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3 टॉप मल्टी-कैप फ़ंड, जो जोखिम लेने से पीछे नहीं हटते

जहां आक्रामकता और चयन साथ हों: वो मल्टी-कैप जो स्मॉल की ओर झुकाव है और उनका नतीजा कैसा रहा

जहां आक्रामकता और चयन साथ हों: वो मल्टी-कैप जो स्मॉल की ओर झुकाव है और उनका नतीजा कैसा रहाAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः कुछ मल्टी-कैप फ़ंड अभी सचमुच साहसी दांव खेल रहे हैं. उन्होंने ज़्यादा ग्रोथ की उम्मीद में आधे से ज़्यादा पैसा छोटी कंपनियों में लगाया है. चलिए देखते हैं कौन से फ़ंड्स सबसे बड़े जोखिम भरे दांव लगाए हैं और उन दांवों का नतीजा कैसा रहा है.

मल्टी-कैप फ़ंड एक सीधी और असरदार सोच पर चलते हैं. ये फ़ंड अपने मैनेजरों को लार्ज, मिड और स्मॉल कंपनियों में निवेश की आज़ादी देते हैं, साथ ही इनके बीच संतुलन बनाए रखते हैं.

SEBI के नियमों के मुताबिक़, हर मल्टी-कैप फ़ंड को लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्टॉक्स में कम-से-कम 25-25% लगाना ज़रूरी होता है. बचा हुआ 25% हिस्सा फ़ंड मैनेजर अपने बाज़ार के नज़रिए के अनुसार इन्हीं कैटेगरी में कहीं भी लगा सकता है.

ये लचीला स्ट्रक्चर मल्टी-कैप फ़ंड को बड़ी कंपनियों की थोड़ी स्थिरता और मिड और स्मॉल कंपनियों की ज़्यादा ग्रोथ संभावना - दोनों का फ़ायदा देता है. यही वजह है कि ये बहुत से निवेशकों के लिए “ख़ास” इक्विटी निवेश के विकल्प बने हुए हैं. AMFI (एसोसिएशन ऑफ़ म्यूचुअल फ़ंड्स इन इंडिया) के आंकड़ों के मुताबिक़, फ़िलहाल 1.07 करोड़ से ज़्यादा निवेशक मल्टी-कैप फ़ंड पर भरोसा कर रहे हैं और ये मिलकर लगभग ₹2.1 लाख करोड़ एसेट का प्रबंधन कर रहे हैं.

असल में, इन फ़ंड्स को तीनों मार्केट-कैप हिस्सों में निवेश रखना ही पड़ता है, इसलिए असली फर्क़ इस बात से दिखता है कि ये छोटी कंपनियों की ओर कितना झुकाव रखते हैं.

सबसे एग्रेसिव मल्टी-कैप फ़ंड

जिन फ़ंड में स्मॉल-कैप और मिड-कैप स्टॉक्स का एक्सपोज़र ज़्यादा होता है, उन्हें आम तौर पर ज़्यादा एग्रेसिव माना जाता है. वजह ये है कि छोटे स्टॉक्स चढ़ते दौर में तेज़ उछल सकते हैं, पर गिरावट में उतनी ही तेज़ी से नीचे भी आ सकते हैं. आसान भाषा में कहें तो जितना ज़्यादा झुकाव छोटी कंपनियों की तरफ़ होगा, उनके पोर्टफ़ोलियो को उतना ज़्यादा “बोल्ड” माना जाता है.

तो, देखते हैं किन फ़ंड ने सबसे ज़्यादा पैसा छोटी कंपनियों - यानी बाज़ार आकार के निचले 30% हिस्से वाली कंपनियां में में लगाया है. ये डेटा 30 सितंबर 2025 तक का है.

सबसे बोल्ड मल्टी-कैप फ़ंड

फ़ंड का नाम सबसे छोटी कंपनियों में एक्सपोज़र
DSP मल्टी-कैप फ़ंड 60.00%
SBI मल्टी-कैप फ़ंड 54.40%
व्हाइटओक कैपिटल मल्टी-कैप फ़ंड 52.70%
ये डेटा 30 सितंबर 2025 तक का है. “सबसे साहसी” से मतलब मार्केट कैपिटलाइज़ेशन के निचले 30% हिस्से से है. सिर्फ़ वही एक्टिव फ़ंड शामिल हैं जिनका कम-से-कम एक साल का इतिहास है.

एक साल से ज़्यादा समय से चल रहे 27 मल्टी-कैप फ़ंड में से, ये तीन इसलिए अलग दिखते हैं क्योंकि इन्होंने अपने पोर्टफ़ोलियो का आधे से ज़्यादा हिस्सा देश की सबसे छोटी लिस्टेड कंपनियों में लगाया है.

ICICI Prudential Multi Cap Fund और Quant Multi Asset Fund इनके पीछे आते हैं, जिनका एक्सपोज़र लगभग 49.7% है.

ये स्तर साफ़ दिखाता है कि कौन से फ़ंड हाउस ज़्यादा संभावित अपसाइड की तरफ़ पोज़िशन ले रहे हैं और ज़्यादा रिस्क भी ले रहे हैं.

क्या साहसी हमेशा कामयाब होता है?

ऐसा ज़रूरी नहीं है. कम-से-कम इनके 12 महीने के नतीजे तो यही कहते हैं. 12 महीने किसी फ़ंड को परखने के लिए कम समय है, फिर भी आंकड़े दिखाते हैं कि एग्रेसिव पोर्टफ़ोलियो हर बार विनर नहीं बनता. (ध्यान रहे, DSP और WhiteOak Capital के फ़ंड काफ़ी नए हैं, इसी कारण बराबरी के लिए एक साल का ही प्रदर्शन देखा गया है.)

⦁ WhiteOak Capital मल्टी-कैप फ़ंड, जिसमें 52% से ज़्यादा छोटी कंपनियों स्टॉक्स हैं, पिछले 12 महीनों में 7.3% की बढ़त के साथ सभी मल्टी-कैप फ़ंड में दूसरा सबसे अच्छा रहा.

⦁ SBI मल्टी-कैप फ़ंड भी टॉप-क्वार्टाइल में रहा है. इससे पता चलता है कि समझदारी से चुने गए स्मॉल-कैप वाक़ई फ़ायदा दे सकते हैं.

⦁ लेकिन सबसे ज़्यादा एग्रेसिव DSP मल्टी-कैप फ़ंड पिछले 12 महीनों में 1.9% गिरा और बॉटम-क्वार्टाइल में रहा.

ये बड़ा फर्क़ बताता है कि सिर्फ़ ज़्यादा रिस्क लेने से बेहतर रिटर्न की गारंटी नहीं मिलती. स्टॉक चयन और पोर्टफ़ोलियो बनाने की क्वालिटी उतनी ही अहम है. असल में शायद उससे भी ज़्यादा अहम है.

क्या इन फ़ंड में आपको निवेश करना चाहिए?

अगर मल्टी-कैप फ़ंड को देखना है, तो ये आंकड़े शुरुआती आकलन के लिए सही हैं, मगर इससे पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती.

एग्रेसिव फ़ंड चढ़ते बाज़ार में शानदार प्रदर्शन कर सकते हैं, पर गिरावट के दौर में ज़्यादा गिर भी सकते हैं. वहीं, संभलकर चलने वाले निवेशकों को ज़्यादा लार्ज-कैप एलोकेशन वाले फ़ंड से कुछ ज़्यादा स्थिर नतीजे मिल सकते हैं.

इसे समझने के लिए वैल्यू रिसर्च रेटिंग देखी जा सकती हैं, जो हर मल्टी-कैप फ़ंड पर मिलती हैं. ये 1 से 5 स्टार तक होती हैं और रिस्क एडजस्टेड प्रदर्शन पर आधारित रहती हैं. यानी सिर्फ़ ऊंचे रिटर्न नहीं, बल्कि स्थिरता और निरंतरता भी मायने रखती है.

ये रेटिंग रिसर्च की पहली मजबूत सीढ़ी बन सकती हैं, जिससे पता चलता है कि किन फ़ंड ने लंबे समय में बेहतर नतीजे दिए हैं - और वो भी संतुलित उतार-चढ़ाव के साथ.

पर सिर्फ़ रेटिंग ये नहीं बताती कि कौन सा फ़ंड किसके लिए ठीक होगा.

यहीं वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र मदद करता है. ये सर्विस आपके गोल्स, समय-सीमा और रिस्क लेने की क्षमता के आधार पर सही म्यूचुअल फ़ंड चुनकर एक पर्सनल प्लान बनाती है.

ये सिर्फ़ चयन तक सीमित नहीं - ये बताता है कैसे एलोकेशन करना है, कब री-बैलेंस करना है और लंबे समय के गोल पर कैसे टिके रहना है.

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ये भी पढ़ें: हाल के दौर के 2 सबसे अच्छे मल्टी-कैप फ़ंड कौन-से हैं?

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