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सारांशः मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स हाल में बेहतरीन प्रदर्शन करने वालों में शामिल रहे हैं, और इसकी वजह भारत की इंडस्ट्रियल बूम है. लेकिन क्या इससे यह लंबी अवधि का समझदार निवेश बन जाता है? यह स्टोरी हाल की तेज़ी से आगे बढ़कर देखती है कि इतिहास असल में क्या कहता है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बाज़ार के सबसे चमकते हिस्सों में से एक रहा है. 30 जून, 2026 तक के पिछले एक साल में निफ़्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स ने 12.5 प्रतिशत का रिटर्न दिया, जबकि निफ़्टी 500 फ़्लैट रहा. मैन्युफैक्चरिंग कैटेगरी के फ़ंड्स का मीडियन रिटर्न 11.5 प्रतिशत रहा, जिससे यह कैटेगरी साल के सबसे अच्छे प्रदर्शन करने वालों में शामिल हो गई.
यह उत्साह बेवजह नहीं है. भारत में कैपिटल एक्सपेंडिचर में तेज़ी आ रही है, डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के पास कई साल के ऑर्डर पहले से हैं और ग्लोबल सप्लाई चेन चीन से हटकर भारत की ओर आ रही है.
लेकिन कोई कहानी दिलचस्प होने भर से वह एक अच्छा निवेश नहीं बन जाती.
यह कैटेगरी अपने आप में बहुत छोटी है. इसके 12 एक्टिव फ़ंड और सात पैसिव फ़ंड मिलकर सिर्फ़ ₹33,255 करोड़ मैनेज करते हैं, जो इक्विटी फ़ंड एसेट्स का 1 प्रतिशत से भी कम है. इससे भी अहम बात यह है कि 12 में से नौ एक्टिव फ़ंड 2023 या 2024 में ही लॉन्च हुए थे, यानी उसी तेज़ी के दौरान जिसका हवाला देकर आज इन्हें बेचा जा रहा है.
तो असली सवाल यह नहीं है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी आकर्षक है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या किसी मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड को आपके पोर्टफ़ोलियो में जगह मिलनी चाहिए.
आपके पास पहले से यह थीम हो सकती है
ज़्यादातर निवेशकों के पास बिना कोई थीमैटिक फ़ंड ख़रीदे भी मैन्युफैक्चरिंग में अच्छा-ख़ासा एक्सपोज़र पहले से मौजूद है.
निफ़्टी 500 का क़रीब 35 प्रतिशत हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी इंडस्ट्रीज़ में लगा है, जिसमें ऑयल एंड गैस (6 प्रतिशत), फ़ार्मास्युटिकल्स (5.3 प्रतिशत), मशीनरी एंड इक्विपमेंट (4.9 प्रतिशत), ऑटोमोबाइल (4.8 प्रतिशत) और मेटल्स एंड माइनिंग (2.6 प्रतिशत) शामिल हैं. अगर आपके पास निफ़्टी 500 इंडेक्स फ़ंड या कोई डाइवर्सिफ़ाइड इक्विटी फ़ंड है, तो आप पहले से ही भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी का हिस्सा हैं.
मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड यह एक्सपोज़र दो तरह से बदल देता है. यह मैन्युफैक्चरिंग को पोर्टफ़ोलियो के क़रीब एक-तिहाई हिस्से से बढ़ाकर लगभग पूरे पोर्टफ़ोलियो तक ले जाता है और साथ ही फ़ाइनेंशियल्स को लगभग हटा देता है, जो बाज़ार का सबसे बड़ा सेक्टर है.
यह कंसंट्रेशन जान-बूझकर किया जाता है. यही सबसे बड़ा जोख़िम भी है.
नाम असली पोर्टफ़ोलियो छुपा देता है
तो मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स आपके पहले से मौजूद डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड्स से कितने अलग हैं? इसका जवाब सिर्फ़ नाम से पता नहीं चलता. यह समझने के लिए कि आप असल में क्या ख़रीद रहे हैं, आपको नाम से आगे, यहां तक कि बेंचमार्क से भी आगे देखना होगा.
बेंचमार्क सिर्फ़ आधी कहानी बताता है.
सभी एक्टिव मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स निफ़्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स को अपना बेंचमार्क मानते हैं. काग़ज़ पर यह ज़्यादातर लार्ज-कैप इंडेक्स है, जिसमें क़रीब 71 प्रतिशत लार्ज कैप में और सिर्फ़ 3 प्रतिशत स्मॉल कैप में लगा है, क्योंकि यह टॉप 300 लिस्टेड कंपनियों में से चुना जाता है.
लेकिन फ़ंड्स ख़ुद बिल्कुल अलग दिखते हैं.
इनका स्मॉल-कैप एक्सपोज़र 18 से 49 प्रतिशत के बीच है, यानी बेंचमार्क के मुक़ाबले छह से 16 गुना ज़्यादा. असल में, ज़्यादातर मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स उस इंडेक्स की तुलना में मल्टी-कैप फ़ंड्स की तरह ज़्यादा बर्ताव करते हैं, जिसे वे आधिकारिक तौर पर ट्रैक करते हैं. यह बेहतर ढंग से दिखाता है कि इन फ़ंड्स के पास असल में क्या है और यह एक ज़्यादा असल तस्वीर पेश करता है कि उनके बनने से पहले मार्केट साइकल में उन्होंने कैसा प्रदर्शन किया होता.
रिटर्न असली हैं, लेकिन हाल का इतिहास इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है
हाल के आंकड़े बेशक शानदार हैं.
जनवरी 2023 से अब तक ख़त्म हुई हर रोलिंग तीन-साल अवधि में इस इंडेक्स ने निफ़्टी 500 को पीछे छोड़ा है, जिसमें सालाना मीडियन रिटर्न 23.6 प्रतिशत रहा है. सिर्फ़ इस सबूत को देखें, तो मैन्युफैक्चरिंग एक आसान चुनाव लगता है.

लेकिन लंबा इतिहास एक ज़्यादा संतुलित कहानी बताता है.
अप्रैल 2005 से अब तक हर रोलिंग तीन-साल अवधि में मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स ने निफ़्टी 500 को सिर्फ़ 1.9 प्रतिशत पॉइंट सालाना के मीडियन से पीछे छोड़ा है. और यह मामूली अतिरिक्त रिटर्न कहीं ज़्यादा जोख़िम के साथ आया है. इंडेक्स 13.6 प्रतिशत बार तीन-साल की अवधि नुक़सान में ख़त्म करता है, जबकि निफ़्टी 500 के साथ ऐसा सिर्फ़ 6.3 प्रतिशत बार हुआ है.
जब आप बाज़ार के अलग-अलग दौर देखते हैं, तो तस्वीर और भी बदल जाती है. 2018 से 2022 के बीच, यानी मौजूदा मैन्युफैक्चरिंग रैली के शुरू होने से पहले, यह इंडेक्स हर पांच में से सिर्फ़ एक रोलिंग तीन-साल अवधि में निफ़्टी 500 से बेहतर रहा. लेकिन पिछले तीन सालों में इसने हर बार बाज़ी मारी है.
सबक़ साफ़ है. मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स ने हाल में शानदार रिटर्न दिए हैं, लेकिन इनका ज़्यादातर आकर्षण इस बात से जुड़ा है कि हम मार्केट साइकल के किस दौर में हैं, न कि किसी टिकाऊ बढ़त से.
गिरावट, एंट्री की क़ीमत है
मैन्युफैक्चरिंग एक साइक्लिकल दांव है. जब कैपिटल स्पेंडिंग और इंडस्ट्रियल एक्टिविटी बढ़ती है, तब यह फलता-फूलता है, लेकिन जब साइकल पलटता है, तो यही ताक़तें उल्टी दिशा में काम करने लगती हैं.
अप्रैल 2005 से अब तक मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स सात बार 15 प्रतिशत से ज़्यादा गिर चुका है. हर बार यह गिरावट कम से कम उतनी ही रही जितनी बड़े बाज़ार में हुई, और अक्सर उससे ज़्यादा.
2008 की फ़ाइनेंशियल क्राइसिस इसका सबसे बुरा उदाहरण था. उस दौरान मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स 66 प्रतिशत गिरा, जबकि निफ़्टी 500 में 63 प्रतिशत की गिरावट आई. जनवरी 2018 से कोविड के लो तक का दौर भी लगभग उतना ही तकलीफ़देह रहा, क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स कोविड के बाद की रैली तक अपने पुराने ऑल-टाइम हाई को छू ही नहीं पाया. इस दौरान इंडेक्स 48 प्रतिशत गिरा, जबकि निफ़्टी 500 में 32 प्रतिशत की गिरावट आई.
दोनों बार रिकवरी में वक़्त लगा. पहली बार पुराने पीक तक पहुंचने में क़रीब दो साल लगे, जबकि दूसरी बार क़रीब तीन साल.
आज के फ़ंड्स का अनुभव इससे भी ज़्यादा उतार-चढ़ाव भरा हो सकता है. क्योंकि ज़्यादातर एक्टिव मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स बेंचमार्क के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मिड और स्मॉल-कैप स्टॉक्स रखते हैं, इनके पोर्टफ़ोलियो मल्टीकैप मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स जैसे दिखते हैं, जिसमें दोनों दौर में इससे भी गहरी गिरावट देखी गई.

अगर आप किसी तय तारीख़ वाले गोल के लिए निवेश कर रहे हैं, जैसे बच्चे की पढ़ाई या घर ख़रीदना, तो यह वह जोख़िम नहीं है जो आपको अपने पोर्टफ़ोलियो के बड़े हिस्से के साथ लेना चाहिए.
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फिर भी लेना है, तो क्या देखें
मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड्स में से किसी एक को चुनना आसान नहीं है. 12 एक्टिव फ़ंड्स में से सिर्फ़ तीन ने तीन साल पूरे किए हैं, इसलिए परखने के लिए बहुत कम परफ़ॉर्मेंस हिस्ट्री बची है.
इसकी बजाय, दो ख़ासियतों पर ध्यान दें.
पहली है फ़ंड का मिड और स्मॉल-कैप स्टॉक्स में एलोकेशन. यह एक्सिस में क़रीब 40 प्रतिशत से लेकर LIC में लगभग 66 प्रतिशत तक जाता है (30 जून, 2026 तक के छह महीनों की मीडियन होल्डिंग). एलोकेशन जितना ज़्यादा होगा, मुनाफ़े की संभावना उतनी ही ज़्यादा होगी, लेकिन गिरावट भी उतनी ही तेज़ होगी.
दूसरी है कंसंट्रेशन. कुछ फ़ंड्स अपना दांव दर्जनों स्टॉक्स में फैलाते हैं, जबकि कुछ सिर्फ़ मुट्ठीभर स्टॉक्स ही रखते हैं. आदित्य बिरला के पोर्टफ़ोलियो में टॉप-10 होल्डिंग्स सिर्फ़ 28.8 प्रतिशत हैं, जबकि क्वांट में यह 78.8 प्रतिशत तक पहुंच जाती हैं, जो सिर्फ़ 16 स्टॉक्स रखता है.
ये दो पैमाने किसी फ़ंड के जोख़िम के बारे में उसके हाल के रिटर्न से कहीं ज़्यादा बताते हैं.

तो क्या आपको ख़रीदना चाहिए?
ज़्यादातर निवेशकों के लिए जवाब है- शायद नहीं.
लंबी अवधि में भी तस्वीर उतनी मज़बूत नहीं दिखती, जितनी हाल का प्रदर्शन बताता है. अप्रैल 2005 से अब तक हर रोलिंग पांच-साल की अवधि में मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स सिर्फ़ 54 प्रतिशत बार ही निफ़्टी 500 से बेहतर रहा है, यानी नतीजा लगभग 50-50 जैसा ही रहा. और जब यह निफ़्टी 500 से पीछे रहा, तो अंतर अक्सर काफ़ी बड़ा था.
भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ में हिस्सा लेने के लिए आपको किसी थीमैटिक फ़ंड की ज़रूरत भी नहीं है. एक ब्रॉड-मार्केट फ़ंड पहले से ही अपने पोर्टफ़ोलियो का क़रीब एक-तिहाई हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कारोबार में लगाता है, जिससे आपको बिना किसी एक थीम में पोर्टफ़ोलियो को कंसंट्रेटेड किए, अच्छा-ख़ासा एक्सपोज़र मिल जाता है.
एक्टिव फ़ंड्स के मामले में यह पक्ष और भी कमज़ोर हो जाता है. ज़्यादातर फ़ंड्स परखने के लिए बहुत नए हैं, और इनके पोर्टफ़ोलियो मिड और स्मॉल-कैप स्टॉक्स के एक्सपोज़र और कंसंट्रेशन के मामले में एक-दूसरे से काफ़ी अलग हैं.
मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड रखने की एक ही ठोस वजह हो सकती है, यह भरोसा कि भारत की इंडस्ट्रियल साइकिल आने वाले सालों तक बेहतर प्रदर्शन करती रहेगी और जब ऐसा न हो तब गहरी गिरावट झेलने के लिए तैयार रहना होगा.
अगर यह बात आप पर लागू होती है, तो एलोकेशन सीमित रखें, अपने इक्विटी पोर्टफ़ोलियो के 10 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं और आने वाली गिरावटों के दौरान निवेशित बने रहने के लिए तैयार रहें. बाक़ी सबके लिए, इस थीम को छोड़ देना कोई मौक़ा गंवाना नहीं है. यह एक अच्छी तरह डाइवर्सिफ़ाइड निवेश योजना पर टिके रहना है.
मुश्क़िल फ़ैसला यह नहीं है कि मैन्युफैक्चरिंग एक उम्मीद जगाने वाली थीम है या नहीं. मुश्क़िल फ़ैसला यह है कि क्या कोई मैन्युफैक्चरिंग फ़ंड आपके पोर्टफ़ोलियो में जोड़ने लायक़ है, या आपको पहले से मौजूद फ़ंड्स से ही पर्याप्त एक्सपोज़र मिल रहा है. Fund Advisor आपको इस सवाल का जवाब आपके पूरे पोर्टफ़ोलियो के संदर्भ में देने में मदद करता है, ताकि हर नया निवेश किसी साफ़ मक़सद के साथ हो, न कि सिर्फ़ बाज़ार के ताज़ा ट्रेंड को फ़ॉलो करते हुए.
जानिए, आपके पोर्टफ़ोलियो में क्या होना चाहिए.
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