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मुनाफ़े में बढ़ोतरी के बावजूद 1% रिटर्न: क्यों मुश्किल में है HUL

जब ग्रोथ कमज़ोरियों को छुपाए, तो इस मेट्रिक पर दें ध्यान

जब ग्रोथ कमज़ोरियों को छुपाए, तो इस मेट्रिक पर दें ध्यानAI-generated image

निवेशक अक्सर बढ़ते मुनाफ़े को हाथोंहाथ लेते हैं और ज़्यादा कमाई का मतलब शेयरहोल्डर्स के लिए बेहतर रिटर्न समझते हैं. लेकिन क्या हो अगर किसी कंपनी का मुनाफ़ा बढ़ रहा हो, फिर भी उसका शेयर प्राइस लगभग स्थिर रहे? दिग्गज FMCG कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) ऐसा ही एक उदाहरण है.

HUL: एक ग्रोथ स्टोरी जिसका फ़ायदा नहीं मिला

पिछले पांच साल के दौरान HUL का मुनाफ़ा सालाना 8.6% की दर से बढ़ा. लेकिन उसी अवधि में इसके शेयर प्राइस में केवल 1.3% की सालाना बढ़ोतरी हुई. समस्या क्या थी? कमजोर दक्षता.

2019 में GSK कंज्यूमर के अधिग्रहण (जो 2021 तक पूरी तरह एकीकृत हुई) के बाद HUL के शेयरहोल्डर फ़ंड या बुक वैल्यू में ₹40,000 करोड़ की भारी बढ़ोतरी हुई. फ़ाइनेंशियल ईयर 21 में शेयरहोल्डर इक्विटी में 480% की ज़बरदस्त उछाल आई, लेकिन सेल्स में केवल 18% की बढ़ोतरी हुई. स्वाभाविक रूप से, मुनाफ़े की ग्रोथ भी इस रफ्तार से नहीं बढ़ी.

इसका नतीजा? इसका रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE), जो फ़ाइनेंशियल ईयर 20–22 में शानदार 43.8% था, फ़ाइनेंशियल ईयर 23–25 में घटकर 20.6% रह गया.

ये कैपिटल एलोकेशन की अक्षमता का एक अनोखा उदाहरण था. अधिग्रहण के बाद उस अनुपात में मुनाफ़े में बढ़ोतरी नहीं हुई और HUL ने एक ऐसी एसेट के लिए ज़्यादा क़ीमत चुकाई, जो अतिरिक्त रिटर्न देने में नाकाम रही.

ROE क्यों उतना ही ज़रूरी है, जितना मुनाफ़ा

ये केस स्टडी ROE (प्रॉफ़िट आफ्टर टैक्स/शेयरहोल्डर्स की इक्विटी) की अहमियत को उजागर करती है. यह मेट्रिक बताता है कि कंपनी शेयरहोल्डर्स के पैसे का कितनी कुशलता से इस्तेमाल करके मुनाफ़ा कमा रही है.

ऊंचे ROE का मतलब है कि कंपनी अपने इक्विटी बेस से ज़्यादा मुनाफ़ा निकाल रही है, जो अच्छे कैपिटल एलोकेशन और बिज़नस के कुशल संचालन का संकेत है. वॉरेन बफ़े इसी वजह से EPS ग्रोथ की तुलना में ROE को ट्रैक करना पसंद करते हैं.

लेकिन अगर किसी कंपनी की मुनाफ़े की तुलना में शेयरहोल्डर इक्विटी तेज़ी से बढ़े, जैसा कि HUL के मामले में हुआ, तो ROE गिर जाता है. इससे संकेत मिलता है कि कंपनी शेयरहोल्डर इक्विटी के हर रुपये पर कम कमाई कर रही है.

बर्जर पेंट्स एक और उदाहरण है कि मुनाफ़े की ग्रोथ ही रिटर्न जनरेट करने के लिए काफ़ी नहीं है.

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बर्जर पेंट्स: दबाव में ग्रोथ

बर्जर पेंट्स ने पिछले पांच सालों में अपने मुनाफ़े को सालाना 12.4% की दर से बढ़ाया. लेकिन शेयरहोल्डर्स को शेयर पर सालाना केवल 4.8% रिटर्न मिला. ऐसा क्यों हुआ?

हाल के वर्षों में, ख़ासकर ग्रासिम के पेंट बिज़नस में उतरने से प्रतिस्पर्धा बढ़ने कारण बर्जर को अपनी स्थिति बचाने के लिए वॉल्यूम बढ़ाने और क़ीमतें कम रखने के लिए मज़बूर होना पड़ा, जिससे मार्जिन में कमी आई. नतीजतन, मुनाफ़ा बुक वैल्यू की बढ़ोतरी के साथ तालमेल नहीं रख सका.

कंपनी का ROE तीन साल के औसत 24.1% (FY20-22) से घटकर 21.4% (FY23-25) रह गया. ये कोई बड़ी गिरावट नहीं है, लेकिन ये क़ीमतों के दबाव से दक्षता पर पड़ने वाले असर को दर्शाता है.

सबक़

HUL और बर्जर पेंट्स दोनों हमें याद दिलाती हैं कि सिर्फ़ ग्रोथ काफ़ी नहीं है. उस ग्रोथ की क्वालिटी भी मायने रखती है. अगर कोई कंपनी इक्विटी बढ़ा रही है, लेकिन निवेश किए गए हर रुपये पर ज़्यादा नहीं कमा रही, तो ROE गिरता है. और, जब ROE गिरता है, तो शेयरहोल्डर्स के रिटर्न भी आमतौर पर कम हो जाते हैं.

इस प्रकार, निवेशक के तौर पर, मुनाफ़े में बढ़ोतरी के आंकड़ों या उत्साहजनक कमेंट्री पर रुकें नहीं. गहराई में जाएं. समय के साथ ROE के रुझानों को ट्रैक करें. अगर कोई कंपनी विस्तार कर रही है, लेकिन शेयरहोल्डर इक्विटी पर प्रति यूनिट कम कमा रही है, तो वो वैल्यू नहीं बना रही, बल्कि उसे कम कर रही है.

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