
सारांशः एक पाठक ने पूछा कि क्या म्यूचुअल फ़ंड का निवेश ज़ीरो हो सकता है. धीरेंद्र कुमार समझाते हैं कि बाज़ार बेरहम हो सकता है, जैसा 2002 के टेक क्रैश में देखा गया, लेकिन म्यूचुअल फ़ंड के ढांचे में जो सुरक्षा है वो पूरी तरह तबाही को लगभग नामुमकिन बना देती है.
क्या किसी इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड स्कीम में लगाया पैसा ज़ीरो हो सकता है? – मैरी
आपके म्यूचुअल फ़ंड का निवेश ज़ीरो हो गया.
यह सुनकर डर लगता है, लेकिन क्या ऐसा सच में हो सकता है? सीधा जवाब है नहीं और इसकी वजह बाज़ार के व्यवहार में नहीं, बल्कि इस बात में है कि म्यूचुअल फ़ंड कैसे बने होते हैं.
जब आप अपना पैसा किसी फ़ंड मैनेजर को देते हैं, तो वो इसे कम से कम 15 से 20 शेयरों के एक डायवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो में लगाता है. यह उनकी मज़बूरी है क्योंकि SEBI के नियम तय करते हैं कि कोई फ़ंड किसी एक शेयर या बॉन्ड में कितना लगा सकता है. इसलिए आपका निवेश शून्य होने के लिए पोर्टफ़ोलियो के हर एक शेयर को एक साथ बेकार होना पड़ेगा.
यह बेहद मुश्किल है, लेकिन चीज़ें बहुत बुरी ज़रूर हो सकती हैं. 2002 में ऐसा हुआ, जब टेक्नोलॉजी शेयर आसमान छू रहे थे और फ़ंड कंपनियां टेक्नोलॉजी फ़ंड लाने की होड़ में थीं. ऐसे पहले फ़ंड ने पहले साल दोगुना दिया और दूसरे साल भी दोगुना, जिसने उत्साहित निवेशकों की भीड़ खींच ली. फिर और भी फ़ंड कंपनियों ने अपने-अपने टेक्नोलॉजी फ़ंड लॉन्च किए और पिछले प्रदर्शन से चमत्कृत निवेशकों से बड़ी रक़म जमा की. इसके बाद जो हुआ वो बेरहम था, असल में 70% की गिरावट आ गई. ₹100 का निवेश ₹30 रह गया और उबरने में सात लंबे साल लग गए. Infosys भी इससे अलग नहीं थी. जिसने 2001 में इसमें पैसा लगाया उसने अगले सात से आठ साल तक कोई कमाई नहीं की. तो हां, इतना नुक़सान हो सकता है, लेकिन शून्य नहीं.
इस तरह की पूरी तबाही तभी होती जब कोई आपका पैसा बैंक से निकालकर बोरे में भर के चला जाता. म्यूचुअल फ़ंड में ऐसा नहीं हो सकता. इसका स्ट्रक्चर, अपने कस्टोडियन, नियमों और निगरानी के साथ, इसे नामुमकिन बना देता है. बाज़ार में असली जोख़िम हैं, लेकिन इसके बनावट में कोई जोख़िम नहीं है. और इसीलिए शून्य से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.
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ये लेख पहली बार दिसंबर 12, 2019 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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