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सारांशः एक ज़बरदस्त IPO, भरोसेमंद पैरेंट कंपनी और अच्छी लिस्टिंग. पहली नज़र में यह मेल एकदम सही लगता है. लेकिन शुरुआती जोश उतरने के बाद क्या होता है? यह स्टोरी बताती है कि साल के सबसे बड़े IPO में शामिल एक कंपनी अपने निवेशकों को अच्छा रिटर्न क्यों नहीं दे पाई और निवेशकों ने शुरुआत में किन बातों पर ध्यान नहीं दिया.
एक साल पहले HDB Financial का IPO बाज़ार के सबसे सुरक्षित IPO में गिना जा रहा था. इसके साथ HDFC का भरोसेमंद नाम जुड़ा था. कंपनी ने साल के सबसे बड़े IPO में से एक के ज़रिए ₹12,500 करोड़ जुटाए और निवेशकों ने इसे हाथों-हाथ लिया. शेयर इश्यू प्राइस से ज़्यादा क़ीमत पर लिस्ट हुआ और IPO में शेयर पाने वाले निवेशकों को पहले ही दिन अच्छा मुनाफ़ा मिला.
लेकिन यह जोश ज़्यादा समय तक नहीं टिका. लिस्टिंग के दिन शेयर बेचने वाले निवेशक ने ₹1 लाख के निवेश पर क़रीब 14% मुनाफ़ा कमाया. लेकिन अगर उसने शेयर एक साल तक रखे होते, तो ₹1 लाख की क़ीमत अब क़रीब ₹93,700 रह जाती. प्रति शेयर ₹4 का डिविडेंड जोड़ने के बाद भी उसे 6% से ज़्यादा का नुक़सान होता. जिन आम निवेशकों ने लिस्टिंग वाले दिन ₹841 के बंद भाव पर शेयर ख़रीदा था, उनके ₹1 लाख अब क़रीब ₹82,500 रह गए हैं. यानी उन्हें लगभग 18% का नुक़सान हुआ है. वहीं Nifty 50 Index Fund में लगाए गए ₹1 लाख की क़ीमत अब क़रीब ₹95,500 होती.
सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ. इसका जवाब IPO में कम और उसके बाद हुई घटनाओं में ज़्यादा छिपा है.
लिस्टिंग कारोबार बढ़ाने के लिए नहीं हुई थी
IPO के शोर में एक ज़रूरी बात दब गई. HDB को कारोबार बढ़ाने के लिए पैसे की ज़रूरत नहीं थी. वह शेयर बाज़ार में इसलिए आई, क्योंकि RBI के नियमों के तहत उसे लिस्ट होना ही था. RBI देश की सबसे बड़ी NBFC को अपर लेयर में रखता है. इस लिस्ट में आने वाली कंपनी को तीन साल के भीतर शेयर बाज़ार में लिस्ट होना पड़ता है. HDB को सितंबर 2022 में इस लिस्ट में रखा गया था. इसलिए उसे सितंबर 2025 तक लिस्ट होना था. कंपनी ने अक्तूबर 2024 में IPO के काग़ज़ जमा कर दिए थे.
IPO का ढांचा भी यही बात बताता है. कंपनी ने कुल ₹12,500 करोड़ जुटाए, लेकिन इसमें से केवल ₹2,500 करोड़ HDB को मिले. बाक़ी ₹10,000 करोड़ के शेयर उसकी मूल कंपनी HDFC Bank ने बेचे थे. यानी IPO से जुटाए गए हर ₹5 में से ₹4 HDFC Bank के पास गए, HDB के कारोबार में नहीं. कंपनी को मिले नए पैसे से उसकी बैलेंस शीट ज़रूर मज़बूत हुई. उसकी Tier-1 पूंजी 14.7% से बढ़कर 17.3% हो गई. कुल Capital Adequacy Ratio भी 19.2% से बढ़कर 21.8% हो गया. लेकिन अगर किसी निवेशक को लगा था कि IPO का पूरा पैसा HDB को मिलेगा और उससे कारोबार पूरी तरह बदल जाएगा, तो उसकी उम्मीद ग़लत थी.
HDFC Bank ने IPO के बाद HDB का कोई और शेयर नहीं बेचा. लिस्टिंग के समय उसके पास HDB की 74.2% हिस्सेदारी थी. IPO में उसने ₹10,000 करोड़ के शेयर बेचे, लेकिन उसके बाद एक भी शेयर नहीं बेचा. दूसरी तरफ़, HDB के आम शेयरधारकों के पास बहुत कम शेयर हैं. कंपनी के 9.6 लाख शेयरधारकों में से 98.8% के पास 500 या उससे कम शेयर हैं. वहीं सिर्फ़ 805 शेयरधारकों के पास कंपनी के कुल 93% शेयर हैं.
उसी साल आए दूसरे IPO से तुलना करें, तो HDB का पहला साल बहुत सामान्य रहा. भारत में 2025 के दौरान 108 IPO आए थे. लिस्टिंग वाले दिन के बंद भाव से अब तक HDB ने इनमें से केवल 36 IPO से बेहतर प्रदर्शन किया है. लगभग आधे IPO अब भी अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं. IPO का जोश उतरने के बाद HDB को अपनी क़ीमत कारोबार के प्रदर्शन से सही साबित करनी थी.
किसी एक तरह के क़र्ज़ पर निर्भर नहीं है HDB
HDB एक NBFC है. आसान शब्दों में कहें, तो यह बैंक की तरह लोगों और कारोबारों को क़र्ज़ देती है, लेकिन बैंक की तरह लोगों से डिपॉज़िट नहीं ले सकती. कंपनी की शुरुआत 2007 में HDFC Bank की सहायक कंपनी के रूप में हुई थी. HDFC Bank से जुड़े होने के कारण इसकी पहुंच उन छोटे शहरों और इलाक़ों तक भी है, जहां बैंक की शाखाएं कम हैं. HDFC के नाम ने IPO के समय निवेशकों का भरोसा बढ़ाया. लेकिन लिस्टिंग के बाद बाज़ार HDB को उसके अपने प्रदर्शन के आधार पर परख रहा है.
कंपनी ने जितना क़र्ज़ दे रखा है, वह तीन हिस्सों में बंटा है. छोटे कारोबारों और प्रॉपर्टी के बदले दिए गए क़र्ज़ का हिस्सा 38% है. गाड़ियों और मशीनों के लिए दिए गए क़र्ज़ का हिस्सा भी 38% है. बाक़ी हिस्सा पर्सनल लोन, गोल्ड लोन और दोपहिया वाहनों के लिए दिए गए क़र्ज़ का है. Muthoot जैसी कंपनी मुख्य रूप से गोल्ड लोन पर टिकी है, लेकिन HDB किसी एक तरह के क़र्ज़ पर निर्भर नहीं है. उसकी असली ताक़त उसका बड़ा कारोबार है. कंपनी के 2.3 करोड़ ग्राहक, 1,730 शाखाएं और ग्राहकों तक पहुंचने के 1.4 लाख से ज़्यादा केंद्र हैं. इतने बड़े और फैले हुए कारोबार का मतलब है कि HDB का प्रदर्शन किसी एक सेक्टर की तेज़ी के बजाय पूरे क़र्ज़ बाज़ार की हालत पर निर्भर करता है.
शेयर असल में क्यों गिरा
एक समय HDB का शेयर अपने लिस्टिंग प्राइस से 33% नीचे तक गिर गया था. लगातार दो तिमाहियों तक फंसे हुए क़र्ज़ बढ़ने के बाद शेयर पर दबाव आया. बाद में इसने अपने नुक़सान का कुछ हिस्सा वापस हासिल किया.
Gross NPA उन क़र्ज़ों का हिस्सा बताता है जिनकी किस्त 90 दिन से ज़्यादा समय से नहीं चुकाए गए. क्रेडिट कॉस्ट वह पैसा है जिसे कंपनी ऐसे क़र्ज़ों से होने वाले संभावित नुक़सान के लिए अलग रखती है. यह ख़र्च जितना ज़्यादा होगा, कंपनी के मुनाफ़े का उतना बड़ा हिस्सा शेयरधारकों तक पहुंचने से पहले ही कम हो जाएगा. FY26 की पहली छमाही में Gross NPA और क्रेडिट कॉस्ट, दोनों बढ़े.
दबाव बढ़ा, फिर घट गया
Gross NPA और क्रेडिट कॉस्ट सितंबर तिमाही में सबसे ज़्यादा थे. एक साल बाद दोनों फिर मार्च 2025 के स्तर पर आ गए
| पैरामीटर | मार्च-25 | जून-25 | सितंबर-25 | दिसंबर-25 | मार्च-26 | जून-26 |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Gross NPA (%) | 2.3 | 2.6 | 2.8 | 2.8 | 2.4 | 2.3 |
| Net NPA (%) | 1 | 1.1 | 1.3 | 1.3 | 1.1 | 1 |
| Credit Cost Ratio (%) | 2.4 | 2.5 | 2.7 | 2.5 | 2.4 | 2.3 |
| दिए गए क़र्ज़ (₹ करोड़) | 17,643 | 15,171 | 15,599 | 17,917 | 19,922 | 17,629 |
इस नुक़सान की शुरुआत उत्तर और पूर्वी भारत में आई बाढ़ से हुई. बाढ़ के कारण बहुत-से ट्रक और दूसरी गाड़ियां कई दिनों तक नहीं चल पाईं. इससे HDB की एक बड़ी कमज़ोरी सामने आई. कंपनी के कमर्शियल वाहन वाले क़र्ज़ का बड़ा हिस्सा ऐसे छोटे कारोबारियों को दिया गया है, जिनके पास केवल एक ट्रक है और मुश्किल समय के लिए ज़्यादा पैसा नहीं बचता. इसके उलट Shriram Finance जैसी कंपनियां बड़े ट्रक मालिकों और ज़्यादा गाड़ियों वाले कारोबारों को भी क़र्ज़ देती हैं. अगर ट्रक नहीं चलेगा, तो उसके मालिक की कमाई रुक जाएगी. कमाई रुकेगी, तो वह क़र्ज़ की किस्त भी नहीं चुका पाएगा. इसके अलावा, HDB की लोन बुक का 26% हिस्सा बिना किसी गारंटी वाले क़र्ज़ों का था. इन क़र्ज़ों पर लिस्टिंग से पहले ही दबाव शुरू हो गया था. मार्च से हालात सुधरने लगे और जून तिमाही HDB के लिए अब तक की सबसे अच्छी तिमाही रही. कंपनी का टैक्स के बाद मुनाफ़ा 38% बढ़कर रिकॉर्ड ₹785 करोड़ हो गया. उसने पिछले साल के मुक़ाबले 16% ज़्यादा क़र्ज़ भी बांटा. लेकिन शेयर ने इस सुधार का साथ नहीं दिया.
लोन बुक बढ़ी, कमाई पीछे रह गई
चार साल के आंकड़े देखें, तो असली तस्वीर और साफ़ हो जाती है. FY23 से FY26 के बीच HDB की लोन बुक सालाना 19.2% की दर से बढ़ी. डूबने वाले क़र्ज़ों के लिए पैसा अलग रखने से पहले का ऑपरेटिंग मुनाफ़ा भी सालाना 16.1% बढ़ा. लेकिन टैक्स के बाद मुनाफ़ा केवल 9% सालाना बढ़ पाया. इसकी वजह यह थी कि इन चार साल में डूबने वाले क़र्ज़ों से जुड़ा ख़र्च लगातार बढ़ता रहा. यानी समस्या केवल FY26 में पैदा नहीं हुई थी.
क़र्ज़ बढ़ा, लेकिन रिटर्न नहीं
लोन बुक सालाना 19.2% बढ़ी, लेकिन मुनाफ़ा केवल 9% बढ़ा. AUM पर रिटर्न भी 2.8% से घटकर 2.1% रह गया
| फ़ाइनेंशियल पैरामीटर | FY23 | FY24 | FY25 | FY26 | FY23-FY26 CAGR (%) |
|---|---|---|---|---|---|
| लोन बुक (₹ करोड़) | 70,084 | 90,235 | 1,07,262 | 1,18,733 | 19.2 |
| डूबने वाले क़र्ज़ों के लिए पैसा अलग रखने से पहले ऑपरेटिंग मुनाफ़ा (₹ करोड़) | 3,958 | 4,372 | 5,041 | 6,201 | 16.1 |
| टैक्स के बाद मुनाफ़ा (₹ करोड़) | 1,959 | 2,461 | 2,176 | 2,544 | 9 |
| AUM पर रिटर्न (%) | 2.8 | 2.7 | 2 | 2.1 | - |
| Net Interest Margin (%) | 8.3 | 7.9 | 7.6 | 8 | - |
| NPA यानी ऐसा क़र्ज़ जिसकी किस्त समय पर नहीं चुकाई जा रही है. | |||||
FY26 तक नेट इंटरेस्ट मार्जिन सुधरकर 8% हो गया. इसका मतलब है कि क़र्ज़ देकर ब्याज कमाने की कंपनी की ताक़त अब भी बनी हुई है. समस्या वहां नहीं है. लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि कारोबार का आकार बढ़ने से कंपनी का ख़र्च कम हुआ है और रिटर्न बेहतर हुआ है. यहां हमने रिटर्न ऑन इक्विटी के बजाय AUM पर मिलने वाले रिटर्न को देखा है. इसकी वजह यह है कि IPO से आए नए पैसे ने कंपनी की इक्विटी बढ़ा दी थी. इससे रिटर्न ऑन इक्विटी देखने पर क़र्ज़ के कारोबार का असली प्रदर्शन कम दिखाई देता. AUM पर रिटर्न के हिसाब से HDB ने FY23 में 2.8% कमाया था, जो FY26 में घटकर 2.1% रह गया.
ग्रोथ है, लेकिन शेयर सस्ता नहीं
HDB का शेयर अपनी बुक वैल्यू के क़रीब तीन गुने पर कारोबार कर रहा है, जबकि इसका रिटर्न ऑन इक्विटी 14% से कम है. बाज़ार इस समय ऐसी कंपनी के लिए यह क़ीमत चुका रहा है जिसकी लोन बुक सालाना क़रीब 20% बढ़ रही है. इतने बड़े कारोबार वाली बहुत कम NBFC इतनी तेज़ी से बढ़ पाती हैं. लेकिन HDB के कई तरह के क़र्ज़ों पर अर्थव्यवस्था की तेज़ी और सुस्ती का सीधा असर पड़ता है. इसलिए बाज़ार इसे पूरी तरह तेज़ी से बढ़ने वाली कंपनी की क़ीमत भी नहीं दे रहा. फिलहाल HDB तेज़ी से बढ़ने वाली NBFC और एक सामान्य क़र्ज़ कंपनी के बीच खड़ी है.
दूसरी कंपनियों से तुलना करें, तो HDB की मौजूदा क़ीमत ठीक लगती है, लेकिन बहुत सस्ती नहीं. FY26 में HDB का AUM पर रिटर्न 2.1% था. यह Bajaj Finance के 4.3% और Cholamandalam के 2.5% से कम है. इन दोनों कंपनियों के शेयर अपनी बुक वैल्यू के क़रीब पांच गुने या उससे ज़्यादा पर कारोबार कर रहे हैं. HDB कमज़ोर और पूंजी की कमी से जूझ रही क़र्ज़ कंपनियों से काफ़ी बेहतर है. लेकिन वह अभी उन NBFC की कतार में नहीं पहुंची है जिनके शेयरों के लिए बाज़ार ज़्यादा क़ीमत देता है. वहां पहुंचने के लिए HDB को बाज़ार के अच्छे और बुरे, दोनों दौर में डूबने वाले क़र्ज़ों से होने वाला ख़र्च कम रखना होगा. केवल बाज़ार के अचानक ज़्यादा क़ीमत देने से यह दर्जा नहीं मिलेगा.
पहले साल के बाद हमारी राय
IPO के बाद शेयर में जितनी गिरावट आई, HDB का कारोबार उतना कमज़ोर नहीं दिखता. कंपनी के पास अब पहले से ज़्यादा पूंजी है और उसका कारोबार भी स्थिर है. HDFC Bank से जुड़ाव के कारण उसे पैसा जुटाने में आसानी होती है. उसके क़र्ज़ अलग-अलग तरह के कारोबारों और ग्राहकों में फैले हैं. देशभर में उसकी पहुंच भी मज़बूत है. लेकिन FY26 ने यह दिखा दिया कि अगर क़र्ज़ लेने वाले ग्राहकों के पास मुश्किल समय के लिए पैसा नहीं है, तो ये सभी खूबियां अपने आप कंपनी के रिटर्न को नहीं बचा सकतीं.
HDB को केवल बाज़ार की तेज़ी और सुस्ती पर चलने वाली एक सामान्य क़र्ज़ कंपनी कहना सही नहीं होगा. लेकिन इसे लगातार अच्छा रिटर्न देने वाली बेहतरीन NBFC कहना भी अभी जल्दबाज़ी होगी. कंपनी की अगली परीक्षा लोन बुक बढ़ाने की नहीं है. असली परीक्षा यह है कि वह इस बढ़त को लंबे समय तक बेहतर रिटर्न में बदल पाती है या नहीं. साथ ही, अगली बार मुश्किल दौर आने पर डूबने वाले क़र्ज़ों से जुड़ा ख़र्च फिर से नहीं बढ़ना चाहिए. अगर HDB इस परीक्षा में सफल होती है, तो बाज़ार के पास उसके शेयर की ज़्यादा क़ीमत लगाने की वजह होगी. अगर कंपनी दोबारा चूकती है, तो वह वही बनी रहेगी जो आज दिखती है. यानी एक ठीक कारोबार और मज़बूत फ़ंडिंग वाली क़र्ज़ कंपनी, जहां HDFC Bank से जुड़ाव बड़े नुक़सान की आशंका तो कम करता है, लेकिन अब तक निवेशकों को ज़्यादा रिटर्न नहीं दिला पाया है.
अगला बड़ा IPO आपको लुभाए, उससे पहले तीन सवाल ज़रूर पूछिए. कंपनी शेयर बाज़ार में लिस्ट क्यों हो रही है? IPO से जुटाया गया पैसा असल में कहां जाएगा? और आप किस तरह के कारोबार में पैसा लगा रहे हैं?
बड़े IPO के साथ अक्सर बड़ी-बड़ी कहानियां भी आती हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कंपनी का कारोबार, उसके शेयर की क़ीमत और शेयर बाज़ार में आने की वजह आपके पैसे लगाने के लिए सही हैं. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र IPO के शुरुआती शोर से आगे जाकर ऐसे कारोबार खोजता है जिन्हें लंबे समय तक अपने पास रखा जा सकता है. यह उन क़ीमतों को पहचानने में मदद करता है जिन पर शेयर ख़रीदना सही हो और उन मौक़ों को भी बताता है जब तेज़ी के पीछे भागने के बजाय इंतज़ार करना बेहतर होता है.
कहानी देखकर पैसा मत लगाइए. सही कारोबार को सही क़ीमत पर ख़रीदिए.
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