Anand Kumar/AI-Generated Image
आजकल जिससे भी मिलता हूं, वो एक ही सवाल पूछता है, क्या AI एक बबल है? मैंने अपने मिंट के कॉलम में इस पर लिखा था और मेरा जवाब सुनकर लोग अक्सर निराश हो जाते हैं, क्योंकि सच यह है कि यह सवाल पूछने लायक ही नहीं है. चलिए बताता हूं क्यों.
1990 के दशक के आख़िर में, तब तक मैं पैसों के बारे में लिखते हुए कई साल गुज़ार चुका था, और मेरे आस-पास लगभग हर कोई यह मानता था कि इंटरनेट दुनिया बदल देगा. लेकिन जो बात किसी को नहीं दिखी, वह यह थी कि इस सोच का सही होना अपनी बचत लगाने के लिए किसी काम का नहीं था, क्योंकि इंटरनेट से जुड़ी कंपनियों की क़ीमत ऐसे तय हो रही थी जैसे पूरा भविष्य पहले ही आ गया हो और उसका पैसा भी चुका दिया गया हो. जब 2000 में ये स्टॉक्स गिरे, तो इंटरनेट उनके साथ नहीं गिरा, लोग इसे पहले से भी ज़्यादा इस्तेमाल करने लगे और जो कंपनियां असल में मतलब रखती थीं, वे बढ़ती रहीं. सोच सही थी, लेकिन क़ीमतें ग़लत थीं और इन दोनों के बीच की खाई पाटी नहीं जा सकती थी.
मुझे फ्रांस्वा शोले की एक X पोस्ट पढ़कर यह खाई फिर से याद आई, जो शक करने वालों में सबसे कम गिने जाने वाले शख़्स हैं. शोले ने AI सिस्टम बनाने के लिए एक बहुत इस्तेमाल होने वाला फ्रेमवर्क Keras बनाया है, उन्होंने वह बेंचमार्क बनाया जिससे पूरी इंडस्ट्री यह मापती है कि वह सही मशीन इंटेलिजेंस के कितने क़रीब पहुंची है, इस विषय पर एक जानी-मानी किताब लिखी है और अब अपनी ख़ुद की रिसर्च लैब चलाते हैं. शायद ही कोई होगा जो इनसे ज़्यादा टेक्नोलॉजी पर भरोसा करता हो. यही वजह है कि उनकी बात सुनने लायक है. उनका कहना है कि कोई चीज़ बबल हो सकती है, भले ही टेक्नोलॉजी पूरी तरह काम करे, भले ही उसके ग्राहक बेताब हों, भले ही वह पहले से पैसा कमा रही हो, और भले ही आगे उसकी मांग की कोई सीमा न हो. बबल बनने के लिए बस यह ज़रूरी है कि बहुत सारे लोग किसी चीज़ पर ज़रूरत से ज़्यादा जोश में दांव लगा दें और फिर किसी मौक़े पर एक साथ डर जाएं.
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जो बात याद रखने लायक है, वह शोले ने जैसे चलते-चलते कह दीः बबल टेक्नोलॉजी की कोई ख़ासियत नहीं है. यह उन लोगों की ख़ासियत है जो ख़रीद रहे हैं. 19वीं सदी में रेलवे असली भी थी और बबल भी, और जब हम कहते हैं कि कोई बबल फूट गया, तो हम सिर्फ़ यह कह रहे होते हैं कि क़ीमतें गिर गईं और पैसा डर गया. हम ख़ुद भी इसकी रिहर्सल कर चुके हैं, जब 2000 में टेक्नोलॉजी स्टॉक्स गिरे, तो उनमें शामिल बेहतर भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां असल में मज़बूत कारोबार थीं, जो आगे भी दो दशकों तक बढ़ती रहीं, फिर भी उनके शेयरों ने अपनी ज़्यादातर क़ीमत गंवा दी और उन्हें फिर से उठने में सालों लग गए. कुछ साल बाद, 2008 की गिरावट से पहले, यही बारी इन्फ्रास्ट्रक्चर, पावर और प्रॉपर्टी की थी. यहां बबल उस ज़रूरत में नहीं था, बबल क़ीमतों में था और इस बात में भी कि इस सेक्टर में हिस्सेदारी बेचने के नाम पर बेची जा रही कई कंपनियां असल में सिर्फ़ प्रोमोशन थीं, जिन्हें कारोबार का रूप दे दिया गया था.
इसका मतलब यह है कि आज हर कोई जो सवाल पूछ रहा है कि क्या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक बबल है, उसका जवाब पहले से नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह लाखों घबराए हुए अनजान लोगों के आगे के बर्ताव पर निर्भर करता है. जो लोग इसे बना रहे हैं, जो इसे किसी भी टिप्पणीकार से बेहतर समझते हैं, वे भी आपको यह नहीं बता सकते, और इसका फ़ैसला जब भी आएगा, वह सिर्फ़ पीछे मुड़कर देखने पर ही दिखेगा.
इसीलिए, मेरा मानना है कि यह सवाल न आपको सुलझाना है, न मुझे. जो निवेशक समझदारी के साथ डाइवर्सिफ़ाइड है, जो अपने परिवार का भविष्य किसी एक कहानी पर नहीं लगा रहा, और जो हर दिन की सुर्खियों पर ट्रेडिंग नहीं कर रहा, उसे इस बात की फ़िक्र करने की ज़रूरत ही नहीं है कि यह ड्रामा कैसे ख़त्म होता है. अगर तेज़ी जारी रहती है, तो ऐसा निवेशक उसका हिस्सा बनता है और अगर यह किसी हादसे में ख़त्म होता है, तो नुक़सान संभालने लायक और झेलने लायक रहता है.
अगर इस पूरी कहानी में कहीं कोई बबल है, तो वह टेक्नोलॉजी में नहीं है और वैल्यूएशन में भी नहीं है. वह बबल आप में है, इस लालच में कि आप ज़रूरत से ज़्यादा दांव लगा दें क्योंकि आपके आस-पास सबका पैसा बढ़ रहा है और उस घबराहट में जो तब आएगी जब माहौल पलटेगा. यही एक चीज़ है जिस पर आपका पूरा नियंत्रण है और अच्छी बात यह है कि यही एक चीज़ है जो असल में मायने रखती है.
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