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सारांशः अगस्त के आख़िरी दिनों की एक दोपहर में स्क्रीन पर सेंसेक्स पांच मिनट में 2,200 अंक गिरता दिखा और फिर उसका ज़्यादातर हिस्सा वापस चढ़ गया. पर किसी एक्सचेंज के रिकॉर्ड में वो गिरावट है ही नहीं. उस वक़्त कोई सौदा हो ही नहीं रहा था. तो स्क्रीन पर दिख क्या रहा था और SEBI ने अब उस पर एक पेपर क्यों लिखा है, अजीब बात यही है.
27 अगस्त को दोपहर 3:18 बजे, सेंसेक्स के शेयरों का कैश मार्केट तीन मिनट से बंद पड़ा था. ऑर्डर एक ऑक्शन बुक में जमा हो रहे थे. और कोई सौदा नहीं हो रहा था.
फिर भी स्क्रीन चल रही थीं. उन पर सेंसेक्स पांच मिनट के अंदर 2,200 अंक गिरता दिखा और फिर उसका ज़्यादातर हिस्सा वापस चढ़ गया. उसी दिन एक्सपायर होने वाला 65,000 का बैंकेक्स पुट ₹6 से उछलकर क़रीब ₹1,000 पर चला गया. सेंसेक्स 539 अंक गिरकर 76,933.59 पर बंद हुआ.
वो 2,200 अंक की गिरावट पिछले छह हफ़्तों का सबसे ज़्यादा दोहराया गया आंकड़ा है और BSE के किसी रिकॉर्ड में वो मौजूद नहीं है. जो गिरा, वो कोई ऐसा इंडेक्स था ही नहीं जिसमें किसी ने कभी सौदा किया हो. और हाल में SEBI ने जो पेपर जारी किया है, उसमें यही बात मानी गई है.
आख़िर यह क्लोजिंग ऑक्शन है क्या?
3 अगस्त तक किसी शेयर का क्लोजिंग प्राइस उसके आख़िरी 30 मिनट के सौदों का औसत होता था. और उसमें बड़े सौदों का वज़न ज़्यादा रहता था. यानी 3:25 के आसपास आए कुछ बड़े ऑर्डर उस औसत को हिला सकते थे. अब यह इंडेक्स फ़ंड के लिए दिक़्क़त की बात थी, क्योंकि उन्हें अपने सौदे बाज़ार बंद होते वक़्त ही करने पड़ते हैं, ताकि उनका भाव इंडेक्स के क्लोजिंग प्राइस से मेल खाए. और उन्हें वही हिला हुआ भाव मिलता था.
तो SEBI ने वही किया जो न्यूयॉर्क, टोक्यो और हॉन्ग कॉन्ग करते हैं. F&O वाले शेयरों में अब कारोबार अपराह्न 3.15 बजे रुक जाता है. उसके बाद 10 मिनट तक कोई सौदा नहीं होता, बस ऑर्डर एक बुक में जमा होते रहते हैं और वो भी एक तय भाव के 3% के अंदर. फिर एक्सचेंज उन सारे ऑर्डर को देखकर वो एक भाव निकालता है, जिस पर सबसे ज़्यादा शेयर ख़रीदे-बेचे जा सकें. सारे सौदे उसी एक भाव पर एक साथ हो जाते हैं और वही उस दिन का क्लोजिंग प्राइस बन जाता है. और इस पूरे वक़्त डेरिवेटिव का बाज़ार 3:40 तक चलता रहता है.
तो फिर गड़बड़ कहां हुई?
ऑक्शन ने अपना काम ठीक किया. 31 अगस्त को, जो MSCI के लिए रिव्यू का दिन था, इंडेक्स फ़ंड ने NSE के ऑक्शन से ₹39,718 करोड़ का कारोबार किया, जो उस दिन के पूरे कैश कारोबार का 22% था. क्लोजिंग ऑक्शन इसी काम के लिए बना है.
पर बग़ल में ऑप्शन का बाज़ार खुला हुआ था, जबकि कैश मार्केट ठहरा पड़ा था. उन 10 मिनट में वहां कारोबार बढ़ गया. ऐसा ख़ास तौर पर एक्सपायरी वाले दिनों में हुआ, क्योंकि उस दिन ऑप्शन का पूरा हिसाब उसी क्लोजिंग प्राइस पर चुकता होता है. SEBI के आंकड़े बताते हैं कि ऐसे दिनों में, 3.20 से 3.30 बजे तक वाले उन 10 मिनटों में NSE के इंडेक्स ऑप्शन में हर मिनट ₹190 करोड़ का कारोबार हुआ. जबकि पुराने तरीक़े में, आख़िरी आधे घंटे में यह ₹126 करोड़ प्रति मिनट रहता था.
इंडिकेटिव इंडेक्स पर, वो कारोबार किस भाव पर हो रहा था? पहले यह समझ लीजिए कि वो है क्या. ऑक्शन के दौरान हर शेयर का एक अंदाज़ा दिखता रहता है कि अगर ऑक्शन इसी पल ख़त्म हो जाए तो वो शेयर किस भाव पर बिकेगा. इसे इंडिकेटिव प्राइस कहते हैं. अब 30 शेयरों के ऐसे अंदाज़े जोड़ दीजिए, तो एक इंडिकेटिव सेंसेक्स बन जाता है, जो स्क्रीन पर चलता रहता है. कोई बड़ा ऑर्डर आए तो वो चढ़ जाता है, और कोई ऑर्डर रद्द हो जाए तो गिर जाता है. पर इस बीच एक भी शेयर बिकता नहीं है, यानी वो अंदाज़ा किसी असली सौदे पर टिका ही नहीं होता. फिर भी ऑप्शन के दाम उसी पर लगते रहे, जैसे सेंसेक्स सच में इतना हिल गया हो.
और यहीं इसका फ़ायदा उठाया गया. SEBI के अंतरिम आदेश का आरोप है कि 13 अगस्त को Copthall Mauritius ने सेंसेक्स के 30 शेयरों में ख़रीद के बड़े ऑर्डर लगाए, वो भी उस 3% वाले बैंड के सबसे ऊपरी सिरे पर. इससे इंडिकेटिव इंडेक्स ऊपर उठ गया और फिर उनमें से ज़्यादातर ऑर्डर रद्द कर दिए गए. उधर Mansi Share and Stock Broking ने इसका ठीक उल्टा किया, यानी बेचने के ऑर्डर लगाए.
अब इससे उन्हें फ़ायदा कैसे हुआ? दोनों के पास उसी दिन एक्सपायर होने वाले ऑप्शन थे. और उन ऑप्शन का हिसाब उसी क्लोजिंग प्राइस पर होना था, जिसे ये ऑर्डर हिला रहे थे. आरोप है कि इससे उन्हें क़रीब ₹3.68 करोड़ मिले.
SEBI इसे आसानी से पकड़ पाया, क्योंकि ऑक्शन में सौदे बहुत कम होते हैं. पहले महीने में NSE के ऑक्शन का कुल कारोबार क़रीब ₹63,000 करोड़ रहा और उसमें से ₹39,718 करोड़ तो अकेले MSCI वाले दिन का था. उस एक दिन को हटा दें, तो ऑक्शन में रोज़ाना सिर्फ़ ₹1,150 करोड़ का कारोबार हुआ. और उधर पूरे कैश मार्केट का रोज़ाना कारोबार ₹1.19 लाख करोड़ रहा. यानी हर सौ रुपये के कारोबार में से सिर्फ़ एक रुपया, सबके लिए दिन का क्लोजिंग प्राइस तय कर रहा है.
और वो ETF वाला मामला?
नियम अलग है, पर दिक़्क़त की जड़ वही है. SEBI के 15 जून के सर्कुलर ने, जो 7 सितंबर से लागू हुआ, किसी ETF का रोज़ाना का प्राइस बैंड दो दिन पुरानी NAV के बजाय पिछले दिन के बाज़ार भाव के इर्द-गिर्द खींच दिया. अब इंटरनेशनल ETF में एक पेच है. वो नई यूनिट नहीं बना सकते, क्योंकि विदेश में पैसा भेजने की सीमा भर चुकी है. इसलिए मांग बढ़ने पर उनका भाव NAV से ऊपर चला जाता है. और जब बैंड कल के उसी भाव के इर्द-गिर्द खिंचेगा, तो वो प्रीमियम हर दिन और ऊपर चढ़ता जाएगा. Motilal Oswal Nasdaq Q50 ETF चार कारोबारी सेशन में NAV से 19.5% ऊपर से 83% ऊपर पहुंच गया, जबकि उसके अंदर रखे शेयर गिर रहे थे. यह हमने 10 सितंबर को बताया था. यानी जहां कारोबार कम होता है, वहां भाव का मतलब घटता जाता है.
तो यह पेपर क्या ठीक करता है?
पहले सेटलमेंट. यानी एक्सपायरी वाले दिन ऑप्शन का हिसाब किस भाव पर हो. इसके दो रास्ते सुझाए गए हैं. पहला, आख़िरी 30 मिनट के कारोबार और 10 मिनट के ऑक्शन, दोनों को मिलाकर एक भाव निकाला जाए, और जिसमें जितना कारोबार हुआ उसे उतना वज़न दिया जाए. और दूसरा, पहले पुराने वाले तरीक़े पर लौट जाएं, और साल भर बाद दोनों को मिलाएं. दोनों में से कोई भी वो लॉटरी वाला हिस्सा ख़त्म कर देता है, क्योंकि इतना छोटा ऑक्शन किसी बड़े औसत को ज़्यादा दूर नहीं हिला सकता. पर मिलाने का काम अभी शुरू करना चाहिए. पुराने तरीक़े पर लौटकर बिताया गया एक साल किसी को ऑक्शन इस्तेमाल करना नहीं सिखाएगा.
फिर इंडिकेटिव इंडेक्स दिखाना बंद कीजिए, पर शेयर-दर-शेयर इंडिकेटिव प्राइस दिखाते रहिए. हॉन्ग कॉन्ग यही करता है.
फिर समय. विकल्प A में हर शेयर का कारोबार 3:30 तक चलेगा, ऑक्शन 3:40 तक, और F&O 3:45 तक. और विकल्प B में 3:15 वही रहेगा, और सब 3:30 तक निपट जाएगा. दोनों उस बीच के अंतर को घटाकर एक मिनट कर देते हैं. पर सिर्फ़ विकल्प A हर शेयर को उसका अपना बंद होने का समय वापस देता है.
और एक बदलाव ऑर्डर के नियम में भी. जो ऑर्डर तय भाव से 1% से ज़्यादा दूर लगाए जाएंगे, उन्हें रद्द नहीं किया जा सकेगा, सिर्फ़ भाव सुधारा जा सकेगा. मतलब यह कि अब आप किनारे पर बड़ा ऑर्डर लगाकर इंडेक्स हिलाइए और फिर उसे वापस नहीं ले सकते. जो लगाया, वो निभाना पड़ेगा.
तो इसका आपके लिए क्या मतलब है?
अच्छी बात यह है कि आपका फ़ंड अब अपने शेयरों की क़ीमत उस भाव पर लगाता है, जिस पर किसी ने सच में सौदा किया हो. और अगर आप ऑप्शन में कारोबार नहीं करते, तो आपके लिए इससे ज़्यादा कुछ नहीं बदलता. पर अगर करते हैं, तो सेटलमेंट का नियम बदलते ही एक्सपायरी वाले दिन की वो लॉटरी ख़त्म हो जानी चाहिए. और यहां एक बात याद रखिए. SEBI के 20 अगस्त के अपने अध्ययन में पाया गया कि 2025-26 में इक्विटी डेरिवेटिव में कारोबार करने वाले 87.7% आम लोगों ने पैसा गंवाया, और उन सबका मिलाकर घाटा ₹91,685 करोड़ रहा. ऑक्शन ने एक महीने की एक्सपायरी को और बुरा ज़रूर बनाया. पर इतने बड़े घाटे की वजहें इससे कहीं पुरानी हैं.
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