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सारांशः भारत का IPO बाज़ार ज़ोरों पर है, पर जुटाया गया ज़्यादातर पैसा कंपनियों के पास नहीं, बल्कि उनके पुराने शेयरहोल्डरों के पास जाता है. यह कहानी बताती है कि IPO का पैसा असल में जाता कहां है, सब्सक्रिप्शन के नंबर कैसे धोखा दे सकते हैं, और पैसा लगाने से पहले हर निवेशक को कौन से सवाल पूछने चाहिए.
मेनबोर्ड IPO (इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग) ने 2025 में क़रीब ₹1.76 लाख करोड़ जुटाए, जो कम से कम 2015 के बाद किसी एक साल में जुटाई गई सबसे बड़ी रक़म है. सिर्फ़ यह नंबर देखें, तो लगता है कि भारतीय कंपनियों ने बढ़ने के लिए इतना पैसा पहले कभी नहीं जुटाया. पर जब आप देखते हैं कि यह पैसा असल में जाता कहां है, तो कहानी कुछ और ही निकलती है: पिछले दस साल में इसका ज़्यादातर हिस्सा उन लोगों के पास गया जिनके पास पहले से शेयर थे, न कि ख़ुद कंपनी के काम आया.
मेनबोर्ड IPO की हलचल, 2015 से 2025
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साल
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मेनबोर्ड IPO की संख्या | जुटाई गई रक़म |
|---|---|---|
| 2015 | 21 | ₹13,600 करोड़ |
| 2016 | 26 | ₹26,500 करोड़ |
| 2017 | 36 | ₹66,900 करोड़ |
| 2018 | 24 | ₹31,100 करोड़ |
| 2019 | 16 | ₹12,400 करोड़ |
| 2020 | 15 | ₹26,600 करोड़ |
| 2021 | 63 | ₹1.19 लाख करोड़ |
| 2022 | 40 | ₹63,600 करोड़ |
| 2023 | 58 | ₹49,500 करोड़ |
| 2024 | 89 | ₹1.58 लाख करोड़ |
| 2025 | 104 | ₹1.76 लाख करोड़ |
| 2015 से 2025 (कुल) | 492 | ₹7.44 लाख करोड़ |
फ़्रेश इश्यू बनाम ऑफ़र फ़ॉर सेल
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दौर
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फ़्रेश इश्यू | ऑफ़र फ़ॉर सेल |
|---|---|---|
| 2015 से 2025 (11 साल का कुल) | 34% | 66% |
| 2025 | 37% | 63% |
फ़्रेश इश्यू में नए शेयर बनते हैं, और वो पैसा सीधे कंपनी के पास जाता है. वहीं ऑफ़र फ़ॉर सेल में पुराने शेयरहोल्डर अपने पहले से रखे शेयर बेचते हैं, फिर चाहे वो प्रमोटर हों, प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल वाले हों, या शुरुआत में पैसा लगाने वाले. इससे कंपनी को एक रुपया भी नहीं मिलता. 2015 के बाद ज़्यादातर सालों में मेनबोर्ड IPO के पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा यही ऑफ़र फ़ॉर सेल रहा है, और 2025 में रिकॉर्ड पैसा जुटने के बाद भी यह बात नहीं बदली.
किसी इश्यू का आकार देखने से पहले, यह चेक कीजिए कि उसका कितना हिस्सा असल में फ़्रेश इश्यू है. यह हर प्रॉस्पेक्टस के पहले ही पन्ने पर लिखा होता है, और ज़्यादातर निवेशक इसे कभी देखते ही नहीं.
फ़्रेश इश्यू भी अक्सर ग्रोथ कैपिटल नहीं होता
जो हिस्सा कंपनी के पास जाता भी है, उस पर भी एक बार ग़ौर करना ज़रूरी है. कंपनियां फ़्रेश इश्यू से जो पैसा जुटाती हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा उस तरह बढ़ने में नहीं लगता जैसा 'ग्रोथ' शब्द से लगता है, यानी नई मशीनों, नई क्षमता या फैलाव में. वो अक्सर पुराना कर्ज़ चुकाने में चला जाता है, कई बार तो नई चीज़ों पर ख़र्च से भी पहले. यानी हो सकता है कोई कंपनी नया पैसा जुटा तो ले, पर अपने कारोबार को बढ़ाने में कुछ ख़ास न लगाए; हो सकता है वो बस उधार के पैसे की जगह शेयरहोल्डरों का पैसा रख ले. इससे बैलेंस शीट मज़बूत ज़रूर होती है. पर यह नई फ़ैक्ट्री लगाने या नई दुकानें खोलने जैसा नहीं है, और IPO की ख़बरों में इन दोनों बातों को अक्सर अलग-अलग करके नहीं बताया जाता.
IPO की अर्ज़ी एक लॉटरी टिकट है
यह तुलना वैल्यू रिसर्च पहले भी कर चुका है, और डेटा भी इसे सही ठहराता है. जब कोई इश्यू ज़रूरत से कई गुना ज़्यादा भर जाता है, तो रिटेल निवेशकों को शेयर एक कंप्यूटर वाली लॉटरी से मिलते हैं. आपको शेयर इसलिए नहीं मिलते कि आपने क़ीमत सही आंकी थी, बल्कि इसलिए मिलते हैं कि आपकी अर्ज़ी निकल आई. और अर्ज़ी लगाने वाली भीड़ कितनी बड़ी है, इससे आपको यह बिल्कुल पता नहीं चलता कि आपके हाथ आख़िर क्या लगेगा.
सब्सक्रिप्शन बनाम लिस्टिंग वाले दिन का फ़ायदा, कुछ चुने हुए मेनबोर्ड IPO
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कंपनी
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सब्सक्रिप्शन | लिस्टिंग का फ़ायदा |
|---|---|---|
| Tarsons Products | 77 गुना | 5.70% |
| Krsnaa Diagnostics | 64 गुना | 7.40% |
| Akums Drugs | 64 गुना | 6.80% |
| Rashi Peripherals | 60 गुना | 7.70% |
| Innova Captab | 55 गुना | 1.80% |
| Credo Brands | 52 गुना | 0.70% |
| ASK Automotive | 51 गुना | 8.10% |
| Alivus Life Sciences | 44 गुना | 4.30% |
| Anupam Rasayan | 44 गुना | -3.70% |
| Deepak Builders | 42 गुना | -2.20% |
| Baazar Style Retail | 41 गुना | 0% |
ऊपर की सूची में 40 गुना से ज़्यादा भरी दो कंपनियों ने पहले ही दिन निवेशकों को घाटा दिया. उसी लॉटरी के पीछे भागती बड़ी भीड़ न तो आपके जीतने की उम्मीद बढ़ाती है, और न ही यह बताती है कि शेयर की क़ीमत सही लगाई गई है या नहीं. किसी IPO में सिर्फ़ इसलिए पैसा लगाना कि वो ख़ूब भरा हुआ है, ठीक वैसा ही है जैसे कोई टिकट सिर्फ़ इसलिए ख़रीद ले कि उसके आगे लंबी क़तार लगी है.
असल में जोख़िम कौन उठा रहा है
लिस्टिंग के वक़्त घाटे में, और FY25 में भी घाटे में
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लिस्टिंग का साल
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लिस्टिंग के वक़्त घाटे में | FY25 में भी घाटे में |
|---|---|---|
| 2015 | 16 में से 4 | 2 |
| 2016 | 24 में से 1 | 0 |
| 2017 | 35 में से 1 | 0 |
| 2018 | 22 में से 1 | 0 |
| 2019 | 16 में से 4 | 2 |
| 2020 | 15 में से 1 | 1 |
| 2021 | 63 में से 12 | 3 |
| 2022 | 39 में से 4 | 2 |
| 2023 | 58 में से 3 | 0 |
| 2024 | 89 में से 7 | 4 |
पूरे दशक को जोड़िए, तो 38 कंपनियां ऐसी थीं जो घाटा दिखाते हुए लिस्ट हुईं. FY25 तक, इनमें से 24, यानी क़रीब 10 में से 6, मुनाफ़े में आ चुकी थीं. बाक़ी 14 नहीं आ पाईं, कुछ मामलों में तो बाज़ार में आने के सालों बाद भी नहीं.
इससे एक बड़ी बात का पता चलता है, कि एक बिना परखे कारोबार का जोख़िम असल में कौन उठाता है, यह अब बदल रहा है. बाज़ार के ज़्यादातर इतिहास में, किसी कंपनी के घाटे वाले साल निजी हाथों में बीत जाते थे. वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी वाले निवेशक उस दौर में पैसा लगाते, उस पर क़रीब से नज़र रखते, और आमतौर पर तभी बाहर निकलते जब कारोबार ख़ुद को साबित करके मुनाफ़े में आ जाता, यानी जब जोख़िम काफ़ी कम हो चुका होता.
आम निवेशक बाद में आते थे, जब कारोबार परख लिया जाता था. पर आज की कई लिस्टिंग इसी क्रम को उल्टा कर रही हैं. घाटे वाला दौर अब अक्सर लिस्टिंग के बाद बीतता है, और उसे आम शेयरहोल्डरों के पैसे से चलाया जाता है. जबकि वो शुरुआती निजी निवेशक, यानी प्रमोटर, PE (प्राइवेट इक्विटी) और VC (वेंचर कैपिटल) वाले, अक्सर IPO पर या उसके तुरंत बाद ही ऑफ़र फ़ॉर सेल के ज़रिए निकल जाते हैं. जो जोख़िम पहले उन निवेशकों के पास रहता था जो उसे उठाने के लिए बने थे, यानी समझदार, फैले हुए और सब्र वाले, वो अब कई मामलों में आम निवेशक के कंधों पर आ गया है.
फिर भी अर्ज़ी लगाने का मन है? पहले यह चेकलिस्ट देख लीजिए
- कंपनी का मुनाफ़े और नक़दी का एक लंबा, परखा हुआ रिकॉर्ड हो, सिर्फ़ एक ग्रोथ की कहानी नहीं.
- उसकी क़ीमत, एक जमे-जमाए रिकॉर्ड वाली लिस्टेड कंपनियों के मुक़ाबले वाजिब हो.
- इश्यू का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा फ़्रेश पूंजी हो, जो सच में कारोबार में जा रही हो.
- IPO के बाद भी प्रमोटरों का अपना पैसा कारोबार में लगा रहे, कोई दिखावटी हिस्सा नहीं.
- आप ठीक-ठीक समझते हों कि कारोबार पैसा कैसे कमाता है और ग्राहक उसे पैसे क्यों देते हैं.
- वो ऐसी ताक़त दिखाए जो पूरे इंडस्ट्री साइकल में टिक सके, सिर्फ़ एक अच्छे दौर में नहीं.
- पहले पूंजी का इस्तेमाल समझदारी से हुआ हो और लंबे समय की वैल्यू बनाने के हिसाब से हुआ हो.
- बैलेंस शीट साफ़ और सधी हुई हो, बेवजह के वित्तीय हेर-फेर से मुक्त.
- गवर्नेंस हर पहलू पर खरी उतरे, जिसमें अपने ही लोगों के साथ किए गए सौदे भी शामिल हैं.
- आप उस कारोबार को सालों तक रखने को तैयार हों, न कि लिस्टिंग वाले दिन बेच देने को.
वैल्यू रिसर्च की राय
तीन बातें, और एक नतीजा. ज़्यादातर IPO का पैसा किसी के निकलने के काम आता है, कंपनी के नहीं. जो पैसा कंपनी तक पहुंचता भी है, वो ज़्यादातर उसकी बैलेंस शीट सुधारता है, उसे बढ़ाता नहीं. और जो कंपनियां लिस्ट हो रही हैं, उनका एक बढ़ता हिस्सा अभी ख़ुद को साबित ही कर रहा है, जबकि उनका जोख़िम अब आम शेयरहोल्डर उठा रहे हैं, वो जोख़िम जो पहले उन निजी निवेशकों के पास रहता था जो उसके लिए बने थे.
IPO की अर्ज़ी भले एक लॉटरी टिकट हो. पर अर्ज़ी निकलने के बाद आप उसका क्या करते हैं, वो लॉटरी होना ज़रूरी नहीं. उस कारोबार को ठीक वैसे ही परखिए, जैसे आप बाज़ार में पहले से मौजूद किसी भी शेयर को परखते हैं, और इश्यू के बाहर लगी लंबी क़तार को किसी और की चिंता रहने दीजिए.
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