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फ़ार्मा सेक्टर में आया एक नया दावेदार, क्या इसमें निवेश करना सही रहेगा?

Acutaas का कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मा मैन्युफ़ैक्चरिंग की तरफ़ रुख़ करना तो अच्छा है, लेकिन स्टॉक उतना आकर्षक नहीं है

Acutaas का कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मा मैन्युफ़ैक्चरिंग की तरफ़ रुख़ करना तो अच्छा है, लेकिन स्टॉक उतना आकर्षक नहीं हैAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः 600 केमिकल बिल्डिंग ब्लॉक्स. 55 देश. एक कैंसर की दवा का कॉन्ट्रैक्ट, जिसने सब कुछ बदल दिया. Acutaas एक ऐसा दांव खेल रही है जिस पर ज़्यादातर फ़ार्मा निवेशकों की नज़र अभी नहीं पड़ी है. और अब तक के आंकड़े नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है.

Acutaas से जुड़ी एक असामान्य बात ने हमारा ध्यान खींचा. दो साल में कंपनी ने अपना रेवेन्यू लगभग दोगुना कर लिया, ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट मार्जिन 11 प्रतिशत से बढ़कर क़रीब 29 प्रतिशत हो गया और एक ही साल में शेयरहोल्डर्स को 85 प्रतिशत रक़म वापस लौटाई. किसी बिज़नेस की ऐसी रफ़्तार, जिसके बारे में ज़्यादातर निवेशकों ने कभी सुना भी नहीं, इसे गहराई से देखने पर मजबूर करती है.

जो तस्वीर सामने आई वो एक ऐसी कंपनी की है, जो बड़े बदलाव के बीच में है. वो एक सामान्य केमिकल सप्लायर से आगे बढ़कर पेटेंटेड दवाओं का स्पेशलाइज़्ड कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफ़ैक्चरर बनना चाहती है. महत्वाकांक्षा बड़ी है: फ़ाइनेंशियल ईयर 28 तक अकेले कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफ़ैक्चरिंग से ₹1,000 करोड़, जो आज पूरे बिज़नेस की कमाई के बराबर है.

Acutaas असल में करती क्या है?

Acutaas को समझने के लिए फ़ार्मास्युटिकल सप्लाई चेन की शुरुआत से चलते हैं. हर दवा एक एक्टिव इंग्रेडिएंट पर टिकी होती है, वो केमिकल जो किसी बीमारी का असल इलाज करता है. लेकिन उस इंग्रेडिएंट को बनाने से पहले, उसे इंटरमीडिएट्स कहलाने वाले सरल केमिकल बिल्डिंग ब्लॉक्स से तैयार किया जाता है. Acutaas ऐसे 600 से ज़्यादा बिल्डिंग ब्लॉक्स बनाती है, जो 55 देशों में बेचे जाते हैं. यूरोप से क़रीब दो-तिहाई रेवेन्यू आता है और लगभग 85 प्रतिशत बिज़नेस कैंसर, दिल की बीमारी और डिप्रेशन जैसी क्रॉनिक थेरेपीज़ के लिए है.

बिज़नेस के तीन हिस्से हैं.

  • पहला है जेनेरिक इंटरमीडिएट्स, जो रेवेन्यू का क़रीब आधा हिस्सा है. इसकी सप्लाई GSK, Cipla, Sun Pharma और Dr Reddy's जैसी सस्ती, ऑफ़-पेटेंट दवा कंपनियों को की जाती है. यहां बिज़नेस कठिन है: कड़ी प्रतिस्पर्धा और लागत को लेकर चौकस ख़रीदार, मार्जिन को कम रखते हैं.
  • दूसरा है इनोवेटर बिज़नेस, जो पेटेंटेड दवाओं के लिए एडवांस्ड इंटरमीडिएट्स सप्लाई करता है. Acutaas किसी मॉलिक्यूल की डेवलपमेंट स्टेज में ही शामिल हो जाती है, ताकि अगर वो दवा आगे चलकर मंज़ूर हो, तो वही पहले से चुनी हुई सप्लायर बनी रहे. यहां मार्जिन जेनेरिक्स से 2-3 प्रतिशत ज़्यादा है.
  • तीसरा सेगमेंट, और वो जो सब कुछ बदल देता है, वो है CDMO (कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग). इस मॉडल में एक फ़ार्मा कंपनी आमतौर पर पेटेंट की पूरी अवधि के लिए, हर दवा के मॉलिक्यूल के लिए एक ही स्पेशलिस्ट मैन्युफ़ैक्चरर को चुनती है. एक बार चुने जाने के बाद, उस मैन्युफ़ैक्चरर की ख़ास केमिकल प्रक्रिया दवा के रेगुलेटरी अप्रूवल में दर्ज हो जाती है. बाद में सप्लायर बदलने का मतलब है कि कई साल की कम्प्लायंस टेस्टिंग फिर से करनी पड़े, जो इसे लगभग असंभव बना देता है. फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में रेवेन्यू में CDMO की हिस्सेदारी क़रीब 10 प्रतिशत थी, यानी Acutaas का सबसे छोटा सेगमेंट. और यही वो सेगमेंट है जिसे मैनेजमेंट तेज़ी से बड़ा करने में जुटा है.

आंकड़े कहानी बयां करते हैं

कंसोलिडेटेड (करोड़ ₹) TTM FY25 FY24 FY23 FY22 FY21 FY20
रेवेन्यू 1,215.10 1,006.90 717.5 616.7 520.1 340.6 239.6
EBIT (OI को छोड़कर) 348.2 205.5 80.4 110.3 95.1 76 37.5
EBIT मार्जिन (%) 28.7 20.4 11.2 17.9 18.3 22.3 15.7

FY24 में मार्जिन तेज़ी से गिरकर 11.2 प्रतिशत पर आ गया, जब चीनी मैन्युफ़ैक्चरर्स ने भारी छूट पर फ़ाइनल ड्रग प्रोडक्ट्स डंप करने शुरू किए. इससे Acutaas के ग्राहकों पर दबाव बढ़ा, जिन्होंने इंग्रेडिएंट की लागत पर और सख़्ती से दबाव डाला. प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए Acutaas को स्पॉट प्राइसिंग पर उतरना पड़ा.

आज 28.7 प्रतिशत तक की वापसी महज़ पलटाव नहीं है. कंपनी ने अपने जेनेरिक पोर्टफ़ोलियो को ज़्यादा वैल्यू वाले मॉलिक्यूल्स की तरफ़ शिफ़्ट किया, CDMO की रेवेन्यू हिस्सेदारी बढ़ाई और ऑपरेटिंग लेवरेज का फ़ायदा उठाया, यानी रेवेन्यू लागत से तेज़ी से बढ़ा और मार्जिन फैला. इसके अलावा, 71 प्रतिशत कच्चा माल अब देश के भीतर से आता है और 90 प्रतिशत  से ज़्यादा एडवांस्ड इंटरमीडिएट्स अब इन-हाउस बनाए जाते हैं, जिससे FY24 जैसे बाहरी सप्लाई शॉक का असर कम हो गया है.

बड़ा दांव

CDMO बिज़नेस की नींव एक फ़िनिश कंपनी Fermion है, जो Darolutamide का एक्टिव इंग्रेडिएंट बनाती है. यह Bayer की एक कैंसर की दवा है. यह अकेला कॉन्ट्रैक्ट CDMO रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा है और Acutaas की अंकलेश्वर फ़ैसिलिटी का एक-तिहाई हिस्सा इसी काम में लगा है. पेटेंट प्रोटेक्शन ज़्यादातर देशों में 2033-2035 तक जारी रहने के साथ, यह रिश्ता अब पांच इंटरमीडिएट्स तक फैल चुका है.

₹310 करोड़ की अंकलेश्वर फ़ैसिलिटी इसी पाइपलाइन को ध्यान में रखकर बनाई गई है. मैनेजमेंट का लक्ष्य तीन गुना एसेट टर्नओवर है, यानी प्लांट में लगाए गए हर एक रुपये से सालाना तीन रुपये का रेवेन्यू. पूरी क्षमता पर यह लगभग ₹930 करोड़ बनता है. लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट से कहीं ज़्यादा की ज़रूरत है.

फ़ाइनेंशियल ईयर 28 में ₹1,000 करोड़ का लक्ष्य कई CDMO रिश्तों पर टिका है. एक और बड़े यूरोपीय ओरिजिनेटर के साथ डील अंतिम बातचीत में है. उससे आगे क्लिनिकल ट्रायल में 60 से 80 मॉलिक्यूल्स की पाइपलाइन है, जिनमें से कई अप्रूवल के क़रीब हैं और फ़ाइनेंशियल ईयर 27 से 29 के बीच रेवेन्यू देने की उम्मीद है.

असली जोख़िम कहां है?

Fermion पर निर्भरता से शुरुआत करते हैं. इस कॉन्ट्रैक्ट से मिलने वाला रेवेन्यू पूरी तरह Bayer के प्रिस्क्रिप्शन वॉल्यूम, प्राइसिंग फ़ैसलों और Darolutamide को बाज़ार में मिलने वाली प्रतिस्पर्धा पर निर्भर है. इनमें से कोई भी Acutaas के हाथ में नहीं है. और पेटेंट 2033-2035 तक चलने के साथ यह सवाल भी है कि जब सस्ते जेनेरिक वर्जन बाज़ार में आएंगे, तब क्या होगा? इसका जवाब कंपनी को अभी तक नहीं देना पड़ा है.

फिर है ग्रोथ का लक्ष्य. CDMO रेवेन्यू को लगातार दो साल, हर साल लगभग दोगुना होना होगा. अंकलेश्वर के तीन प्रोडक्शन ब्लॉक में से सिर्फ़ एक पूरी तरह कमर्शियलाइज़ हुआ है और वो भी 50-60 प्रतिशत यूटिलाइज़ेशन पर चल रहा है. पाइपलाइन का बड़ा हिस्सा अभी रेगुलेटरी अप्रूवल और फ़ाइनेंशियल ईयर 28 की समय-सीमा के भीतर लॉन्च के फ़ैसलों का इंतज़ार कर रहा है. कंपनी ने फ़ाइनेंशियल ईयर 23 की दूसरी तिमाही में एक बार गाइडेंस घटाया था, जब एक ग्राहक ने लॉन्च में देरी की. इस इंडस्ट्री में यह सामान्य बात है, लेकिन फ़ाइनेंशियल ईयर 28 के लक्ष्य में ऐसी देरी की कोई गुंजाइश नहीं बचती.

इन सबके बावजूद यह जेनेरिक्स बिज़नेस है, जिसके पास कोई लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट कवर नहीं है. चीन का पुराना तरीक़ा है कि बाज़ार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वो इंग्रेडिएंट की क़ीमतें 40-50 प्रतिशत तक गिरा देता है. कॉन्ट्रैक्ट के बिना, Acutaas पर यह दबाव सीधे तौर पर और पूरी तरह पड़ता है.

क़ीमतों पर इसका असर पहले ही दिख चुका है

Acutaas पिछले एक साल के मुनाफ़े की तुलना में 60 गुना पर ट्रेड कर रही है. उसकी जैसी दूसरी कंपनियों से तुलना करें तो Neuland और Divi's क्रमशः 86 और 62 गुना पर हैं. लेकिन उन्होंने यह वैल्यूएशन सालों के दौरान प्रमाणित एक्ज़ीक्यूशन के बाद हासिल किया है. Acutaas अभी CDMO प्लेयर बनने की प्रक्रिया में है, लेकिन वैल्यूएशन किसी पुराने और आज़माए हुए CDMO प्लेयर जैसा पा रही है.

इसे समझने का सबसे सरल तरीक़ा यह है कि आज की क़ीमत किस चीज़ की मांग करती है. अगर कोई निवेशक पांच साल में 15 प्रतिशत सालाना रिटर्न चाहता है, तो Acutaas का मुनाफ़ा हर साल 25 प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ना होगा. साथ ही, यह भी मानकर चलना होगा कि वैल्यूएशन मल्टीपल 60 गुना से घटकर 40 गुना तक आ जाए, जो अभी भी काफ़ी ज़्यादा है. अगर ग्रोथ 20 प्रतिशत सालाना पर रह गई, तो रिटर्न सिर्फ़ 10 प्रतिशत रह जाएगा.

यही असमानता असली समस्या है. CDMO का बदलाव वास्तविक है. Fermion कॉन्ट्रैक्ट ठोस है. मार्जिन की वापसी कोई संयोग नहीं है. लेकिन स्टॉक की क़ीमत में इन सब फ़ैक्टर्स का असर पहले ही शामिल हो चुका है. रेगुलेटरी मंज़ूरियों में कोई भी देरी, CDMO के विस्तार में कोई भी सुस्ती या किसी भी कॉन्ट्रैक्ट को पूरा होने में उम्मीद से ज़्यादा समय लगना-इनमें से किसी भी स्थिति में कंपनी का वैल्यूएशन तेज़ी से घट जाता है. बिज़नेस एक असली बदलाव के बीच में है. लेकिन दुर्भाग्य से स्टॉक पहले ही उस बदलाव को पूरा मान चुका है.

यह समझना कि कोई दिलचस्प कहानी क़ीमत में पहले ही शामिल हो चुकी है या अभी भी नहीं, यही वो फ़ैसला है जो अनुशासित निवेश को महंगे जोश से अलग करता है. Value Research Stock Advisor उन बिज़नेस को उनके बदलाव के दौरान ट्रैक करता है, न कि सिर्फ़ तब जब वो सुर्ख़ियाँ बनाते हैं. इसके बाद ही आप जान सकते हैं कि मौक़ा अभी भी बना हुआ है या क़ीमत पहले ही बढ़ चुकी है.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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