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टैक्स देने वाला ही क्यों ठगा जाता है

जब नियमों के अनुसार चलना निवेश में प्रतिस्पर्धा के लिहाज़ से नुक़सान बन जाता है

जब नियमों के अनुसार चलना निवेश में प्रतिस्पर्धा के लिहाज़ से नुक़सान बन जाता हैAI-generated image

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पिछले हफ़्ते मैंने अपने संपादकीय में घरों की बढ़ती क़ीमतों के मुद्दे को उठाया था. ख़ासतौर पर ये समझने की कोशिश की थी कि सालाना 20 लाख रुपये कमाने वाले युवा पेशेवर — जो भारत के टॉप पांच फ़ीसदी आमदनी के वर्ग में आते हैं — वो भी क्यों आज गुरुग्राम जैसे शहरों में एक सामान्य फ़्लैट नहीं ख़रीद सकते.  जब मैंने काग़ज़ों में दर्ज आमदनी और प्रॉपर्टी की क़ीमतों के बीच फ़ासले को देखा तो साफ़ हो गया कि कई ‘अदृश्य ख़रीदार’ अपने काले धन को रियल एस्टेट में लगाकर इन दामों को ग़लत तरीक़े से बढ़ा रहे हैं. यानी असली और ईमानदार घर ख़रीदारों के लिए खेल पहले से बेईमानों के पक्ष में झुका हुआ है.

लोगों की प्रतिक्रियाएं हैरान करने वाली थीं. एक-एक पाठक की कहानी ने ये साफ़ कर दिया कि ये मामला सिर्फ़ प्रॉपर्टी के दामों तक सीमित नहीं है. भारत में एक समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है जहां टैक्स चोरी सिर्फ़ सामान्य नहीं, बल्कि सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है. और, जो टैक्स देता है, वो धीरे-धीरे इस दौड़ से बाहर हो रहा है. ईमानदार टैक्स अदा करने वालों को नुक़सानदेह स्थिति झेलनी पड़ रही है — ख़ासतौर पर जब बात संपत्ति बनाने की हो.

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जो जवाब मेरे पास आए उनके उनमें कुछ इस तरह थे: एक रोड कॉन्ट्रैक्टर ने बड़े आराम से बताया कि सरकारी ठेकों पर 25% कमीशन देना आम बात है और इनकम टैक्स अधिकारी पहले से ही ‘मैनेज्ड’ रहते हैं. एक म्यूचुअल फ़ंड डिस्ट्रीब्यूटर की शिकायत थी कि वो 32% इनकम टैक्स और 18% जीएसटी भरते हैं, जबकि नारियल बेचने वाला हर दिन लाखों के यूपीआई ट्रांज़ैक्शन से कमा रहा है और उस पर कोई टैक्स निगरानी नहीं है. ये कोई इक्का-दुक्का मामले नहीं हैं. ये एक बुनियादी असमानता की ओर इशारा करते हैं जो हमारी आर्थिक व्यवस्था को खोखला कर रहे हैं.

जब आप प्रॉपर्टी, बिज़नस या किसी निवेश के मौक़े के लिए उन लोगों से मुक़ाबला कर रहे हों जिनकी टैक्स दर शून्य है और आपकी कुल टैक्स देनदारी 50% तक पहुंच रही हो - तो समझ लीजिए ये खेल पहले से ही आपके ख़िलाफ़ हो गया है.

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जब सिस्टम की बनावट ही ऐसी हो कि जो लोग टैक्स चुराते हैं उन्हें ज़्यादा निवेश करने का मौक़ा मिले और जो ईमानदार हैं वो पीछे रह जाएं - तो इसे ही आर्थिक भाषा में ‘एडवर्स सेलेक्शन’ कहा जाता है. जिनके पास निवेश करने के लिए सबसे ज़्यादा पैसा है, वे ज़रूरी नहीं कि सबसे ज़्यादा उत्पादक या लायक़ हों - बल्कि अक्सर ये वो लोग होते हैं जो टैक्स चोरी में माहिर होते हैं. इसी दौरान, जिन सैलरी पाने वालों का टैक्स सीधे तनख़्वाह से कटता है, वे ख़ुद को निवेश के उन मौक़ों से बाहर पाते हैं जहां उनका मुक़ाबला बेहिसाब और अघोषित धन जमा करने वालों से होता है.

ये स्थिति सिर्फ़ रियल एस्टेट तक सीमित नहीं है. प्राइवेट इक्विटी, आर्ट मार्केट और पारंपरिक व्यापार में भी कैश का बड़ा रोल है. वो उद्यमी जो हर एक रुपये का हिसाब रखता है, उस शख़्स से पीछे छूट जाता है जिसकी अकाउंटिंग एक समानांतर दुनिया में चलती है.

कई पाठकों ने सुझाव दिए - जैसे कि बड़े मूल्य वाले नोटों को बंद कर देना, या एक ऐसा रियल एस्टेट एक्सचेंज बनाया जाए जहां प्रॉपर्टी के डॉक्यूमेंट डीमैट में हों. ये तकनीकी तौर पर फ़ायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन असली समस्या सिर्फ़ टेक्नोलॉजी नहीं, सांस्कृतिक है. हमने टैक्स चोरी को इतना सामान्य बना दिया है कि एक ईमानदार टैक्स अदा करने वाला अब सिद्धातों वाला इंसान नहीं बल्कि ‘भोला’ व्यक्ति समझा जाता है.

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हमारी संस्कृति में टैक्स चोरी की स्वीकृति ने पूरी अर्थव्यवस्था में उलटी तरह के प्रोत्साहन पैदा कर दिए हैं. जब टैक्स बचाने की जोड़-तोड़ ज़्यादा मुनाफ़ा देता है, तो कोई उत्पादकता बढ़ाने में क्यों निवेश करेगा? जब धन कमाने का आसान रास्ता बिना किसी पारदर्शिता और जुगाड़ से होकर गुज़रता है, तो असली वैल्यू खड़ी करने पर कौन ध्यान देगा? नतीजा ये है कि हमारी अर्थव्यवस्था में जो लोग सबसे ईमानदारी से खेल रहे हैं, वही सबसे ज़्यादा नुकसान में हैं.

ऐसे में निवेशकों के सामने सवाल उठता है — क्या अपनी नैतिकता छोड़ दें ताकि दूसरों की तरह पैसा बना सकें? या फिर उसी नैतिक रास्ते पर चलें और थोड़े फ़ायदे में ही संतोष कर लें? ज़्यादातर पाठकों ने बाद वाला रास्ता चुना — टैक्स भरना और दूसरों को बेईमानी से अमीर होते देखना.

हालांकि, यहां एक गहरा मसला है जिसमें नुक़सान सिर्फ़ टैक्स भरने वालों पर नहीं, उन लोगों का भी है जो इस सिस्टम से फ़ायदा उठा रहे हैं. जब लोग ये भरोसा खो देते हैं कि नियमों के मुताबिक़ चलने से सही नतीजे मिलेंगे, तब पूरा सिस्टम डगमगा जाता है.

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बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट की तरह, बाक़ी क्षेत्रों में भी ऐसा ही होने की उम्मीद है - लेकिन ये तभी मुमकिन है जब राजनीतिक इच्छाशक्ति हो. हर यूपीआई ट्रांज़ैक्शन का डिजिटल रिकॉर्ड होता है, लेकिन फिर भी नारियल वाले लाखों कमा रहे हैं और कोई टैक्स नहीं देते. चोरी पकड़ने की टेक्नोलॉजी तो है, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा.

अब सवाल है कि जब तक ऐसा हो, तब तक ईमानदार टैक्स भरने वाले क्या करें? सबसे पहले तो ये समझें कि लंबे समय में आपका हित सिस्टम के सुधार में ही है - भले ही थोड़े समय में छोटे-मोटे गंवाने पड़ें, मगर जहां भी संभव हो पारदर्शिता को बढ़ावा दें. ऐसे निवेश चुनें जहां कैश की गुंजाइश कम हो - म्यूचुअल फ़ंड, लिस्टिड शेयर और बैंक डिपॉज़िट अभी भी अपेक्षाकृत साफ़-सुथरे विकल्प हैं.

सबसे अहम बात - अपने सिद्धांतों को कभी न छोड़ें. हो सकता है कि मौजूदा सिस्टम टैक्स चोरों को प्रोत्साहन दे रहा हो, लेकिन सिस्टम हमेशा एक जैसा नहीं रहता. टेक्नोलॉजी की दिशा को देखते हुए ये तय है कि पारदर्शिता का समय आएगा ही - और जब वो आएगा, तब वही लोग टिकेंगे जिन्होंने ईमानदारी से दौलत बनाई है, न कि वे जिनकी कमाई सिर्फ़ ढके-छुपे कामों और चालाकियों पर टिकी थी.

सरकार ने जब चाहा है, तभी सबसे जटिल व्यवस्थाओं को भी डिजिटल कर दिया है. तब तक, नियमों का पालन करना भले ही नुक़सान का सौदा लगे - लेकिन यही एक बेहतर और न्यायसंगत भविष्य में किया गया सबसे बड़ा निवेश है. आज आपकी ईमानदारी सिर्फ़ क़ानून मानने की बात ही नहीं है - ये उस अर्थव्यवस्था को गढ़ने की कोशिश है जहां जुगाड़ नहीं, क़ाबिलियत की क़द्र हो; जहां ढके-छुपे लेनदेन को नहीं, बल्कि पारदर्शिता को प्रेत्साहन मिले; और जहां अगली पीढ़ी को ऐसा सिस्टम न मिले जो ईमानदारी की सज़ा देता हो. यही वो मूल्य हैं, जो उस होड़ से कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं जिसमें ईमानदारी को कमज़ोरी मान लिया गया है.

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