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म्यूचुअल फ़ंड कंपनियां पैसा कैसे कमाती हैं?

आपके निवेश को मैनेज करने वाले फ़ंड हाउस पैसा कैसे कमाते हैं, जानिए यहां

आपके निवेश को मैनेज करने वाले फ़ंड हाउस पैसा कैसे कमाते हैं, जानिए यहां Nitin Yadav/AI-Generated Image

सारांशः कभी सोचा है कि म्यूचुअल फ़ंड कंपनियां अपनी कमाई कैसे करती हैं? यहां एक आसान समझने लायक़ तरीक़ा है जिससे पता चलेगा कि AMC कैसे पैसा कमाती हैं और उनके हित आपके साथ कैसे जुड़े होते हैं. जानें कि लागत कम रखकर कैसे फ़ायदा बढ़ाया जा सकता है.

जब कोई निवेशक म्यूचुअल फ़ंड में पैसा लगाता है, तो उसका पैसा दूसरे निवेशकों के साथ मिलाकर एक पूल बनाया जाता है और इसे एक प्रोफ़ेशनल फ़ंड मैनेजर मैनेज करता है. ये म्यूचुअल फ़ंड इस पूल को स्टॉक्स, बॉन्ड या दूसरी सिक्योरिटीज़ में निवेश करते हैं, ताकि समय के साथ आपका पैसा बढ़ सके.

लेकिन सवाल ये है, ख़ुद म्यूचुअल फ़ंड कंपनियां पैसा कैसे कमाती हैं? आख़िरकार, वो प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट, रिसर्च और कई तरह की सर्विसेज़ देकर फ़ंड को कुशलता से चलाती हैं. यहां एक सीधे और सरल तरीक़े से समझाया गया है कि म्यूचुअल फ़ंड कंपनियां कैसे कमाई करती हैं.

म्यूचुअल फ़ंड कैसे काम करते हैं?

जब आप किसी म्यूचुअल फ़ंड में पैसा निवेश करते हैं, तो आपको उस फ़ंड की यूनिट मिलती हैं. इन यूनिट की वैल्यू को नेट एसेट वैल्यू (NAV) कहा जाता है. ये NAV रोज़ाना मार्केट मूवमेंट और फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो के आधार पर बदलती हैं.

एक फ़ंड हाउस (जिसे एसेट मैनेजमेंट कंपनी या AMC भी कहते हैं) आपके निवेश को मैनेज करने के लिए फ़ंड मैनेजर्स, एनालिस्ट, कंप्लायंस टीम और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती हैं. इस सर्विस के लिए AMC एक छोटी फ़ीस लेती है, जो इसका ख़ास रेवेन्यू सोर्स है.

एक्सपेंस रेशियो

म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों का पैसा कमाने का सबसे अहम तरीक़ा एक्सपेंस रेशियो है.

  • एक्सपेंस रेशियो आपके फ़ंड के एसेट्स का एक प्रतिशत है, जिसे सालाना चार्ज किया जाता है, ताकि मैनेजमेंट की लागत पूरी हो सके.
  • मैनेजमेंट कॉस्ट में फ़ंड मैनेजर की सैलरी, रिसर्च ख़र्च, एडमिनिस्ट्रेशन कॉस्ट और AMC का मुनाफ़ा शामिल होता है.

उदाहरण के लिए, अगर किसी म्यूचुअल फ़ंड का एक्सपेंस रेशियो 1% है और आपने ₹1 लाख लगाए हैं, तो AMC सालाना ₹1,000 चार्ज करेगी. ये फ़ीस फ़ंड के NAV से घटाई जाती है, यानी आपको अलग से नहीं देनी पड़ती.

AMFI (एसोसिएशन ऑफ़ म्यूचुअल फ़ंड्स इन इंडिया) के जून 2025 के डेटा के मुताबिक़, भारतीय म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री ₹74,40,671 करोड़ का AUM मैनेज कर रही है. अगर हम 0.5% का एक्सपेंस रेशियो मान लें, तो ये इंडस्ट्री-लेवल पर सालाना क़रीब ₹37,203 करोड़ की मैनेजमेंट फ़ीस बनती है.

SEBI के नियमों के अनुसार, इक्विटी फ़ंड्स के लिए अधिकतम एक्सपेंस रेशियो 2.25% है (पहले ₹500 करोड़ AUM पर) और बड़े फ़ंड साइज़ के लिए ये धीरे-धीरे घटता है. डेट फ़ंड्स का एक्सपेंस रेशियो आमतौर पर कम होता है.

AMC अपनी कमाई कैसे बढ़ाती हैं

भले ही, एक्सपेंस रेशियो इसका मुख्य रेवेन्यू सोर्स है, लेकिन AMC अपना AUM बढ़ाकर फ़ीस इनकम को बढ़ाती हैं:

  1. नए फ़ंड लॉन्च करना (NFOs): नए फ़ंड ऑफ़र से ताज़ा निवेशक पैसा आता है, जिससे AMC का कुल AUM और उसकी फ़ीस इनकम दोनों बढ़ते हैं.
  2. कई फ़ंड कैटेगरी मैनेज करना: AMC इक्विटी, डेट, हाइब्रिड और सॉल्यूशन-ओरिएंटेड फ़ंड्स चलाती हैं. जितना बड़ा इन फ़ंड्स का संयुक्त AUM होगा, उतनी ही ज़्यादा कमाई होगी.

AMC के दूसरे इनकम सोर्स हैं:

  1. पोर्टफ़ोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज़ (PMS): AMC हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) के लिए PMS ऑफ़र करती हैं, जिनमें पर्सनलाइज्ड मैनेजमेंट होने की वजह से फ़ीस ज़्यादा होती है.
  2. इंटरनेशनल टाई-अप्स और फ़ीडर फ़ंड्स: AMC ग्लोबल फ़ंड हाउसेज़ के साथ पार्टनरशिप में इंटरनेशनल फ़ंड भी ऑफ़र करती हैं, जिससे भारतीय निवेशकों को विदेशी मार्केट में एक्सेस मिलता है.

क्यों AMC चाहती हैं कि आपका पैसा बढ़े

दिलचस्प बात ये है कि म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों का फ़ायदा सीधे आपके निवेश से जुड़ा है. चूंकि फ़ीस आपके निवेश की वैल्यू (AUM) के प्रतिशत पर लगती है, अगर आपका पोर्टफ़ोलियो ₹1 लाख से बढ़कर ₹1.5 लाख हो जाता है, तो उनकी कमाई भी बढ़ जाती है. ये अलाइनमेंट AMC को लॉन्ग-टर्म परफ़ॉर्मेंस पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है.

डायरेक्ट Vs रेगुलर प्लान की फ़ीस में फ़र्क क्यों?

म्यूचुअल फ़ंड्स दो प्रकार के होते हैं:

  • रेगुलर प्लान: इसमें निवेशक डिस्ट्रीब्यूटर या एडवाइज़र के ज़रिए निवेश किया जाता है, जिन्हें AMC से कमीशन मिलता है. इस वजह से एक्सपेंस रेशियो ज़्यादा होता है.
  • डायरेक्ट प्लान: इसमें निवेशक सीधे फ़ंड हाउस के साथ निवेश करता है. यहां एक्सपेंस रेशियो कम होता है क्योंकि इसमें डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन नहीं होता.

एक साधारण उदाहरण:

  • मासिक SIP: ₹10,000
  • निवेश अवधि: 15 साल
  • अनुमानित रिटर्न: 12% सालाना
  • एक्सपेंस रेशियो: 0.5% (डायरेक्ट) Vs 1.5% (रेगुलर)

15 साल के बाद का नतीजा:

  • डायरेक्ट प्लान वैल्यू: ₹47.6 लाख
  • रेगुलर प्लान वैल्यू: ₹43.7 लाख

सिर्फ़ कम लागत की वजह से ₹3.9 लाख का फ़र्क है.

निवेशक के लिए इसका मतलब क्या है?

  • एक्सपेंस रेशियो पर ध्यान दें: कम लागत का मतलब है कि रिटर्न का ज़्यादा हिस्सा आपके पास रहता है. ख़ासकर एक जैसे फ़ंड्स की तुलना में हमेशा एक्सपेंस रेशियो देखें.
  • अगर फ़ंड पता है तो डायरेक्ट प्लान चुनें: डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन हटाकर डायरेक्ट प्लान में लंबे समय में काफ़ी बचत होती है.
  • हाइप से ज़्यादा परफ़ॉर्मेंस को अहमियत दें: AMC मार्केट कंडीशन कैसी भी हों, फ़ीस कमाती हैं, लेकिन निवेशक बनाए रखने के लिए परफ़ॉर्मेंस और भरोसे पर निर्भर रहती हैं. मज़बूत ट्रैक रिकॉर्ड वाले फ़ंड्स के साथ बने रहें.
  • क़ीमत के हिसाब से वैल्यू समझें: अगर फ़ंड लगातार रिटर्न दे रहा है, रिस्क मैनेजमेंट मज़बूत है और ऐसी प्रोफ़ेशनल विशेषज्ञता है जिसे ख़ुद पाना मुश्किल है, तो एक्सपेंस रेशियो देना वाज़िब है.

वैल्यू रिसर्च की राय

वैल्यू रिसर्च मानता है कि म्यूचुअल फ़ंड्स वैल्थ बनाने का एक आसान, किफ़ायती और पारदर्शी तरीक़ा हैं. ख़ासकर, अनरेगुलेटेड या अपारदर्शी निवेश प्रोडक्ट की तुलना में. कम लागत और समय-परखी फ़ंड्स पर फ़ोकस करके बिना फ़ीस को रिटर्न पर हावी होने दिए आप प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट का फ़ायदा उठा सकते हैं.

क्या आप ऐसे फ़ंड चाहते हैं जो सस्ता हो?

वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र में हमारे एनालिस्ट की पसंद सेक्शन में ऐसे म्यूचुअल फ़ंड शामिल हैं जो कम एक्सपेंस रेशियो और लगातार परफ़ॉर्मेंस में बेहतर साबित हुए हैं. ये रेकमेंडेशन आपको स्मार्ट निवेश, कम लागत और अपने लक्ष्य की ओर बने रहने में मदद करती है.

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ये भी पढ़ें: क्या आपको 'टॉप-परफ़ॉर्मिंग' म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करना चाहिए?

ये लेख पहली बार अगस्त 14, 2025 को पब्लिश हुआ.

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