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सारांशः DOMS Industries आपकी रोज़ की स्टेशनरी बेचती है. पर इसका शेयर कमाई के क़रीब 60 गुना पर क्यों बिक रहा है? हम उन वजहों को देखते हैं जिन्होंने इस शेयर को प्रीमियम वैल्यूएशन दिलाया और यह भी कि बाज़ार इसके लिए ज़्यादा क़ीमत देने को क्यों तैयार है.
ज़्यादातर IPO (इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग) की कहानियां जोश से शुरू होती हैं. सब्सक्रिप्शन, लिस्टिंग वाले दिन की कमाई, जो कहिए. पर हल्ला थमते ही हक़ीक़त अक्सर फीकी निकलती है.
FY22 और FY25 के बीच मेनबोर्ड IPO पर हमारी रिसर्च में, क़रीब 48% ने लिस्टिंग के छह महीने के भीतर नेगेटिव रिटर्न दिया, जबकि 52% एक साल बाद भी घाटे में रहे. यहीं से आमतौर पर मायूसी शुरू होती है.
पर एक कंपनी इसका अपवाद रही है: DOMS Industries. यह पेंसिल, रबड़, शार्पनर, ज्योमेट्री बॉक्स, स्कूल बैग, कॉपियां और बच्चों की हाइजीन से जुड़ी चीज़ें बेचती है. इसीलिए इसकी कमाई के 60 गुना वाली प्रीमियम वैल्यूएशन और भी हैरान करती है, क्योंकि इसकी जैसी कंपनियां Flair और Linc कहीं कम, यानी कमाई के 20 गुना और 18 गुना पर बिकती हैं.
आइए जानें कि यह स्टेशनरी बेचने वाली कंपनी मुक़ाबले में अलग क्यों दिखती है और बाज़ार इसके शेयर के लिए प्रीमियम देने को क्यों तैयार है.
सप्लायर से चुनौती देने वाले तक
DOMS जब आई, तो भारत का पेंसिल बाज़ार ख़ाली नहीं था. 1958 में बनी Hindustan Pencils ने Nataraj और Apsara को घर-घर का नाम बना दिया था. सालों तक स्टेशनरी ख़रीदने का फ़ैसला मां-बाप का होता था. मां-बाप वही ख़रीदते थे जिस पर भरोसा था.
DOMS मैन्युफ़ैक्चरिंग के रास्ते आई. इसकी जड़ें कई दशक पुरानी हैं, पर ब्रांड बाद में दिखना शुरू हुआ. ट्रेडमार्क 2000 के दशक के बीच में रजिस्टर हुआ और 2012 में इटली की FILA साझेदार बनी, जिसने दुनिया के बाज़ारों तक पहुंच और R&D में मदद की.
DOMS यह कहकर नहीं जीती कि "हम भी पेंसिल बनाते हैं." उसने बस आम चीज़ों को ज़्यादा आकर्षक बना दिया: तिकोनी और धारीदार पेंसिल, नियॉन पेंसिल, पॉलिमर पेंसिल, बंडल वाली किट. कम क़ीमत वाली कैटेगरी में छोटे-छोटे सुधार मायने रखते हैं. एक पेंसिल को बस ज़्यादा चिकना, ज़्यादा चमकीला या बच्चे के मन को भाने वाला होना होता है.
यह इसलिए काम कर गया क्योंकि ख़रीदने वालों का बर्ताव बदल रहा था. पहले आख़िरी फ़ैसला मां-बाप का होता था. समय के साथ बच्चे ख़रीदारी के फ़ैसलों में ज़्यादा शामिल होने लगे और किसी ख़ास ब्रांड की ज़िद करता एक बच्चा यह बदल सकता है कि दुकानदार क्या रखेगा.
DOMS ने भारतीय बाज़ार को कैसे जीता
FY23 तक DOMS भारत के ब्रांडेड स्टेशनरी और आर्ट-प्रोडक्ट बाज़ार की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बन चुकी थी, क़ीमत के हिसाब से क़रीब 12% हिस्सेदारी के साथ. अपनी मुख्य कैटेगरियों में इसकी पकड़ और मज़बूत थी: पेंसिल में क़रीब 29% और ज्योमेट्री बॉक्स में 30%.
यह ग्रोथ पेंसिल के कारोबार में सबसे साफ़ दिखती है, जहां लंबे समय के आंकड़े मौजूद हैं. भले ही, FY15 का कैटेगरी-वाइज़ डेटा सार्वजनिक नहीं है, लेकिन DOMS की पेंसिल बिक्री FY16 के क़रीब ₹204 करोड़ से बढ़कर FY23 में ₹439 करोड़ हो गई, यानी सालाना क़रीब 12% ग्रोथ रही. बाज़ार के अनुमानित आकार के हिसाब से, FY16 के आसपास DOMS की पेंसिल बाज़ार में क़रीब 20 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, जो FY23 तक 29% हो गई.
रास्ता यहीं ख़त्म नहीं होता. अपनी Q3 FY26 कॉल पर मैनेजमेंट ने कहा कि वो बाज़ार की रिपोर्टों पर बारीकी से नज़र नहीं रखता, पर यह मानना ठीक होगा कि DOMS की अब पेंसिल में 35% से ज़्यादा हिस्सेदारी है और नई क्षमता के साथ यह 45% के क़रीब पहुंच सकती है. यह कंपनी का अपना अनुमान है, कोई स्वतंत्र पैमाना नहीं, इसलिए इसे तथ्य नहीं, भरोसे का बयान मानकर पढ़िए. हालांकि, दिशा साफ़ है.
यह कहानी कभी सिर्फ़ पेंसिल की थी भी नहीं. FY21 और FY23 के बीच, ज्योमेट्री बॉक्स, क्रेयॉन, स्केच और मार्कर पेन, रबड़ और कॉपियों की बिक्री तेज़ी से बढ़ी. FY25 तक, स्कूल वाली स्टेशनरी कुल प्रोडक्ट बिक्री का क़रीब 37% और स्कूल वाला आर्ट मटीरियल क़रीब 22% देने लगा. ऑफ़िस की चीज़ें, काग़ज़ की स्टेशनरी, किट, कॉम्बो और हाइजीन प्रोडक्ट बढ़त की अगली परत बने. स्कूल का कारोबार आधार बना रहा, पर अब यह सिर्फ़ पेंसिल की कहानी नहीं थी.
बदलता वक़्त
DOMS का तरीक़ा है दुकानदार की शेल्फ़ पर ज़्यादा जगह जीतना. अगर इसकी पेंसिलें अच्छी बिकती हैं, तो दुकानदार इसकी रबड़ रखने को ज़्यादा तैयार होता है. वो चलीं, तो रंग, ज्योमेट्री बॉक्स, किट और काग़ज़ की चीज़ें पीछे-पीछे आती हैं. यही घूमता पहिया है: हर दुकान पर ज़्यादा SKU (स्टॉक-कीपिंग यूनिट, यानी अलग-अलग प्रोडक्ट), ज़्यादा शेल्फ़ की जगह, बच्चों में ज़्यादा पहचान और दुकानदारों में ज़्यादा भरोसा.
इसीलिए सिर्फ़ दुकानों की गिनती धोखा दे सकती है. FY25 तक DOMS के पास 5,600 से ज़्यादा डिस्ट्रीब्यूटर और 1.45 लाख से ज़्यादा दुकानदार थे, फिर भी Flair और Linc इससे बड़े नेटवर्क बताती हैं. DOMS की बढ़त नेटवर्क का आकार नहीं है. बढ़त यह है कि इसका ब्रांड, प्रोडक्ट की टोकरी, मैन्युफ़ैक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूशन, सब एक ही ग्राहक के इर्द-गिर्द बने हैं: स्कूल जाता बच्चा.
स्पष्ट रूप से कहें, तो इसकी बढ़त अनोखापन नहीं, एक सीध में होना है. यह पेंसिल सप्लायर से पेंसिल में चुनौती देने वाली और फिर स्कूल की पूरी खपत पर आधारित ब्रांड तक पहुंची.
वैल्यूएशन का एनालेसिस
यहीं कहानी अपनी क़ीमत से टकराती है. DOMS ने FY26 में 21.6% की ग्रोथ के साथ ₹2,326 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया, पर PAT (टैक्स के बाद मुनाफ़ा) सिर्फ़ 12.2% बढ़कर ₹240 करोड़ रहा. मुनाफ़े में सिर्फ़ 12-13% की बढ़त के साथ, 60 गुने का अर्निंग मल्टीपल सही नहीं लगता. बाज़ार यह मानकर चल रहा है कि नई क्षमता चालू होने और नई कैटेगरीज के बड़े होने के साथ PAT की बढ़त फिर रफ़्तार पकड़ेगी.
क्षमता असली है. DOMS ने FY26 में कैपेक्स पर क़रीब ₹292 करोड़ ख़र्च किए, और इसके बड़े विस्तार प्रोजेक्ट को ₹850-1,000 करोड़ चाहिए हो सकते हैं. क़रीब 2 गुना के एसेट टर्नओवर पर, जो इसके मौजूदा कारोबार जैसा ही है, यह मैच्योर होने पर ₹1,700-2,000 करोड़ की अतिरिक्त आमदनी दे सकता है. पर 'मैच्योरिटी' ही असली शब्द है. यह अगले साल की आमदनी नहीं है. यह कई सालों में काम कर दिखाने की एक संभावना है.
आख़िरी बात
DOMS ने आम चीज़ों को क़ीमती दिखा दिया है. पर एक भरोसेमंद ब्रांड, जो साल-दर-साल उसी दुकानदार के ज़रिए उसी बच्चे को ऐसी कई चीज़ें बेच सके, वो आम नहीं होता.
बड़ा सबक़ यह है: प्रीमियम वैल्यूएशन बीती हुई बढ़त के लिए नहीं दी जाती. वो बाज़ार के इस भरोसे के लिए दी जाती है कि बीता हुआ तो सिर्फ़ शुरुआत थी.
वो भरोसा आज की क़ीमत में झलक रहा है. और कमाई के क़रीब 60 गुना पर, यह क़ीमत DOMS से सब कुछ एक साथ करते रहने की मांग करती है: इंडस्ट्री से तेज़ बढ़ो, मार्जिन बचाओ, नई कैटेगरी बड़ी करो और बड़ी कंपनियों को रोके रखो. हो सकता है DOMS प्रीमियम की हक़दार हो. पर इस क़ीमत पर, कहानी में ग़लती की गुंजाइश बहुत कम बची है.
क्या आपको DOMS Industries में निवेश करना चाहिए?
DOMS Industries काग़ज़ पर शानदार दिखती है और अपनी ज़्यादा वैल्युएशन को कुछ हद तक सही ठहराती है. पर किसी शेयर में निवेश वैल्यूएशन से आगे की बात है और इसके लिए कंपनी के वित्त, मैनेजमेंट और ट्रैक रिकॉर्ड की गहरी समझ चाहिए. और यहीं वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र काम आता है. यह कारोबारों की गहरी पड़ताल देता है, और एक्सपर्ट की अगुवाई वाली सलाह कि कोई शेयर आपकी अगली ख़रीद के लायक़ है या नहीं.
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