बड़े सवाल

डायरेक्ट Vs रेगुलर म्यूचुअल फ़ंड: आपके लिए क्या सही है?

ख़र्च मामूली लग सकते हैं, पर वक़्त के साथ रिटर्न में बड़ा असर पड़ सकता है

ख़र्च मामूली लग सकते हैं, पर वक़्त के साथ रिटर्न में बड़ा असर पड़ सकता हैPhoto: Manish Yadav

सारांश: म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के सामने अक्सर यह सवाल आता है कि रेगुलर प्लान लें या डायरेक्ट. एक सस्ता होता है, दूसरा आसान लगता है. लेकिन आज लिया गया यह फ़ैसला लॉन्ग-टर्म में आपकी कमाई पर बड़ा असर डालता है. यहां हम दोनों प्लान की तुलना करते हैं और बताते हैं कि किस तरह का निवेशक किसके लिए ज़्यादा ठीक है.

“रेगुलर प्लान लूं या डायरेक्ट?” यह सवाल बहुत-से म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों को उलझन में डाल देता है. ज़्यादातर लोग जानते हैं कि डायरेक्ट प्लान सस्ते होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि आज दिखने वाला सिर्फ़ 1 प्रतिशत का ख़र्च-फ़र्क, लॉन्ग-टर्म में आख़िरी कॉर्पस पर कितना बड़ा असर डाल सकता है.

इसीलिए डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच चुनाव को उतनी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है, जितनी अक्सर ली नहीं जाती. इसी मक़सद से हमने दोनों तरह के प्लान की तुलना की है, ताकि यह समझा जा सके कि ज़्यादातर निवेशकों के लिए कौन-सा विकल्प ज़्यादा सही बैठता है.

डायरेक्ट और रेगुलर प्लान होते ही क्यों हैं?

एक ही म्यूचुअल फ़ंड स्कीम के दो प्लान होने की वजह सीधी है. बीच में कोई बिचौलिया है या नहीं.

डायरेक्ट प्लान फ़ंड हाउस से या किसी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिये सीधे ख़रीदे जाते हैं, बिना किसी डिस्ट्रीब्यूटर के. वहीं रेगुलर प्लान किसी डिस्ट्रीब्यूटर या म्यूचुअल फ़ंड एडवाइज़र के ज़रिये लिए जाते हैं.

रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर को कमीशन मिलता है, जो फ़ंड हाउस देता है. यह कमीशन निवेशक से अलग से नहीं लिया जाता, बल्कि स्कीम के एक्सपेंस रेशियो में शामिल होता है. यही वजह है कि रेगुलर प्लान का एक्सपेंस रेशियो डायरेक्ट प्लान से ज़्यादा होता है, जबकि दोनों एक ही पोर्टफ़ोलियो में निवेश करते हैं और एक ही फ़ंड मैनेजर द्वारा चलाए जाते हैं. आसान शब्दों में, निवेश की स्ट्रैटिजी और ख़र्च से पहले का प्रदर्शन एक-सा होता है. फ़र्क सिर्फ़ ख़र्च के स्ट्रक्चर में होता है.

ख़र्च ही असली फ़र्क लाता है

डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के एक्सपेंस रेशियो में आम तौर पर 0.5 से 1 प्रतिशत तक का फ़र्क होता है. आज यह मामूली लग सकता है, लेकिन ज़्यादा ख़र्च न सिर्फ़ एक साल के रिटर्न को घटाता है, बल्कि आने वाले सालों में जिस आधार पर रिटर्न बनता है, उसे भी छोटा करता चला जाता है.

इसे एक उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए, ₹10,000 की मंथली SIP शुरू की गई है और ख़र्च से पहले सालाना रिटर्न 12 प्रतिशत है.

मान लेते हैं कि डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो 1 प्रतिशत है, जबकि रेगुलर प्लान का 2 प्रतिशत.

शुरुआती सालों में दोनों प्लान के कॉर्पस में फ़र्क मामूली लगेगा. लेकिन पांच साल बाद यह अंतर ₹19,000 से थोड़ा ज़्यादा हो जाता है. दस साल में यह फ़र्क क़रीब ₹1.1 लाख तक पहुंच जाता है.

कंपाउंडिंग बराबर रफ़्तार से नहीं चलती. जितना लंबा समय, उतनी तेज़ी से अंतर बढ़ता है. 20 साल में यह फ़र्क क़रीब ₹9.2 लाख हो जाता है. 25 साल में ₹21 लाख और 30 साल में डायरेक्ट प्लान का कॉर्पस रेगुलर प्लान से ₹44 लाख से ज़्यादा आगे निकल जाता है.

ये भी पढ़ें: मल्टी-कैप और फ़्लेक्सी-कैप में क्या अंतर है? 

कमाई में बढ़ता अंतर

डायरेक्ट प्लान के बजाय रेगुलर प्लान चुनने से समय के साथ आपके कॉर्पस पर कैसे असर पड़ सकता है

समयावधि
कॉर्पस में फ़र्क
5 साल ₹ 19,438
10 साल ₹1.1 लाख
20 साल ₹9.2 लाख
25 साल ₹21.0 लाख
30 साल ₹44.9 लाख
 

इसमें हर महीने ₹10,000 की मंथली SIP और सालाना रिटर्न 12 प्रतिशत है रिटर्न माना गया है. डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो 1 प्रतिशत और रेगुलर का 2 प्रतिशत माना गया है.

यह बढ़ता हुआ फ़र्क इसलिए बनता है क्योंकि ज़्यादा ख़र्च हर साल रिटर्न को कुतरता रहता है. फिर वही कम रिटर्न आगे चलकर कंपाउंड होता है. जो अंतर शुरुआत में दिखता भी नहीं, वही रिटायरमेंट जैसे लंबे लक्ष्यों के लिए बड़ा नुक़सान बन जाता है.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रेगुलर प्लान बेकार हैं. कुछ निवेशकों के लिए वे ज़्यादा ठीक भी हो सकते हैं.

कब रेगुलर फ़ंड सही बैठता है

डायरेक्ट प्लान का ख़र्च-फ़ायदा साफ़ होने के बावजूद कुछ हालात ऐसे होते हैं, जहां रेगुलर प्लान में बने रहना ज़्यादा समझदारी हो सकती है.

  • सलाह सच में मददगार हो: अगर डिस्ट्रीब्यूटर एसेट एलोकेशन में मदद करता है, बाज़ार गिरने पर निवेश बनाए रखने में साथ देता है और जल्दबाज़ी वाले ग़लत फ़ैसलों से बचाता है, तो रेगुलर प्लान का ज़्यादा ख़र्च जायज़ हो सकता है. अच्छी सलाह, अपनी क़ीमत से कहीं ज़्यादा पैसा बचा सकती है. लेकिन अगर रिश्ता सिर्फ़ लेन-देन या साल में एक स्टेटमेंट तक सीमित है, तो लगातार ख़र्च देना तर्कसंगत नहीं.
  • स्विच करना जब सही न लगे: कुछ मामलों में स्विच करना संभव नहीं होता. ख़ासकर इंटरनेशनल फ़ंड कैटेगरी में कई स्कीमों ने रेगुलेटरी सीमाओं के चलते नए निवेश रोक रखे हैं. चूंकि रेगुलर से डायरेक्ट में जाने के लिए पहले रिडेम्प्शन और फिर नया निवेश करना पड़ता है, ऐसे में डायरेक्ट प्लान में जाना संभव नहीं रहता. तब वहीं बने रहना मजबूरी होती है, चुनाव नहीं.
  • नया निवेशक होना: अगर म्यूचुअल फ़ंड में निवेश की शुरुआत ही हुई है और यह साफ़ नहीं है कि कौन-सा फ़ंड कैसे काम करता है, तो एडवाइज़र की मदद लेना बेहतर हो सकता है. जैसे-जैसे बाज़ार की समझ बनती है, तब डायरेक्ट प्लान पर जाने पर विचार किया जा सकता है.

आप क्या समझें?

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फ़ंड के बीच चुनाव आख़िरकार ख़र्च और सुविधा के बीच संतुलन का सवाल है. रेगुलर प्लान सहारा और सहजता दे सकते हैं, लेकिन डायरेक्ट प्लान स्ट्रक्चरल तौर पर कम ख़र्च वाला विकल्प हैं, जो लंबे समय में ज़्यादा पैसा हाथ में छोड़ते हैं.

जो निवेशक बुनियादी काम संभाल सकते हैं और अनुशासन बनाए रख सकते हैं, उनके लिए डायरेक्ट प्लान ज़्यादा मुफ़ीद होते हैं. लंबे समय में, जिस चीज़ पर क़ाबू है उसे सही रखना, उन बातों पर उम्मीद लगाने से ज़्यादा मायने रखता है जो काबू में नहीं हैं.

रेगुलर से डायरेक्ट म्यूचुअल फ़ंड में कैसे जाएं?

अगर आप अपने रेगुलर फ़ंड इन्वेस्टमेंट को डायरेक्ट में बदलना चाहते हैं, तो वैल्यू रिसर्च एडवाइज़र ऐप इसमें आपकी मदद करता है. इतना ही नहीं, यह आपको सही इन्वेस्टमेंट चुनने, डिसिप्लिन बनाए रखने और साफ़, एक्सपर्ट की गाइडेंस के साथ लॉन्ग-टर्म में बेहतर रिटर्न कमाने में भी मदद करता है.

एडवाइज़र ऐप डाउनलोड करें!

ये भी पढ़ें: म्यूचुअल फ़ंड निवेश: CAGR और एब्सोल्यूट रिटर्न क्या होता है?

ये लेख पहली बार फ़रवरी 06, 2026 को पब्लिश हुआ.

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

पांच इंटरनेशनल फ़ंड खुले, Nasdaq 100 ETF अपनी वैल्यू के क़रीब पहुंचा

पढ़ने का समय 5 मिनट•आकार रस्तोगी

आपका शेयर 52-वीक लो पर पहुंच गया, अब क्या करें?

पढ़ने का समय 5 मिनट•अभिनव गोयल

सोलर पंप कंपनियों की ग्रोथ कहां अटक गई?

पढ़ने का समय 6 मिनट•अर्पित सूरी

Ola Electric vs Ather Energy: एक की फ़ैक्ट्री ख़ाली, दूसरे के पास ख़रीदारों की कतार

पढ़ने का समय 6 मिनट•Ananya Khurana

AI पर ख़र्च से जुड़ी चिंता कोई नई बात नहीं

पढ़ने का समय 5 मिनट•धीरेंद्र कुमार

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

आपका फ़ंड नुक़सान में है? इसका मतलब यह नहीं कि फ़ंड ख़राब है

सितंबर और अक्तूबर ने ज़्यादातर पोर्टफ़ोलियो को लाल कर दिया है, पर ये आंकड़ा आपके चुने हुए फ़ंड से ज़्यादा इस बारे में बताता है कि आपने निवेश कब किया

दूसरी कैटेगरी