर हम निवेश को उसी बौद्धिक ईमानदारी के साथ अपनाएं जैसे प्रोफ़ेसर शंकर क्वांटम फ़िज़िक्स को अपनाते हैं? क्या हो अगर हम स्वीकार करें कि बाज़ार लगातार एडजस्ट होने वाला एक जटिल सिस्टम है जिसपर लाखों लोगों की अधूरी जानकारी, निवेश की अलग समय सीमाओं और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का असर पड़ता है.

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आइए पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को एक तरफ़ रख दें, भले ही मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि घटनाएं एक ब्लैक स्वान थीं. पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी हमला और भारत की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सबसे अच्छी स्थिति में एक हल्का ग्रे स्वान है - ये हमेशा कार्ड पर होता है.

सोचिए कि फ़ाइनेंस इंडस्ट्री की सबसे भरोसेमंद भविष्यवाणियां कितनी बार ग़लत साबित होती हैं. उस समय को याद करें जब कहा जा रहा था कि महामारी के दौर में देखे गए कुछ कंज़्यूमर बिहेवियर स्थायी हो जाएंगे, लेकिन फिर तेज़ी से उनका वापस उलटना भी देखने को मिला. ये केवल कुछ बड़ी भविष्यवाणियों के ग़लत होने की बात नहीं है- ये जटिल सिस्टम का अनुमान लगाने की बुनियादी चुनौती की बात है. फिर भी इन्वेस्टमेंट इंडस्ट्री निश्चितता बेचता ही रहता है. फ़ंड मैनेजर बेहतर स्टॉक के चुनाव से अच्छे प्रदर्शन का वादा करते हैं. टेक्निकल एनेलिस्ट ऐसे पैटर्न तलाशते हैं जो कथित तौर पर आने वाले समय में क़ीमतों की भविष्यवाणी करते हैं. आर्थिक पूर्वानुमान लगाने वाले ग्रोथ रेट का दशमलव की सटीकता से अंदाज़ा लगाते हैं. और आम निवेशकों से इस पूरे नज़ारे को आत्मविश्वास के साथ नेविगेट करने की उम्मीद की जाती है.

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एक ज़्यादा ईमानदार नज़रिया ये होगा कि हम बाज़ार की हरकतों की लगातार भविष्यवाणी करने की हमारी कमज़ोरी स्वीकार करें. लगातार कुछ न कुछ करके बाज़ार को मात देने की रणनीति अपनाने के बजाय, हम स्थायी सिद्धांतों पर ध्यान लगाएं जैसे कि सही में अलग तरह की एसेट क्लास में डाइवर्सिफ़िकेशन करें, ग़ैर-ज़रूरी लागतों को कम करें, अपने जोखिम सहने की क्षमता को समझें और उन सेक्टरों पर ध्यान देने से बचें जिन्हें हम नहीं समझते हैं.

इतिहास के कुछ सबसे सफल निवेशकों ने पूरी विनम्रता के साथ इस फ़लसफ़े को अपनाया है. वे किसी दूरदृष्टि के चलते नहीं, बल्कि मज़बूत प्रोसेस फ़ॉलो करके, अपनी सीमाओं को समझकर और अगर उन्हें अपनी इच्छा के उलट सबूत दिखे तो उन्हें स्वीकार करके सफल हुए. उन्होंने इस बात को समझा कि स्थायी नुक़सान से बचना, हर संभावित फ़ायदे को पाने से ज़्यादा बड़ी बात है.

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ज़्यादातर निवेशकों के लिए, इन बातों का मायने होगा, एक निवेश की फ़िलॉसफ़ी गढ़ना जो अगली तिमाही की जीडीपी ग्रोथ का सटीक अनुमान लगाने या इस बात की पहचान पर निर्भर नहीं है कि एक दशक बाद कौन सी टेक्नोलॉजी हावी होगी. इसका मतलब है अपना ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाना जो अलग-अलग तरह की आर्थिक परिस्थितियों का सामना कर सकें, बजाय इसके कि सब कुछ एक ही भविष्यवाणी पर दांव लगा दिया जाए.

इसका मतलब फ़ैसले लेने को पूरी तरह से त्याग देना नहीं है. इसका मतलब है एक विनम्रता के साथ उन फ़ैसलों पर पहुंचना. ये समझते हुए फ़ैसले लेना कि आग ग़लत हो सकते हैं. आपका संभावित रिटर्न का अंदाज़ा ग़लत हो सकता है. आप ख़ुद से पूछें: "अगर मेरी थीसिस ग़लत साबित होती है, तो मैं कितना गंवा सकता हूं?" अक्सर, बड़े मुनाफ़े का पीछा करने की तुलना में घातक नुक़सान से बचना ज़्यादा अहम साबित होता है.

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फ़ाइनेंस इंडस्ट्री शायद ही कभी इस तरह की सोच को बढ़ावा देती है क्योंकि अनिश्चित होना उतना बिकाऊ नहीं है. कस्टमर आत्मविश्वास चाहता और सटीक होने की डिमांड करता है, और फ़ाइनेंस मीडिया को अपने दर्शक बनाए रखने के लिए नाटकीय कहानियां और भरोसे लायक़ सलाह की ज़रूरत होती है. लेकिन अनिश्चितता को स्वीकार करने का मतलब अनुशासन या अनालेसिस को त्यागना नहीं है. बल्कि, इसका मतलब है कि किसी एक ही नतीजे की भविष्यवाणी करने के बजाय संभावित नतीजों की सीमा को समझने के लिए उस अनुशासन को कड़ाई से लागू करना.

प्रोफ़ेसर शंकर के छात्रों की तरह क्वांटम मकैनिक्स के बारे में अपनी "अज्ञानता" फैलाते हुए, शायद निवेशकों को बाज़ार की भविष्यवाणियों के बारे में एक स्वस्थ संदेह फैलाने से फ़ायदा होगा. इसका मतलब सभी एक्सपर्ट्स के अनालेसिस को खारिज करना नहीं है, बल्कि इसे सही और प्रासंगिक तरीक़े से समझना है.

इसलिए अगली बार जब कोई व्यक्ति आत्मविश्वास से समझाए कि बाज़ार किसी ख़ास तरीक़े से क्यों व्यवहार करेंगे, तो क्वांटम फ़िज़िक्स के एक्सपर्ट की गहरी बात याद रखें. क्वांटम पार्टिकल की तरह, बाज़ार हमेशा तयशुदा पैटर्न पर नहीं दौड़ते. सबसे बड़ी समझदारी होगी कि बजाय लगातार भविष्यवाणियां करने के हम फ़्लेक्सेबल फ़ाइनेंशियल प्लान बनाएं जो परिस्थितियों के बदलावों को सहन कर सकें. अगर प्रतिभाशाली फ़िज़िसिस्ट अपनी समझ की सीमाओं को स्वीकार कर सकते हैं, तो निवेशकों को भी ऐसा करने के बारे में सोचना चाहिए.

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