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सारांशः इक्विटी को कई नए निवेशक जादू की छड़ी मानते हैं. लेकिन वैल्यू रिसर्च के साथ एक बातचीत में PPFAS के CIO राजीव ठक्कर ने इस चर्चित धारणा को तोड़ा कि इक्विटी निवेश से हर साल 15% रिटर्न की गारंटी मिलती है. आइए जानते हैं कि लंबे समय की सफलता के लिए वे क्या ज़रूरी मानते हैं.
नए निवेशकों के बीच एक आम धारणा है: इक्विटी से हर साल 15% रिटर्न मिलना चाहिए. अगर इससे कम मिले, तो निराशा होती है.
पराग पारिख फ़ाइनेंशियल एडवाइजरी सर्विसेज (PPFAS) के CIO राजीव ठक्कर इसे "इक्विटी का भ्रम" कहते हैं और चेतावनी देते हैं कि इससे हकीकत से परे उम्मीदें बनती हैं.
उन्होंने वैल्यू रिसर्च को हाल में दिए एक इंटरव्यू में कहा, "बॉन्ड से 5-6% रिटर्न मिलता है, इसका मतलब ये नहीं कि इक्विटी उसका दोगुना या तिगुना देगी. बाज़ार सिर्फ़ इसलिए रिटर्न नहीं देता कि आपने उसमें पैसा डाला है."
इक्विटी को चाहिए समय
ठक्कर एक और ग़लतफहमी की ओर ध्यान दिलाते हैं कि लोग लंबी अवधि को गलत समझते हैं. उन्होंने कहा, "लोग सोचते हैं कि एक साल से ज्यादा इक्विटी होल्ड करना लंबी अवधि है - शायद इसलिए कि इनकम टैक्स एक्ट में ऐसा माना जाता है. लेकिन निवेश के नज़रिए से, एक साल कुछ भी नहीं है."
इतिहास इसका गवाह है.
ठक्कर याद दिलाते हैं कि मार्च 1992 से मार्च 2003 तक भारतीय शेयर बाज़ार लगभग ठहरा रहा, जो एक ऐसा दशक था जिसमें रिटर्न या तो सपाट रहे या नकारात्मक. इस दौरान सेंसेक्स सालाना 0.44% कमज़ोर हुआ.
ये सिर्फ़ भारत की बात नहीं. अमेरिकी बाजार में 2000 से 2010 तक ऐसी ही सुस्ती रही, और जापान के शेयर बाजार तो दशकों से जूझ रहे हैं. "यहां तक कि चीन ने भी ऐसा दौर देखा है," वे कहते हैं.
तो, अगर आपका निवेश का समय एक या दो साल है और आप 15% सालाना रिटर्न की उम्मीद कर रहे हैं, तो इक्विटी आपको निराश कर सकती है -ख़ासकर तब जब वैल्यूएशन ज़्यादा हो या वैश्विक जोखिम बढ़े हों.
वे कहते हैं, "इक्विटी में ज़्यादा रिटर्न की संभावना है, लेकिन ये लंबे समय में मिलता है और इसमें उतार-चढ़ाव बना रहता है. रास्ता कभी भी आसान नहीं होता."
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बैलेंस है ज़रूरी
ठक्कर मानते हैं कि इक्विटी उन निवेशकों के लिए सबसे अच्छी है, जिन्हें लंबे समय के लिए निवेश करना हो और जो नियमित रूप से निवेश करने के साथ-साथ डटे रहें. लेकिन मध्यम या कम समय के लिए, वे एक बैलेंस्ड पोर्टफ़ोलियो बनाने की सलाह देते हैं जिसमें फ़िक्स्ड-इनकम निवेश भी शामिल हों.
असल में जब शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव होता है और शॉर्ट टर्म में ऐसा ज़रूर होगा, तो पूरा पोर्टफ़ोलियो शेयरों में रखना बिना सीटबेल्ट के रोलर कोस्टर की सवारी जैसा है.
यहीं पर डाइवर्सिफ़िकेशन की भूमिका आती है.
इक्विटी, डेट और यहां तक कि गोल्ड जैसे अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश फैलाकर आप खुद को एक बाज़ार के प्रदर्शन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर होने से बचा सकते हैं. इससे न सिर्फ तनाव कम होता है, बल्कि लंबे समय में रिटर्न की स्थिरता भी बढ़ती है.
इक्विटी को ग्रोथ का इंजन मानें और फ़िक्स्ड इनकम को वो स्टेबलाइजर जो आपकी यात्रा को सहज रखता है. अलग-अलग देखें तो दोनों की अपनी ताकत और कमज़ोरियां हैं. साथ में, ये आपके गोल्स तक पहुंचने का भरोसेमंद रास्ता बनाते हैं.
दरअसल, जब इक्विटी कमज़ोर प्रदर्शन करती है या नेगेटिव रिटर्न देती है, तब अच्छे डेट फ़ंड टिकाऊ आय और मानसिक शांति दे सकते हैं.
इसलिए, डाइवर्सिफ़िकेशन सिर्फ़ जोखिम से बचने वालों के लिए नहीं है. ये उस स्मार्ट निवेशक के लिए है जो जानता है कि वैल्थ बनाना हर साल बाज़ार को मात देने के बारे में नहीं, बल्कि हर तरह के सालों में निवेश बनाए रखने के बारे में है.
आखिरी बात
शेयर बाज़ार कोई लॉटरी मशीन नहीं है. अगर आप इसमें एक या दो साल में 15% रिटर्न की गारंटी की उम्मीद लेकर आ रहे हैं, तो आपको अपनी उम्मीदों या निवेश रणनीति को बदलना होगा.
असल में, कई नए निवेशक बाज़ार में ये सोचकर आते हैं कि इक्विटी लगातार शानदार रिटर्न देगी. जब ये उम्मीदें पूरी नहीं होतीं - या उससे भी बुरा, जब बाज़ार गिरता है - तो वे घबरा जाते हैं. कुछ जल्दबाजी में बाहर निकल जाते हैं, नुक़सान को पक्का कर लेते हैं. कुछ इक्विटी को जुआ कहकर हमेशा के लिए छोड़ देते हैं.
लेकिन असल समस्या नज़रिये में थी.
बिना अस्थिरता को समझे ज़रूरत से ज़्यादा जोखिम लेना अंधेरे में उड़ान भरने जैसा है.
यही कारण है कि डाइवर्सिफ़िकेशन सिर्फ़ एक अच्छी रणनीति नहीं, बल्कि भावनात्मक भरोसा भी है. ये आपको बाज़ार के साइकल्स में निवेश बनाए रखने में मदद करता है और अस्थायी नुक़सान के आधार पर स्थायी फ़ैसले लेने से बचाता है.
अगर आप निवेश में नए हैं और समझ नहीं पा रहे कि डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो कैसे बनाएं, तो एक आसान शुरुआत है: एग्रेसिव हाइब्रिड फ़ंड.
ये फ़ंड 65 से 80% तक इक्विटी में और बाकी फ़िक्स्ड इनकम में निवेश करते हैं. इस तरह, आप शेयरों की ग्रोथ की संभावना का फ़ायदा उठाते हैं, साथ ही बाज़ार के गिरने पर कुछ सुरक्षा भी मिलती है. ये प्रोफ़ेशनली मैनेज्ड होते हैं, नियमित रूप से रीबैलेंस किए जाते हैं और आपको तुरंत अलग-अलग इक्विटी या डेट फ़ंड चुनने का बोझ नहीं उठाना पड़ता.
समय के साथ, जैसे-जैसे आपका आत्मविश्वास और समझ बढ़ती है, आप अपने पोर्टफ़ोलियो को बदल सकते हैं और अपने हिसाब से इक्विटी और डेट फ़ंड चुन सकते हैं. लेकिन शुरुआत के लिए, एग्रेसिव हाइब्रिड फ़ंड निवेश की दुनिया में एक सहज और संतुलित शुरुआत देते हैं.
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ये लेख पहली बार जुलाई 28, 2025 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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